व्यंग्य: पियो और जियो

व्यंग्य: पियो और जियो

drinks womanदारू पीना और जीना ऐसा वाक्य है जो जिंदगी के मायने बदल देता है। जो दारू पीते हैं वे आज के युग में जीवन जीना जानते हैं। जो नहीं पीते वे क्या जीवन जीते हैं, ऐसा मैं नहीं कहता बल्कि मेरे टल्ली मित्र कहते हैं। वे आगे कहते हैं टेंशन, चिड़चिड़ाहट दिमागी भारीपन, चिन्ताओं से लदे ये समाज में क्या स्टेट्स रखते हैं। इसलिए पियो और जियो।
पीने वालों की न पीने वाले के प्रति यह भी मानसिकता होती है कि कैसा बेवकूफ है। दुनियां पीकर तरक्की कर रही है और यह भोंदू आज भी उन्नीसवीं शताब्दी में घूम रहा है। पीने से कई लाभ मिलते हैं मसलन टेंशन फ्री लाइफ। दिमाग फ्रेश रहता है, थकान से मुक्ति मिलती है यानी न कछु की चिन्ता, न काहू का गम।
मीडिया व नशा विरोधी कार्यक्र म बताते हैं कि नशे से दिमाग कंट्रोल में नहीं रहता। यह सरासर गलत है। हम पीने के बाद के दिमागी नियंत्रण को सिद्ध कर सकते हैं।
एक हमारे फिजिक्स के सर थे। वे कक्षा में जब भी आते, एक गिलास हलक में उड़ेल कर ही आते। फिर वे ऐसा पढ़ाते कि पैंतालिस पैंतालिस मिनट के दो पीरियड भी उन्हें कम पड़ते मगर जिस दिन उन्हें नहीं मिलती, उस दिन वे दिमागी रूप से आउट ऑफ कंट्रोल रहते। हाथ कंापते, बात-बात पर छात्रों पर गुस्सा उतारते।
गुरू स्वरूप एक प्रसिद्ध कवि महोदय का कहना था-बेटा मंचीय कवि बनना है तो पीना सीख ले। बिना पीये तू मंच पर बंदर नहीं बन सकता। तू जो भी पढ़, जैसा भी पढ़ मगर पीकर बंदरों की हरकत जरूर कर। आजकल लोग बंदरों पर ही तालियां बजाते हैं, आदमी पर नहीं।
पियक्कड़ों की सेवा के लिए शराब के ठेकेदार तक अग्रणी रहते हैं। इलाके में एक की बजाय दो-दो दुकान खोलने का ठेका लेता है ताकि पीने वाले प्यासे न रहें।
पीने वाले राष्ट्रप्रेमी कहलाते हैं। अगर पीना छोड़ दें तो राज्य के बजट का क्या होगा। आधा लाभ तो दारू बिक्र ी से हासिल होता है।
दारू पीने वाले दारू का लाभ यूं बताते हैं-गरमी के दिनों में तपन की बेचैनी से ठंडी बीयर राहत दिलाती है, वहीं बदन बनाना हो तो बीयर पियो। दाल भात सब्जी के साथ-साथ हड्डी को भी पचा देती है दारू। हमारे एक मित्र हैं जो नॉन स्टॉप पियक्कड़ हैं, यानी नशा उतरने के पहले ही फिर से गिलास भर गटक लेते हैं। वे कहते हैं अपने को कभी भी मलेरिया नहीं हुआ।
क्यों? हमने पूछा।
हमें तो मच्छर भी काटने से कतराते हैं।
काहे।
अपन पीने वाले ठहरे। इत्ती पीते हैं कि पसीने की गंध में भी दारू होती है। अब ऐसे में मच्छर काटता भी है तो अपनी तरह वह भी वहीं लुढक जाता है।
सच कहते हैं वे नाली में पड़े रहे, या झुरमुटदार नाले में, इन्हें सांप बिच्छू कीड़े-मकोड़े छूने से कतराते हैं तो मच्छर की क्या औकात।
सरकारी दफ्तरों में कार्यरत पियक्कड़ अपने करनी धरनी व निकम्मेपन में पूरी तरह सेफ होते हैं। अधिकारी उन्हें कब तक निलम्बित करे या वेतन काटे। यह सब करते परेशान होकर कह उठता है – कहां तक सुधारें साले को। कारण कि वह जानता है इनका कुछ भी बिगाड़ो, ये सुधरने से रहे। एक मित्र से हमने कहा-आप इत्ती ज्यादा क्यों पीते हो कि अपनी इंसानियत तक सुरक्षित नहीं रख पाते।
वह उल्टे हमें सीख देते हुए बोला- आप पीने वालों से जलते हैं, आखिर क्यों। भले ही खुद ही पड़ोस के देव मंदिर में दारू पंडा पुजारियों द्वारा दारू भोग लगवाते हैं। उन देवी-देवताओं पर अंगुली उठाओ जो दारू का भोग लेते है। हम तो उनका दिया प्रसाद पीते हैं।
एक डॉक्टर साहब स्वयं पीते हैं मगर सख्त हिदायत देते हुए इतना डरा देते हैं कि मरीज असमंजस में पड़ जाता है कि पिए या न पिए।
सुनील कुमार सजल

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