विवाह करने के पूर्व दस बार विचार कीजिए

विवाह करने के पूर्व दस बार विचार कीजिए

अपने व्यक्तिगत जीवन के संबंध में कुछ लिखने में मुझे कुछ संकोच सा रहता है क्योंकि लिखते समय और पढ़ते समय भी उसमें आत्म प्रशंसा का भाव झलक सकता है लेकिन आज जिस विषय पर मैं लिख रहा हूं, उस पर न चाहते हुए अपने अनुभव का उल्लेख करना भी आवश्यक है इसलिए यह संकोच त्यागता हूं।
मैं अब 85 वर्ष का होने को हूं और मेरी धर्मपत्नी के देहावसान को 45 वर्ष हो गए हैं। जब पत्नी का देहावसान हुआ, तब मेरा सबसे छोटा पुत्र 4 वर्ष 6 माह का था। तीन संतानें थीं और मैं तहसीलदार के पद पर था। बड़ी विषम परिस्थिति थी। बच्चों को पालना, शिक्षा देना एक चुनौती थी लेकिन यह सब हो गया। बच्चे आज अपना अपना घर बसा कर सुखी हैं।
इस प्रकार कहना न होगा कि माता-पिता दोनों का रोल ईश्वर ने मुझसे निर्वाह कराया। लालन-पालन का थोड़ा सा ज्ञान तो हर पिता को होता ही है। कुछ पुस्तकों से प्राप्त किया। अस्तु आज मुझे ऐसा लगता है कि बचपन में बच्चों को माता पिता के साथ की अत्यंत आवश्यकता होती है। बच्चे माता-पिता से प्यार पाते हैं, विश्वास पाते हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास जागता है। बच्चे परिवार से ही संस्कार पाते हैं। ये संस्कार उनके जीवन भर काम आते हैं। बच्चों को माता-पिता का अमूल्य समय मिलना अत्यंत आवश्यक है। यदि इस समय माता-पिता बच्चों को समय न दे पाए तो फिर ऐसा मानना चाहिए कि उन्होंने बच्चों को कुछ नहीं दिया।
कहां है समय: आज कल हमारे पास सब है, केवल समय नहीं है। हम व्यवसायिकता की दौड़ में इतने पागल हैं कि हमें हमारे लिए ही समय नहीं है। गलाकाट प्रतियोगिता है। हम एक दूसरे को धक्का मार कर, गिरा कर भी आगे बढ़ जाना चाहते हैं।
इस स्थिति में हम पत्नी के लिए भी समय नहीं निकाल पाते। पत्नी पति के लिए समय नहीं निकाल पाती। भाई को भाई से मिलने के लिए समय लेना पड़ता है। हर आदमी व्यस्त है। धन कमाना है, सुविधाएं जुटानी हैं। शिखर पर पहुंचना है। मेरे जैसे वृद्ध लोग भागते हुए लोगों से पूछते हैं-‘तुम किसके लिए कर रहे हो यह भाग दौड़ जीवन की प्रसन्नता के लिए तो यह आवश्यक नहीं है पर कुछ तो सुनते ही नहीं। जो रूक जाते हैं, सुनते हैं, वे कहते हैं ‘हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए दौड़ रहे हैं। हम चाहते हैं कि खूब धन इकटृठा कर, सुविधाएं जुटा कर उनका भविष्य सुधारें। हमारे मां बाप संपन्न न थे। वे हमें सुविधाएं न दे सके, हम अपने बच्चों को सब सुविधाएं दें, चिंता मुक्त कर दें। ये दंपति अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपना वर्तमान दौड़-दौड़ कर बरबाद कर रहे हैं।
भविष्य नहीं, वर्तमान देखें: हम सब बच्चों का भविष्य सुखमय बनाने में लगे हैं। हम उनका वर्तमान नहीं देख रहे जब कि उनके वर्तमान पर ही उनका भविष्य निर्भर है। बच्चों को अभी-आज आपकी आवश्यकता है। कल जब वे वयस्क हो जाएंगे, तब तो वे आपको देखेंगे। बच्चे चाहते हैं मां पिता उन्हें अधिकतम समय दें। आपने अनुभव किया होगा जब आप बाहर काम पर जाते हैं तो बच्चे पूछते हैं आप कब वापस आएंगे। छोटे बच्चे तक चाहते हैं कि मां बाप उनके पास रहें।
बच्चों को आज अभी आपकी आवश्यकता है। कुछ सुविधाएं उन्हें न मिलें, कोई अंतर नहीं पड़ता। असुविधाएं झेलकर, संघर्ष कर वे कई पाठ पढ़ते हैं। जीवन में सहज सुलभ कुछ नहीं मिलता। जो सहज उपलब्ध हो जाता है, वह कोई मूल्य नहीं रखता, इसलिए बच्चों को सुविधाएं देने जैसे तर्क से अपने को धोखा मत दीजिए। अंतरतम की गहराई में झांकिए। कारण कुछ और होंगे –
अपने आपको धोखा देते हम:- हम आधुनिक हो गए हैं। तर्क वितर्क में प्रवीण हैं, इसलिए अपने आपको धोखा देने के लिए बहाने खोज लेते हैं। मैंने महिला पत्रिकाओं में और टी.वी. पर देखा है, सुना है कि लोग कहते हैं-हमारे पास समय नहीं है किंतु जो थोड़ा सा समय हम निकाल पाते हैं वह हम पूरी ईमानदारी से बच्चों को देते है। बच्चे भी हमारी कठिनाई समझते हैं। वे इसे ‘क्वालिटी टाइम’ देना कहते हैं। उनका कहना है कि इससे बच्चे अधिक समझदार हो जाते हैं।
यह ‘क्वालिटी टाइम’ क्या होता है, यह मेरे अनुभव में तो नहीं आया। बच्चा कोई मशीन नहीं है कि आप जब चाहे उसके पास बैठ गए, प्यार किया, कुछ बोले और वह संतुष्ट हो गया। वह चेतन प्राणी है। उसको आपकी हर समय आवश्यकता है। आप उसकी आवश्यकता के लिए जो नौकर रखते हैं, वह उससे संतुष्ट नहीं होता। होता कुछ उलटा है। बच्चा उस नौकर के संस्कार सीखने लगता है। आप बच्चे को समय नहीं दे पाते इसलिए उसे भी अपनी तरह व्यस्त बनाते हैं। टी.वी., कम्यूटर और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में संवेदनाएं समाप्त हो जाती हैं। वह भी धन अर्जन करने की दौड़ में सम्मिलित हो जाता है।
बढ़ती उम्र का अहसास भी जरूरी है
तब तक आप वृद्ध हो जाते हैं। आराम और विश्राम की मुद्रा बनाना चाहते हैं। चाहते हैं बच्चा बुढ़ापे की लाठी बने किंतु बच्चे को हमने इसकी शिक्षा कहां दी। उसे अनुभव ही नहीं है इन सबका। उसने दादा दादी, नाना नानी, ताई-ताऊ, चाचा-चाची के दर्शन ही नहीं किए। वह गृहस्थ आश्रम जानता ही नहीं। जब-जब वह बीमार पड़ा, आपके पास अवकाश ही नहीं था उसके पास बैठने का, उसको दवा देने का, उसके दर्द समझने का। तब एक नौकर था उसके पास। उसकी समस्याएं सुनने का कहां समय था आपके पास। उसने परिवार में कब देखा त्याग, सहयोग, प्रेम अपनापन। पति-पत्नी में तो प्रेम के दर्शन नहीं हैं। वे तो व्यस्त हैं। तब बच्चा यह कहां सीखता।
वृद्धाश्रम की नींव हमने डाली है पश्चिम का अंधानुकरण कर के उसके लिए आज युवा पीढ़ी को कोसना अपने आपको कोसना होगा।
फिर क्या करें – यह एक गंभीर प्रश्न है। हमने प्रारंभ से ही देखा और सबका अनुभव भी है कि बच्चे हमारे परिवार से ही संस्कार सीखते हैं। उन्हें सिखाना नहीं पड़ता। चिडिय़ा के बच्चे को फुदकना और उडऩा परिवार में रहकर ही आ जाता है लेकिन जरूरी है कि परिवार तो हो। यदि हमारे पास समय नहीं है तो त्याग, प्रेम, अपनत्व सहयोग आदि की शिक्षा हम अपने आचरण और व्यवहार से कैसे दे सकते हैं। यह शिक्षा भाषण, प्रवचन से नहीं मिल सकती। ‘क्वालिटी टाइम’ देने की बात मन को समझाना है, धोखा है।
विवाह करना एक गंभीर उत्तरदायित्व है। वह मन बहलाने या शारीरिक भूख मिटाने का साधन नहीं हैं। संतान का पालन पोषण, चरित्र निर्माण एक गंभीर विषय है जो त्याग, तपस्या की मांग करता है। इसे यदि हम परेशानी माने और हमारे पास समय ही न हो तो फिर हमें विवाह के झंझट में नहीं पडऩा चाहिए।
खुशियों के रंग, चूडिय़ों के संग
विवाह करने के पूर्व दस बार सोचिए। पत्नी-पति और बच्चे सभी जिम्मेदारी की मांग करते हैं। यदि आप पति-पत्नी के बीच जिम्मेदारी न निर्वाह कर पाए तो तनाव होगा, तलाक होगा और यदि बच्चों के साथ निर्वाह न कर पाए तो असामाजिक उपद्रवी संतान बनेगी। इसलिए विवाह करने के पूर्व आज गंभीर चिंतन की आवश्यकता तो है ही।
इसलिए विवाह के पूर्व दस बार सोचिए और यदि आप बच्चों के लिए समय नहीं निकाल सकते तो विवाह मत कीजिए। बच्चों को चाहिए आपका प्रेम-त्याग-सहयोग। वे आपसे और केवल आपसे संस्कार प्राप्त करते हैं। संस्कार दिए नहीं जाते। वे बच्चे चुपचाप आपके कार्य व व्यवहार से सीखते है। उन्हें केवल आप दे सकते हैं।
विवाह करना एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है। वह केवल शरीर की आवश्यकता या अकेलेपन की यात्र से छुटकारा पाने के लिए किया गया मनोविनोद नहीं है, अत: गंभीरता से सोचिए।
– सत्य नारायण भटनागर

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