विदेशों में भी मनाया जाता है दशहरा..अलग-अलग तरह की है परम परम्पराएँ…!

विदेशों में भी मनाया जाता है दशहरा..अलग-अलग तरह की है परम परम्पराएँ…!

dussehraरामलीला देखना सबको अच्छा लगता हैं। कितना मजा आता है जब हनुमान अपनी पूंछ से लंका जला डालते हैं, जब राम-लक्ष्मण अपने तीरों से एक-एक करके अजीब-करीब चेहरों वाले राक्षसों का सफाया कर डालते हैं, और फिर दशहरे के दिन तो पटाखों की ‘धांय-धांय ठांय-ठांय’ के बीच रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के बहुत बड़े-बड़े पुतले फूंके जाते हैं। सभी जानते हैं कि दशहरे का त्यौहार रामजी की रावण पर विजय की याद में मनाया जाता है। बड़ा शक्तिशाली था रावण, बड़ी सेना थी उसके पास लेकिन बड़ा अत्याचारी भी था, सबको सताता था लेकिन रामजी की वनवासी वानरों की फौज के आगे उसकी एक न चली। सच है, पक्के नेक इरादे, ईमानदारी और सच्चाई के आगे बुराई की बड़ी से बड़ी ताकत को भी हारना ही पड़ता है। यही तो दशहरे का संदेश है। दशहरा मात्र हमारे देश में ही नहीं मनाया जाता बल्कि विश्व के कई मुल्कों में अपनी-अपनी संस्कृति के आधार पर मनाया जाता है।
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पूर्वी द्वीप समूह:-पूर्वी द्वीप समूह में दशहरे के दिनों पेशन प्लेज रचाए जाते हैं। पेशन प्लेज उन नाटकों को कहते हैं जिनमें भगवान के कष्ट भोगने का चित्रण हो।जावा द्वीप:- जावा द्वीप के ‘बाजंग जोंग’ नामक थियेटर में रामायण के आधार पर राम-रावण युद्ध के नाटक खेलते हैं। यह यहां का राष्ट्रीय थियेटर भी है। वैसे इस थियेटर में कुछ वर्षों से भारतीय कलाकारों द्वारा हिंदी में रामलीला का सफल मंचन भी किया जा रहा है।
मिश्र:- जिन दिनों हमारे देश में दशहरा आता है उन्हें दिनों में मिश्र के आदिवासी अपनी फसल पकने की खुशी में एक दैत्य का पुतला बनाकर जलाते हैं। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से दैत्यों का नाश हो जाता है।
नाइजीरिया:- नाइजीरिया के पूर्वी प्रदेशों में तो शक्ति की देवी ‘डायना’ की उपासना सात दिन तक की जाती है। आठवें दिन मिट्टी की एक मूर्ति बनाकर इसमें मंत्र पढ़ते हुए जंगली फल-फूल भरकर इस मूर्ति को बाज के रक्त से नहलाकर पवित्र करते हैं।
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आदिवासी अपने वस्त्र उतारकर मूर्ति की बारी-बारी से तीन-तीन परिक्र मा करके  अपना सिर फोड़ते हैं, फिर सिर के गंभीर घाव में मूर्ति की मिट्टी भरते हैं। मान्यता है कि मिट्टी में देवी की शक्ति आ जाती है और वह शक्ति घाव के जरिए मानव के पूरे जिस्म में पहुंच जाती है। इस पर्व को ‘शक्ति’ के नाम से अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है।आस्टे्लिया:- ऑस्टेलिया के कुछ क्षेत्रों में दो पहलवानों में राम-रावण युद्ध का नाटक खेला जाता है। जो पहलवान हार जाता है उसकी शक्ल का विचित्र आकृति वाला पुतला बनाकर दर्शकों के सामने जलाते हैं।
गुयाना:- गुयाना में तो दशहरा मनाने का निराला ही रूप है। वहां भ्रष्ट अफसरों और नेताओं के पुतले आम चौराहों पर जूतों के पूजन के बाद बड़े हर्षोल्लास के साथ जलाए जाते हैं।
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बेबीलोनिया:- बेबीलोनिया में भी मूर्ति जलाने की प्रथा है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में शक्ति की देवी इश्तार थीं। वह तम्मुज नाम के एक सुंदर नवयुवक से प्रेम करती थी। वह नवयुवक अचानक मर गया। उस नवयुवक की याद में वहां की स्त्रियां दशहरे जैसा त्यौहार प्रतिवर्ष बनाया करती हैं जिनमें उसकी मूर्ति को जलाया जाता है।चीन:- अक्तूबर में चीन में किसी एक जानवर की आकृति का पुतला बनाकर नगर के पूर्वी द्वार के बाहर खड़ा कर दिया जाता है जिसे एक गवर्नर छड़ी से खूब पीटता है। जब काफी टूट-फूट जाता है तो उसमें आग लगा दी जाती है। दर्शकों की भीड़ उन जले हुए टुकड़ों की राख लेने के लिए टूट पड़ती है क्योंकि ऐसा विश्वास है कि वे टुकड़े सौभाग्यशाली होते हैं।________________________________________________________________________________
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   ________________________________________________________________________________यूनान:- यूनान में हताश प्रेमिकाएं अपने धोखेबाज प्रेमियों के पुतले बनाकर अग्नि में फूंका करती थीं। यह परंपरा वहां यों चली कि एक बार सोमिला नामक खूबसूरत युवती ने अपने प्रेमी से शादी करने का वादा किया लेकिन वह शादी करने से मुकर गया। सोमिला को बाद में पता लगा कि धोखेबाज प्रेमी ने विवाह किया तो मध्यरात्रि को अपने प्रेमी के सुहागरात वाले कमरे की ओर गई और सखियों की मदद से उस कमरे को घेरकर आग लगा दी। नवदंपति जलकर राख में बदल गए। तब सोमिला ने अपनी सखियों से कहा, ‘आज के बाद जो भी प्रेमी अपनी प्रेमिका को धोखा देगा, उसे इसी भांति जिंदा जला दिया जाएगा।
समय का चक्र बदल गया, इसलिए वहां लड़कियां अपने धोखेबाज प्रेमियों को जिंदा जलाने की बजाय उनकी शक्ल का पुतला बनाकर जलाती हैं।
सीरिया:- प्राचीन सीरिया में भी दशहरा जैसा पर्व मनाने का उल्लेख है।
कंबोडिया:- कंबोडिया में भी दशहरा जैसा एक त्यौहार मनाया जाता है। यहां एक राक्षस का पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। मान्यता है कि साल में एक बार अक्टूबर माह में ऐसा करने से विपत्तियां पास नहीं आती और मनुष्य हमेशा सुखी रहता है।
बोस्निया:- बोस्निया में कपड़े का पुतला बनाया जाता है जिसे ‘बुराई का प्रतीक’ कहते हैं। इस पुतले को जूते-चप्पल से मारा जाता है। अंत में उसे जला दिया जाता है।
– अनिल शर्मा ‘अनिल’

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