वानी के बाद कश्मीर की वाणी को कौन समझे?

वानी के बाद कश्मीर की वाणी को कौन समझे?

Rajeev Ranjan Tiwaमकबूल भट्ट और अफजल गुरु के मारे जाने के बाद कश्मीर में आतंकवाद ने नई करवट ली, कहीं बुरहान वानी के बाद भी ऐसा ना हो। ये डर हर किसी को सता रहा है। इससे निपटना आसान नहीं है क्योंकि जैसे ही ये खबर फैली कि हिजबुल का पोस्टर ब्वॉय आतंकी कमांडर बुरहान मारा गया है तो पूरा कश्मीर जल उठा और इस हिंसा से डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। जम्मू-कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद घाटी में तनाव बढ़ गया। पुलवामा, अनंतनाग और शोपियां में बढ़े तनाव की वजह से कफ्र्यू लगा दिया गया। वहीं हालात को देखते हुए बारामुला-काजीगुंड के बीच ट्रेन सेवाएं भी रद्द कर दी गई। हुर्रियत के बंद के मद्देनजर एहतियातन कई अलगाववादी नेताओं को नजरबंद कर दिया गया। एनकाउंटर में मारे गए बुरहान वानी के सिर पर 1० लाख रुपये का इनाम था।
अनंतनाग के कोकरनाग इलाके में राष्ट्रीय रायफल्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ मुठभेड़ में बुरहान मारा गया। वह दक्षिलण कश्मीर के त्राल इलाके का रहने वाला था। बुरहान के मरने की खबर फैलते ही श्रीनगर-अनंतनाग हाईवे पर प्रदर्शनकारी जुटे और टायर जलाने शुरू कर दिए। कुछ इलाकों में युवाओं ने बुरहान के समर्थन में नारेबाजी भी हुई। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी और जेकेएलएफ चेयरमैन यासीन मलिक ने बुरहान के मारे जाने के विरोध में प्रदर्शन करने का एलान किया था। इस बीच जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुरहान की मौत के बाद पनप रही स्थिति को लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई। अब्दुल्ला ने ट्वीट करते हुए कहा कि मेरे कहे को लिख कर रख लीजिए। बुरहान कब्र में रहकर कई आतंकियों को पैदा करेगा, जो वह सोशल मीडिया पर नहीं कर पाया। कश्मीर के निराश लोगों को उनका नया हीरो मिल गया है। अब सवाल यह है कि आखिर कश्मीर के लोग चाहते क्या हैं वहां की भाजपा-पीडीपी सरकार उनकी भावनाओं व भाषा को क्यों नहीं समझ रही है। वानी की मौत के बाद जो उबाल दिख रहा है आखिर वहां की वाणी को सरकार नहीं समझेगी तो कौन समझेगा।
बुरहान वानी 2010 में भाई के मारे जाने के बाद आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़ा। उसका मानना था कि उसके भाई की भारतीय सेना ने हत्या की थी। 15 साल की उम्र में वो आतंकी संगठन का सदस्य बनकर भाई की मौत का बदला लेना चाहता था। उस पर कश्मीर के पढ़े-लिखे युवाओं को हिजबुल से जोडऩे का जिम्मा था। बुरहान वानी पर 10 लाख रुपये का इनाम भी घोषित था। बुरहान वानी ने घाटी में कई तकनीक पसंद आतंकवादी तैयार किए। पिछले दिनों बुरहान वानी को मुठभेड़ के दौरान तब मार गिराया गया, जब सुरक्षाबलों को सूचना मिली कि दक्षिण कश्मीर के कोकरनाग के बुमडूरा गांव में तीन उच्च-प्रशिक्षित आतंकवादी मौजूद हैं। यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीमें हरकत में आ गईं और गांव से बाहर निकलने के सभी रास्तों को सील कर दिया। सेना के साथ एक बाहरी घेरा बनाकर पुलिस और सुरक्षाबल गांव में पहुंचे। स्थानीय लोगों के मामूली विरोध के बाद सुरक्षा बल गांव में दाखिल हुआ।
सुरक्षा बलों को हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी सरताज की मौजूदगी की सूचना मिली थी। बुरहान की मौजूदगी की पुख्ता जानकारी नहीं थी। हालांकि पहले बताया गया था कि दोनों साथ ही रहते हैं। जब मुठभेड़ खत्म हुई तो मारे गए तीन आतंकियों में एक बुरहान भी था, तब सुरक्षा बल खुशी से झूम उठे। आरोप है कि 22 साल का बुरहान वानी पिछले तीन साल से कश्मीर में कई वारदातों को अंजाम दे चुका था। दक्षिण कश्मीर में वह काफी सक्रिय था। श्रीनगर, अनंतनाग और पुलवामा में पुलिस वालों के मारे जाने के पीछे उसी का हाथ बताया जाता है। पुलवामा जि़ले में स्थानीय लोगों और सुरक्षा बलों के बीच ताज़ा झड़प में 1 युवक के मारे जाने से, मरने वालों की संख्या 16 तक पहुंच गयी है। इन झड़पों में 200 लोग घायल हुए हैं। कश्मीर के अनेक हिस्सों में कफ्र्य़ू लगा दिया गया है। यूं कहें कि वहां लगातार हालात बिगड़ रहे हैं। पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है, जिससे की शांति का माहौल बने।
अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए दुनिया की जन्नत कहा जाने वाला कश्मीर हिमालयाई क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र 69 साल से भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। दोनों पड़ोसी देश इसके पूरे पर स्वामित्व का दावा करते हैं। भारत का कश्मीर के दो तिहाई भाग पर नियंत्रण है जबकि पाकिस्तान का एक तिहाई भाग पर नियंत्रण है। दोनों पड़ोसी देश 2003 में संघर्ष विराम पर राज़ी हुए और अगले ही वर्ष शांति प्रक्रिया शुरु की। उसके बाद से दोनों पक्षों के बीच एक दूसरे पर संघर्ष विराम के उल्लंघन के आरोप के साथ छिटपुट झड़पें होती रहती हैं। कश्मीर में पिछले दो दशक के दौरान हिंसा में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं। उधर, जेएनयू के छात्रनेता उमर खालिद ने बुरहान वानी को क्रान्तिकारी बताते हुए उसका पक्ष लिया। उमर ने बुरहान को चर्चित राइटर चे ग्वेरा से जोड़ते हुए फेसबुक पर लिखा कि चे ग्वेरा ने कहा था कि अगर मैं मारा भी जाऊं तो मुझे तब तक फर्क नहीं पड़ता जब तक कोई और मेरी बंदूक उठाकर गोलियां चलाता रहेगा। गौरतलब है कि उमर खालिद पर देशद्रोह के आरोप हैं। उस पर आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाने और देश विरोधी नारे लगाने का आरोप है। बेशक सेना और पुलिस बुरहान की मौत के बाद राहत की सांस ले रही हो, लेकिन जानकार कहते हैं कि इसके नतीजे काफी खतरनाक होंगे। कईयों को लग रहा है कि कहीं ऐसा ना हो कि बुरहान की मौत कश्मीर को आतंक के एक नये दौर में धकेल दे। सोशल मीडिया पर वीडियो एवं तस्वीरें डालकर युवाओं से बंदूक उठाने की अपील कर बुरहान चर्चित हुआ था। वैसे सुरक्षा बलों ने सोशल नेटवर्किंग साइटों पर बुरहान की कई तस्वीरों को हटवा दिया था लेकिन उसकी उसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई।
पुलिस ने जानकारी दी कि बुरहान और उसके दो साथी ऑपरेशन में मारे गए हैं। बीजेपी के नेता राममाधव ने कहा कि सरकार स्थिति से सख्ती के साथ निपटेगी। बीजेपी राज्य की महबूबा मुफ्ती गठबंधन सरकार में शामिल है। वहीं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुरहान के मारे जाने का विरोध किया है। यूं कहें कि भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में संदिग्ध चरमपंथी बुरहान वानी की एनकाउंटर में मौत के बाद हालात तनावपूर्ण हैं और लोगों का गुस्सा उबाल पर है। कश्मीर में स्थिति बेहद गंभीर है। लोगों का ग़ुस्सा और बढऩे की आशंका है। हालात अभी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं माने जा सकते हैं। 2010 में 135 लोग मारे गए थे। तब भी स्थिति बेहद नाज़ुक हो गई थी। यदि मौजूदा हालात नियंत्रण में नहीं किए गए तो जम्मू-कश्मीर उसी ओर बढ़ रहा है। देखना ये भी है कि सरकार इस मुश्किल हालात पर कैसे नियंत्रण करती है, क्योंकि जब नागरिक मारे जाते हैं तो जनता का ग़ुस्सा और भड़कता है। सरकार के लिए बड़ा मुद्दा बुरहान की हत्या के बाद इतनी बड़ी संख्या में लोगों का सड़कों पर आना है। इसकी वजह यह है कि पिछले कई सालों के दौरान कश्मीर के मुद्दे पर राजनीतिक कोशिशें नदारद रही हैं। राजनीतिक तौर पर कश्मीर के मुद्दे पर बात नहीं की जा रही है।
खैर, मौजूदा हालात के बार में केंद्र सरकार कह रही है कि स्थिति के साथ सख़्ती से निपटा जाएगा, लेकिन सवाल ये है कि ये सख़्ती किन पर की जाएगी। अगर आप नागरिकों के साथ सख़्ती करेंगे तो आप उसका जवाब जानते ही हैं। मुझे नहीं लगता है कि सख़्ती की बातों से ज़मीनी स्थिति में कोई बदलाव आएगा। जब तक इस मसले का राजनीतिक हल नहीं खोजा जाता और केंद्र सरकार राजनीतिक कोशिशें नहीं करती, तब तक नहीं लगता कि स्थिति बदलेगी। कश्मीर की बदकि़स्मती ये रही है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने किरदार बदलते रहते हैं। अब उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि बुरहान अपनी क़ब्र से युवाओं को चरमपंथ की ओर आकर्षित करेंगे। जो भी विपक्ष में होता है वो कश्मीरियत की बात करता है। जब महबूबा विपक्ष में थीं तब वो ऐसे बयान देती थीं, अब उमर अब्दुल्ला विपक्ष में हैं तो वो ऐसे बयान दे रहे हैं।
इस समय सकारात्मक बयानबाज़ी की ज़रूरत है। बुरहान ज़रूर एक आइकन बना हुआ था, लेकिन ये समझने की ज़रूरत है कि और युवा ये रास्ता न अपनाएं। कश्मीर के हालात पर सोशल साइट्स पर लिखा जा रहा है कि मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। उनकी पार्टी कश्मीर में सत्ता में है और हालात खऱाब होने का जि़म्मेदार उमर अब्दुल्ला को बताया जा रहा है। ग़लत। उमर नहीं बल्कि मोदी ने कश्मीर को बर्बाद किया है।
राजीव रंजन तिवारी

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