विलेन बनकर शुरू किया था विनोद खन्‍ना ने फिल्मी करियर

विलेन बनकर शुरू किया था विनोद खन्‍ना ने फिल्मी करियर

मुम्बई। विनोद खन्ना न तो किसी फिल्मी परिवार से थे और न ही वे फिल्म स्टार बनने के लिए मुंबई भागकर आए थे। विनोद खन्ना का परिवार बंटवारे के बाद पेशावर से भारत आया था और पहले मुंबई और फिर दिल्ली रहने लगा था। विनोद खन्ना पढ़ने में तेज थे, इसलिए उनको नासिक के पास कॉन्वेंट स्कूल के होस्टल में भेजा गया। मुगल-ए-आजम देखने के बाद विनोद खन्ना के मन में ललक जागी, तो एक चांस लेने के चक्कर में उन्होंने सुनील दत्त की फिल्म ‘मन का मीत’ में विलेन का रोल भी करने मे संकोच नहीं किया। ‘मन का मीत’ में सुनील दत्त और उनके भाई सोमदत्त थे, फिर भी विनोद खन्ना सबसे ज्यादा चमके और पहली ही फिल्म से इस नए-नवेले विलेन की चर्चा होने लगी।
‘मन का मीत’ 1969 की फिल्म थी। इसके बाद मनोज कुमार ने विनोद खन्ना को पूरब और पश्चिम में विलेन बनाया, जहां वे ज्यादा प्रभावशाली रहे। राजेश खन्ना के साथ ‘सच्चा-झूठा’ से लेकर 1971 में बनी राज खोसला की ‘मेरा गांव मेरा देश’ तक विनोद खन्ना ने विलेन के तौर पर ऐसा जलवा दिखाया कि विलेन का रोल करने वाले दूसरे कलाकार पीछे छूटते चले गए। ‘मेरा गांव मेरा देश’ में धर्मेंद्र और आशा पारेख की जोड़ी के सामने डाकू झब्बर सिंह के रोल में विनोद खन्ना ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
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70 के दशक मे विनोद खन्ना बतौर विलेन इतने पावरफुल होकर चमके कि पहली बार कोई विलेन हीरो पर भारी पड़ने लगा। उसी दौर में विनोद खन्ना के अलावा शत्रुघ्न सिन्हा ने भी विलेन के तौर पर ही अपने करिअर को आगे बढ़ाया था। 1973 में गुलजार ने मीना कुमारी के साथ ‘मेरे अपने’ बनाई, तो इसमें दोनों को एक साथ किया और दोनों का परदे पर जोरदार मुकाबला रहा। कॉलेज के छात्रों के जीवन पर बनी इस फिल्म में श्याम (विनोद खन्ना) और छेनू (शत्रुघ्न सिन्हा) ने दर्शकों की वाह-वाही लूटी। इस बीच एक तमिल फिल्म के रीमेक ‘हम तुम’ में विनोद खन्ना हीरो बने, लेकिन नोटिस नहीं हुए। गुलजार की ही फिल्म ‘अचानक’ जो सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म थी, इसमें विनोद खन्ना ने साबित किया कि वे सिर्फ विलेन नहीं, बल्कि दूसरे रोल भी कर सकते हैं। यहां से विनोद खन्ना की एक नई पारी का आगाज हुआ, जिसमें उनको बतौर हीरो मौके मिलने लगे।
मौसमी चटर्जी के साथ हत्यारा से लेकर हॉलीवुड की नकल पर बनी राज एन सिप्पी की स्टाइलिश फिल्म ‘इंकार’ से विनोद खन्ना हीरो के तौर पर धमाका करने में कामयाब रहे। इसके बाद विनोद खन्ना को बतौर हीरो पीछे मुड़कर देखने की जरुरत नहीं पड़ी। उसी दौर में अमिताभ बच्चन ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’ फिल्मों से तेजी से चमके और सुपर स्टार की दौड़ में आगे आ गए। उस दौर में अमिताभ बच्चन के सुपर स्टारडम को विनोद खन्ना ही सबसे बड़ी और मजबूत चुनौती माने जा रहे थे। 1980 में फिरोज खान की ‘कुर्बानी’ ने विनोद खन्ना को लगभग सुपर स्टारडम के मामले में अमिताभ बच्चन के करीब लाकर खड़ा कर दिया था। अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना को प्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्म ‘हेराफेरी’ में साथ किया और फिल्म कामयाब रही। मनमोहन देसाई की ‘खोया-पाया’ फार्मूला पर बनी ‘अमर अकबर एंथोनी’, प्रकाश मेहरा की ‘मुकद्दर का सिकंदर’, राज खोसला की ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’, बीआर चोपड़ा की ‘द बर्निंग ट्रेन’ में विनोद खन्ना ने खुद को वेरायटी वाला एक्टर साबित किया, जो विलेन से लेकर पारंपरिक रोमांटिक हीरो और ग्रे शेड्स के कैरेक्टर करने में संकोच नहीं करता था। कहा जाता है कि उस 5 साल के दौर में विनोद खन्ना ने बतौर सोलो 47 फिल्मों में काम किया और अपने स्टारडम को बुलंदी पर पंहुचाया। उनकी कामयाबी का एक जश्न ये रहा कि राजेश खन्ना के बाद विनोद खन्ना उस दौर के इकलौते ऐसे स्टार थे, जिन्होंने एक सप्ताह में 15 नई फिल्में साइन करने का चमत्कार करके दिखाया था।
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1982 में जब विनोद खन्ना अचानक रजनीश के ओशो आंदोलन के साथ जुड़े, तो किसी ने नहीं सोचा था कि अपने सुनहरी दौर को ठोकर मारकर कोई स्टार शांति की खोज में ओशो की शरण में जा सकता है। विनोद खन्ना ने किसी की परवाह नहीं की। जब ओशो के पुणे वाले आश्रम में जाने के लिए विनोद खन्ना ने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ी, तो उनकी बीस से ज्यादा फिल्में अधूरी थीं, लेकिन उन्होंने किसी की परवाह नहीं की और ओशो भक्ति में लीन हो गए। वहां वे तीन साल से ज्यादा वक्त तक शांति की खोज करते रहे। 1986 में जब वे मुंबई में फिल्मों की दुनिया में लौटे, तो यहां काफी कुछ बदल चुका था। अमिताभ बच्चन राजनीति में जा चुके थे। राजेश खन्ना का दौर खत्म हो चुका था। दिवंगत फिल्मकार मुकुल आनंद की फिल्म ‘इंसाफ’ से उनकी परदे पर वापसी हुई। इसी फिल्म से एक अर्से बाद डिंपल कापड़िया की वापसी हो रही थी। एक्शन पैक ये फिल्म बाक्स ऑफिस पर अच्छी रही और विनोद खन्ना को बॉलीवुड ने फिर गले लगा लिया। विनोद खन्ना ने सोलो फिल्मों की जगह समझदारी दिखाते हुए मल्टी स्टार फिल्मों को प्राथमिकता दी। मुकुल आनंद की ही खून का कर्ज में वे रजनीकांत और संजय दत्त के साथ रहे, तो जे पी दत्ता की बंटवारा में धर्मेंद्र के साथ और इंसानियत के देवता और सूर्या में राजकुमार के साथ। विनोद खन्ना को जो मिला, वो उन फिल्मों में काम करते चले गए और इस वापसी में फ्लाप हिट से आगे उन्होंने अपनी मौजूदगी का एहसास बनाए रखा।
नई सदी में वे कैरेक्टर आर्टिस्ट के तौर पर नई पारी शुरू करने आए। दिया मिर्जा के साथ दीवानापन में उनके पिता के रोल में उनकी एक नई शुरुआत रही। जेपी दत्ता की ‘क्षत्रीय’ में वे रवीना टंडन के पापा बने। अब्बास मस्तान की थ्रिलर फिल्म ‘प्लेयर’ के बाद सलमान खान की ‘दबंग’ और फिर ‘दबंग 2’ और 2015 में शाहरुख खान की ‘दिलवाले’ तक में वे हर तरह के कैरेक्टर रोल करते रहे। पिछले शुक्रवार को ग्वालियर घराने की राजमाता रहीं, विजयाराजे सिंधिया की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘एक थी रानी’ में विनोद खन्ना हेमा मालिनी के साथ थे और यही उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई।

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