विदेशी निवेश को तरसता यूपी, बेहाल युवा..मुख्यमंत्री जी को सैफई के नाच-गाने से ही नहीं मिली फुर्सत!

विदेशी निवेश को तरसता यूपी, बेहाल युवा..मुख्यमंत्री जी को सैफई के नाच-गाने से ही नहीं मिली फुर्सत!

उत्तर प्रदेश में बीते पांच साल में कोई बड़ा विदेशी निवेश नहीं आया। आता तो तब जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस बाबत कोई सघन पहल की होती। जैसे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू या फिर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) अपने प्रदेश में आमंत्रित करने के लिए सिंगापुर से लंदन और अमेरिका की खाक छानते हैं, उस तरह का कोई कदम अखिलेश यादव ने नहीं उठाया। हालत ये है कि अखिलेश यादव सैफई महोत्सव के कारण 2015 के प्रवासी सम्मेलन (पीबीडी) में नहीं गये थे। उसके बाद के प्रवासी सम्मेलनों को लेकर उनका रुख ठंडा ही रहा है। मुख्यमंत्री जी को सैफई के नाच-गाने से ही फुर्सत नहीं मिली, प्रवासी सम्मेलन में कौन जाता? एक तरफ सरकार प्रदेश में विदेशी निवेश का ढोल पीटती रही है, तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री जी को प्रवासी सम्मेलन में शिरकत करने का वक्त नहीं मिलता। प्रवासी भारतीय सम्मेलन में सारे संसार से धनी और असरदार प्रवासी भारतीय आते हैं। उनसे तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री मिलते हैं। उनसे अपने राज्य में निवेश करने का आग्रह करते हैं। इसरके विपरीत अखिलेश यादव को कभी तैयारी के साथ पीबीडी में जाते हुए नहीं देखा। हां, वे लखनऊ में यूपी के प्रवासी भारतीयों से मिवकर खुश हो जाते हैं। दुर्भाग्य यूपी का बेशक, अखिलेश यादव यदि वास्तव में प्रदेश के विकास के प्रति चिन्तित होते तो पीबीडी में जाते और कुछ न कुछ निवेश ला पाते। प्रदेश का दुर्भाग्य है कि मुख्यमंत्री जी की प्राथमिकता प्रदेश का विकास नहीं बल्कि फिल्मी सितारों का नाच गाना रहा है। इसके चलते प्रदेश में मोटा निवेश नहीं आ पाता। दरअसल, अब अधिकतर राज्य अपने को निवेश के लिए सबसे मुफीद जगह साबित करने की जी-तोड़ कोशिश करने में लगे हैं। राज्यों के बीच जारी यह पूरी कवायद ”ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” लिस्ट में ऊंचा स्थान पाने को लेकर है।
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यह सूची वर्ल्ड बैंक तैयार करता है। कुछ समय पहले वर्ल्ड बैंक की टीम ने भारत के राज्यों की रैंकिंग लिस्ट जारी की है। इससे पहले टीम ने बिजनेस करने में आसानी की दिशा में भारतीय राज्यों की तरफ से उठाए गए 100 कारगर उपायों का आकलन किया था। अब पिछले साल पहली बार रैंकिंग लिस्ट जारी की गई थी। पिछड़ा यूपी इस साल देश के नए राज्य तेलंगाना ने इस रैंकिंक में नंबर वन की कुर्सी हथिया ली है। तेलंगाना ने अपने पैदाएशी प्रतिद्वंदी आंध्रप्रदेश को मामूली अंतर से पछाड़ दिया है। तो यह मत सोचिए कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव मात्र लड़ते ही रहते हैं। इनके बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी चल रही है। इस सूची में गुजरात हमेशा की तरह अपनी बेहतर जगह बनाए रखता है। वर्ल्ड बैंक की रैंकिंग को अब अधिकतर राज्य बहुत गंभीरता से ले रहे हैं।
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राज्यों ने कई विशेषज्ञ सलाहकारों को नियुक्त कर भी यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि बिजनेस आसान करने की दिशा में उठाये गए उनके कारगर कदम बेकार न जाएं। एक बात साफ है कि जिन राज्यों को बेहतर रैंकिंग मिलेगी वहां पर देश-विदेश से मोटा निवेश आएगा। जाहिर है, इससे उन राज्यों का चौमुखी विकास भी होगा। इसके विपरीत अपने यहां निवेश को लाने और बढ़ाने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार सोई हुई है। एक बात समझ लीजिए कि जिस राज्य में बाहर से निवेश नहीं आएगा वहां का विकास राम भरोसे ही रहेगा। उधर का नौजवान नौकरी के लिए अपने घर से बाहर जाकर धक्के खाता रहेगा। यही तो हो रहा है उत्तर प्रदेश में बीते पांच सालों के दौरान।

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