लोकतंत्र से खिलवाड़ है संसद ठप करना

लोकतंत्र से खिलवाड़ है संसद ठप करना

sansad-bhavanराष्ट्रपति संविधान के ट्रस्टी होते है, जो संवैधानिक संस्थाएं हैं जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका संविधान के अंतर्गत संचालित होती है या नहीं? इसका आंकलन करने का अधिकार राष्ट्रपति का होता है। इन संस्थानों में सीधा हस्तक्षेप राष्ट्रपति का नहीं होता लेकिन इनको वे दिशा निर्देश दे सकते हैं। लोकसभा या विधानसभा में जब राजनैतिक अस्थिरता होती है तो फिर राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ता है। इसी प्रकार बाह्य या आंतरिक आपातकाल लागू करने का अधिकार राष्ट्रपति का है, उन्हीं के हस्ताक्षर से अध्यादेश जारी होता है। 25 जून 1975 का वह काला दिन इतिहास में दर्ज हो चुका है, जब आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद को जगाकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल के अध्यादेश पर हस्ताक्षर करवाये। संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल लागू कर दिया गया। यह संविधान एवं लोकतांत्रिक भावना का आहत करने वाला अध्यादेश था इसलिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रपति किसी नेतृत्व या पार्टी से प्रतिबद्ध नहीं हो।
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 इस सर्वोच्च पद पर बैठने के बाद उन्हें संविधान के अनुरूप निष्पक्षता से व्यवहार करना होता है। यह सब जानते हैं कि इंदिराजी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने लोकसभा में निर्वाचित होने को निरस्त कर दिया था, इसके साथ ही चुनाव में भ्रष्टाचार फैलाने के आधार पर उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लडऩे के अयोग्य घोषित कर दिया। आपाताकाल के अत्याचारों और विपक्षी कार्यकर्ताओं और नेताओं को जेल में डालकर जो यातनाएं दी गईं, उसका भी काला इतिहास है। वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी है, उनका राजनैति व्यक्तित्व कांग्रेस से उभरा है, इसके बाद भी उनके कार्यकाल में एक भी अवसर ऐसा नहीं आया, जब उन्होंने पक्षपाती निर्णय दिया हो या संवैधानिक व्यवस्था या भावना के विपरित निर्णय लिया हो। 18 दिनों से विपक्ष के हंगामे एवं धरने के कारण संसद का कार्य ठप है। कोई कार्य नहीं होने से जनता का करोड़ों रुपये बर्बाद हो रहा है। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकसभा के लिए सांसद जनता के बहुमत से निर्वाचित होते है। इसी प्रकार संघात्मक व्यवस्था होने से हर राज्य की विधानसभा होती है। उनके विधायक भी जनता के बहुमत से चुने जाते है। उनके कार्यों की निगरानी के लिए राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल नियुक्त होते हैं।
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 यह विंडबना है कि विधानसभा और संसद में जनप्रतिनिधियों का आचरण जन भावना के अनुकूल दिखाई नहीं देता। चर्चा की बजाय वे हंगामा कर के मीडिया की चर्चा में बने रहना चाहते है। इन दिनों दलगत हित और स्वयं की छवि चमकाने के लिए इन सदनों का उपयोग होता है। चुने हुए प्रतिनिधि शायद यह भूल जाते हैं कि उनका सरोकार जनता से है न की किसी नेता या दल के प्रति। हंगामा, प्रदर्शन कर विपक्षी सदस्य अपनी छवि को निखारना चाहते हैं। आज तक ऐसा सर्वे नहीं हुआ जिसमें इस सवाल का जवाब मिलता है कि संसद एवं विधानसभा में चर्चा की बजाय हंगामा, धरना करने को आम लोग किस तरह देखते हैं? संसद में नोटबंदी, ममता बनर्जी का विमान कुछ मिनट देरी से उतरना, पं. बंगाल में रूटीन अभ्यास के लिए सेना की गतिविधि और प्रधानमंत्री को संसद में उपस्थित रहने को लेकर कांग्रेस, कम्युनिस्ट, राजद, बसपा आदि के सदस्य संसद में हंगामा करते रहे। हालात यह हुई कि राहुल गांधी का ट्विटर एकाउन्ट हैक होने पर संसद में हंगामा हुआ। ऐसा लगा कि ये सदस्य केवल अपने नेता और दल के प्रतिनिधि हैं, जनता के नहीं। इन्हें न लोकतांत्रिक मूल्यों की चिंता है और न जनभावना की। यदि हंगामा, धरना ही देना है तो सड़क, मैदान है, फिर संसद को अपनी दलीय और नेतृत्व के हित की राजनीति का अखाड़ा क्यों बनाया जाता। तृणमूल कांग्रेस के सांसदों को जनता ने चुना है, वे ममता बनर्जी द्वारा सेना पर आरोप लगाने के कथन का समर्थन कर हंगामा करने लगे। सेना जितनी भाजपा की है उतनी ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और सपा, बसपा की है, सेना पर झूठे आरोप लगाकर ममता बनर्जी ने देश विरोधी बयानबाजी की है।
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 हाल ही में इस संबंध में सुरक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने उन्हें पत्र भी लिखा है। इसी प्रकार कालेधन एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत आठ नवंबर को पुराने पांच सौ, हजार के नोटबंदी की घोषणा की, उससे संसद में लगातार हंगामा और गांधी प्रतिमा के सामने विपक्षी सांसदों का प्रदर्शन होता रहा। यह जाहिर हो गया कि विपक्ष को जनहित की बजाय स्व-हित और नेता-हित की चिंता है और उनकी चिंता यह भी हो सकती है कि कालेधन का जो मोटा चंदा काले धंधेबाज देते थे, उन पर रोक लगेगी। फिर नोटों का हार और टिकट में करोड़ों रुपए कैसे मिलेंगे? यदि विपक्ष को जनता की परेशानी की चिंता है तो वे मोदी सरकार पर बहस के द्वारा आरोप लगा सकते है। हंगामेबाज विपक्ष के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनके पास बहस का कोई ठोस आधार नहीं है। उनकी कठिनाई यह है कि उन्हें जनता ने नकार दिया है, सत्ता सुख के अभाव में वे बिना पानी मछली के समान तड़पते हुए अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। संसद में लगातार हंगामे से दु:खी होकर वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने हंगामे के द्वारा संसद की कार्यवाही रोकने की आलोचना करते हुए विपक्ष को समझाइश दी। इसी प्रकार हंगामा कर संसद की कार्रवाई में अवरोध पैदा करने से गुस्साए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि भगवान के लिए संसद को चलने दें। संसद अपना काम करे, संसद धरना प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि बहस और चर्चा के लिए है। संसद में हंगामा अल्पमत का बहुमत की आवाज को दबाने जैसा है।
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 उन्होंने संपदा निदेशालय के कार्यक्रम में कहा कि जनता अपने प्रतिनिधि को संसद में बोलने व उनकी समस्याओं को सदन में उठाते हुए उसका समाधान निकालने के लिए चुनकर संसद में भेजती है। राष्ट्रपति ने संवैधानिक भावना के अनुकूल हंगामेबाज विपक्ष पर जो फटकार लगाई, उसके बाद विपक्षी सदस्यों को हंगामे पर पछतावा करते हुए संसद की कार्रवाई में भाग लेना चाहिए। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के कथन का प्रभाव विपक्ष पर हुआ है, ऐसा नहीं लगता। दूसरे दिन भी विपक्षी सदस्य संसद में हो-हल्ला, हंगामा करते दिखाई दिए। यह मांग दोहराते रहे कि प्रधानमंत्री को सदन में उपस्थित रहना चाहिए। कांगे्रस के शहजादे राहुल गांधी का बदला स्वरूप दिखाई दिया। उनका मानना है कि नोटबंदी का निर्णय बिना सोचे समझे लिया गया। अब यह कहा कि यदि सदन में वे बोलते तो तूफान आ जाता। वे किस प्रकार के तूफान की बात करते है। क्या उनके व्यक्तित्व में यह योग्यता और क्षमता है कि उनके कथन से जनता आंदोलित हो जाए क्या उनके कथन से संसद की दीवारें हिल सकती है, जो अपनी रैलियों में पांच सौ लोग भी जमा नहीं कर सकते वे तूफान लाने की बात, हंसी ठिठोली का विषय हो सकती है। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव जनता ने विधानसभा, लोकसभा एवं उपचुनाव में देख लिया। उन्होंने कांग्रेस का जबसे नेतृत्व सम्हाला तब से कांग्रेस का सफाया हो रहा है, जनता ने उनके नेतृत्व को बुरी तरह नकार दिया है। जिनकी बातों से हवा भी नहीं चलती, उनके मुंह से तूफान की बात शोभा नहीं देती। उनकी बातों से केवल मुंह की हवा निकलती है। यह कांग्रेस का दुर्भाग्य होगा जब उनके नेता की गिनती हवाबाज नेता के रूप में होने लगे।-जयकृष्ण गौड़
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