शबाब पर पशु तस्करी

शबाब पर पशु तस्करी

Latter1जाली नोटों के साथ भारत और बांग्लादेश के बीच पशु तस्करी का अवैध कारोबार भी पूरे शवाब पर है। इस गैरकानूनी कारोबार में कई बड़े गिरोह सक्रिय हैं। गिरोह में शामिल सदस्य बड़ी चालाकी के साथ इस काम को अंजाम दे रहे हैं। पुलिस -प्रशासन भले ही कार्रवाई के दावे करती हो मगर इस गैरकानूनी कारोबार में कमी आने की बजाय और बढ़ोत्तरी ही हुई है। सरकार,पुलिस और प्रशासन की आँख में धूल झोंक कर पशु तस्कर अपने काम को अंजाम दे रहे हैं और करोड़ों की कमाई हो रही है।
पशुओं की तस्करी पश्चिम बंगाल और झारखण्ड के रास्ते हो रही है। दोनों राज्यों के सीमावर्ती कुछ इलाके पशु तस्करों के लिए सेफ जोन बने हुए हैं। इस संवाददाता को तफ्तीश के दौरान पता चला कि पिछले कई महीनों से पुलिस-प्रशासन को ठेंगा दिखते हुए यह गैरकानूनी कारोबार चल रहा है। हालाँकि पुलिस द्वारा समय-समय पर छापेमारी अभियान चलाया जाता है मगर पुलिस को कोई खास कामयाबी नहीं मिल पाती है। छापेमारी के दौरान दो-चार पशुओं के साथ एकाध लोग गिरफ्तार किये जाते है। गिरोह के मुख्य सदस्य तक नहीं पहुँच पाती है पुलिस।
लगभग एक पखवाड़े पहले झारखण्ड के महेशपुर में मवेशी तस्करी पर रोक लगाए जाने को लेकर पुलिस अधीक्षक अजय लिंडा के नेतृत्व में एक सघन छापेमारी अभियान चलाया गया लेकिन कुछ खास सफलता नहीं मिल पाई। सूत्रों की मानें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं दिखती कि पुलिस कार्रवाई की खबर पहले ही पशु माफियाओं को मिल जाती है, लिहाजा वे सावधान हो जाते है। पिछले दिनों हुई छापेमारी के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ। खबर पाकर मवेशी तस्कर दूसरे रास्ते से फरार हो गए और पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ा। इस से पता चलता है कि पशु माफियाओं के गुप्तचर भी काफी सतर्क रहते हैं। पुलिस गतिविधियों की सूचना पलक झपकते ही उन्हें मिल जाती है। इस तरह की घटना देखा जाये तो पुलिस-प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती भी है।
हर रोज सैंकड़ों की तादाद में पशुओं को झारखण्ड के महेशपुर और पाकुडिय़ा के रास्ते पश्चिम बंगाल पहुँचाया जाता है। पश्चिम बंगाल का मालदा जिला मवेशियों को रखने का मुख्य केंद्र है। यहाँ जंगीपुर और उमरपुर की मंडी में मवेशियों को झारखण्ड से लाकर इकठ्ठा किया जाता है। यहाँ के स्थानीय बाशिंदे भी पैसों की लालच में तस्करों की मदद करते हैं। जंगीपुर और उमरपुर के इलाके बांग्लादेश सीमा से काफी नजदीक है, इसलिए मवेशियों को यहाँ रखा जाता है।
पुलिस की नजर बचाकर मवेशी तस्करों के लोग पशुओं को टैग लगाते हैं। हर मवेशी के गले में टैग लगाया जाता है। इसके बाद सभी को धुलियान ले जाकर गंगा नदी की धारा में धकेल दिया जाता है। चूँकि मवेशी तैरने में माहिर होते हैं इसलिए वे डूबते नहीं बल्कि तैरकर बांग्लादेश पहुँच जाते हैं। उधर बांग्लादेश की तरफ पहले से ही तैयार पशु माफिया मवेशियों को पकड़ लेते हैं। जल प्रवाह के बीच तैरते हुए मवेशी बड़ी आसानी से बांग्लादेश की सीमा तक पहुँच जाते हैं। माफियाओं के लोग मछली की तरह गाय-भैंसों को पकड़ लेते हैं और टैग की मदद से पशुओं को बड़ी आसानी से पहचान लिया जाता है क्योंकि कई तस्कर इसमें सक्रि य होते हैं।
बताया जाता है कि यह काम रात में किया जाता है। रात के अँधेरे में पशुओं को धुलियान के रास्ते गंगा नदी के जल प्रवाह तक लाया जाता है और फिर सभी को जल की धारा में धकेल दिया जाता है। इसके बाद मवेशी स्वभावत: तैरते हुए आगे निकल जाते हैं और बंगलादेश पहुँच जाते हैं। इस क्र म में कई बार तेज जल प्रवाह के कारण कई पशुओं की मौत भी हो जाती है लेकिन इस से कारोबारियों को कोई खास नुकसान नहीं होता है। यह उनके कारोबार का ही एक पार्ट होता है।
झारखण्ड के महेशपुर में जहाँ से तस्करी का सिलसिला शुरू होता है, वहां से महज 16 किलोमीटर की दूरी पर भारत-बांग्लादेश सीमा है। पास ही जिला मुख्यालय भी है । इसके बावजूद मवेशी तस्करी का सिलसिला डंके की चोट पर जारी है। कई बार पुलिस को वाहनों में ठूंस ठूंसकर भरे गए कुछ मवेशी हाथ आते हैं और माफिया फरार हो जाते है।
सूत्र बताते हैं कि भारत में जिन मवेशियों की कीमत 10 हजार रूपये होती है, उन्हें बांग्लादेश में तिगनी कीमतों पर बेचा जाता है। तस्कर माफिया झारखण्ड के ग्रामीण इलाकों से सस्ते दरों पर मवेशियों को खरीदते हैं और थोड़ी मेहनत के बाद उन्हें दोगुनी-तिगुनी कीमत मिल जाती है। एक एक झुण्ड में सैंकड़ों की तादाद में पशुओं को पानी में उतरा जाता है और उन्हें बांग्लादेश भेजा जाता है। उधर एलसीटी एवं नाव की सहायता से पशुओं को छान लिया जाता है। इसके बाद सभी को निर्धारित स्थान पर पहुंचा दिया जाता है।
दरअसल पाकुड़ जिले के हिरणपुर में हर हफ्ते मवेशियों का बड़ा हाट भी लगता है जहाँ पशुओं की खरीद फरोख्त की जाती है। इस हाट में झारखण्ड,बिहार और पश्चिम बंगाल के इलाकों से पशु व्यापारी पहुँचते हैं। बताया जाता है यह हाट भी मवेशी तस्करी का एक खास हिस्सा है।
हालाँकि पशु तस्करी के खिलाफ समय-समय पर सामाजिक संगठनों के लोग भी विरोध करते हैं लेकिन इनका अभियान भी बेमानी साबित हो रहा है। मवेशी माफिया रुट मैप तैयार करके बड़ी चालाकी से इस काम को अंजाम दे रहे हैं।
इस सन्दर्भ में पाकुड़ के पुलिस अधीक्षक अजय लिंडा का कहना है कि इलाके के थाना प्रभारियों को इस बाबत सख्त निर्देश दिए गए हैं। उम्मीद है कि जल्दी ही इसपर अंकुश लगाया जा सकेगा। अब देखना ये है कि इस मामले में पुलिस को कितनी कामयाबी मिल पाती है।
संजय सिन्हा

Share it
Share it
Share it
Top