लिव इन रिलेशनशिप का बढ़ता चलन

लिव इन रिलेशनशिप का बढ़ता चलन

आज के बदलते परिवेश ने लोगों के सोच व रहन-सहन में काफी परिवर्तन ला दिया है। व्यक्ति के विचार, मनोवृत्ति और समझ में आमूलचूल परिवर्तन आया है। आजकल की भागम भाग की जिन्दगी में करियर तथा शानो-शौकत की चाहत ने नये-नये रास्ते सुझाये हैं। लोगों का अपने परिवेश और जीवन के प्रति नजरिया बदला है।
सामाजिक रिश्तों को और पारदर्शी बनाने की कोशिश लगातार हो रही है प्रेम, विश्वास और रिश्तेदारी के भी मायने बदले हैं। इस संबंध में प्रेम विवाह, अन्तर्जातीय विवाह और सहजीवन का अस्तित्व सामने आया है। महानगरों में सहजीवन का प्रचलन तेजी से विकसित हो रहा है। सहजीवन यानी विवाह के बगैर आपसी अंडरस्टैंडिंग से किसी स्त्री-पुरूष का एक साथ रहना। पिछले दशकों में बिना शादी साथ-साथ रहने की एक नई सयता ने जन्म लिया है जिसे सहजीवन आधुनिक युग में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का नाम दिया गया है।
सहजीवन पश्चिमी जीवन शैली का भारतीय समाज में अंधानुकरण है। पश्चिमी देशों में इस प्रथा का चलन वर्षों से है और अब धीरे-धीरे यह प्रथा भारत में भी पांव पसारने लगी है हालांकि यह अभी अधिकांशत: महानगरों तक ही सीमित है। दहेज तथा अन्य ऐसी व्यवस्था के जरिये अर्थवाद हमारे देश में काफी बढ़ रहा है जिसके खिलाफ प्रेम विवाह या स्वतंत्र स्त्री-पुरूष संबंध एक आंदोलन की तरह विकसित हो रहे हैं।
मौजूदा पीढ़ी में और उभरती हुई नई पीढ़ी में यह नया सामाजिक संगठन भी नए रूपों में नई शक्ल ले रहा है। कहीं यह ‘बिजनेस पार्टनर’ जैसे संबंध की शक्ल में सामने आ रहा है तो कहीं ‘विवाह’ जैसी संस्था को ‘दकियानूसी’ करार देते हुए खुद को ‘अत्याधुनिक’ कहलवाने के फैशन के रूप में सामने आ रहा है। लड़के लड़कियां कई दिनों तक दोस्ती का रिश्ता निभाते-निभाते इस हद तक पहुंच जाते हैं कि वे अपने इन रिश्ते को शादी ब्याह के पवित्र बंधन से भी बड़ा समझने लगते हैं।
यह प्रवृत्ति पाश्चात्य प्रारूप तो नहीं किन्तु उस प्रारूप का असर जरूर है। सहजीवन में दो ऐसे स्त्री पुरूष बिना शादी के आपसी सामंजस्य के आधार पर रहते हैं जो किसी तरह के सामाजिक बंधन को स्वीकार नहीं करते। वे हर तरह की आजादी चाहते हैं और किसी भी मामले में किसी अन्य का हस्तक्षेप नहीं चाहते।
इनमें आपस में सामंजस्य तो होता है पर एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी अपनापन और कर्तव्यबोध का अभाव होता है। इन रिश्तों में स्त्री की स्थिति भी असुरक्षित और कमजोर होती है क्योंकि उम्र के ढलते पड़ाव पर अगर दोनों के रास्ते अलग हो जाएं तो पुरूष किसी तरह जिंदगी गुजार लेते हैं पर स्त्री खुद को व्यंग्यों और तानों के समक्ष असहाय पाती है।
चूंकि सहजीवन में जिम्मेदारियों का अभाव होता है अत: किसी भी परेशानी का सामना व्यक्तिगत रूप से करना पड़ता है। सामाजिक मान्यता प्राप्त न होने की वजह से ऐसे लोग सामाजिक संस्कारों का हिस्सा भी नहीं बन पाते। समय के साथ जब जरूरतें खत्म हो जाती हैं तो जीवन में एक ठहराव सा आ जाता है जिससे लोग मानसिक रोगों का शिकार भी हो सकते हैं। अकेलापन, घुटन और बोझिल सी जिंदगी जीवन के अंतिम पड़ाव में किसी के साथ के लिए तरसती रहती है। सहजीवन का दुखद पक्ष यह है कि वहां प्यार तो होता है लेकिन त्याग नहीं। अपेक्षाएं तो होती हैं लेकिन जिम्मेदारियां नहीं।
सहजीवन के पक्षधरों का कहना है कि यदि दो लोग साथ में समझदारी व आपसी सहमति के आधार पर साथ-साथ अपना जीवन बिताना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है। साथ रहने के लिए विवाह कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए।
रिश्तों की बुनियाद विश्वास और एक दूसरे के प्रति आस्था से ही बनती है। रिश्ते भले ही ऊपर से बनकर आते हैं पर अक्सर इस जमीन पर बनाये रिश्ते कई बार जेहनी तौर पर अधिक सुकून देने वाले साबित होते हैं। फिर अगर यह जमाने की मांग है तो हम इसमें मुंह क्यों मोड़ें। जब दो लोगों ने साथ रहने का फैसला कर लिया तो तीसरे को भला क्यों आपत्ति होनी चाहिए।
आपसी सहयोग, प्यार, विश्वास और सामंजस्य सहजीवन के आधार होते हैं। सहजीवन में विचारों का मेल आपसी समझ तथा अपनापन होता है। महानगरों में प्रचलन में आयी यह प्रवृत्ति वास्तव में पाश्चात्य संस्कृति की देन है जिसे बड़ी संख्या में धीरे-धीरे भारतीयों द्वारा भी अपनाया जा रहा है।
सहजीवन आधुनिक समय की मांग है। आज कैरियर को शादी विवाह से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिकतर स्त्री पुरूषों द्वारा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान करियर बनाते-बनाते इतनी लंबी उम्र निकल जाती है कि व्यक्ति अपने बारे में सोच नहीं पाते। ऐसे में सहजीवन विकल्प बनकर उनके सामने आता है।
झुलसती धूप में सौंदर्य निखार….!

परंपरा के खिलाफ जाकर स्त्री-पुरूष संबंधों का एक बेहतर विकल्प तो तभी स्थापित हो पाता है, जब वास्तव में स्त्री-पुरूष संबंध प्रचलित संबंधों से परिष्कृत, बेहतर, ज्यादा मानवीय और ज्यादा संवेदनशील स्तर पर स्थापित हो सकें। इसमें सफल हो जाना ही इस जोखिम के सौन्दर्य को तलाश लेना और उसे जी लेना है। इसलिए तो सहजीवन अगर सौंदर्य का जोखिम है तो साथ ही जोखिम का सौन्दर्य भी है।
भारतीय समाज के परिपेक्ष्य में लिव इन रिलेशनशिप के संबंध में निम्नलिखित बातें उभरकर सामने आती हैं:-
– शादी ब्याह के पवित्र बंधन को जब कोई अपनी आंखों से तितर-बितर होते देखता है तो उसका इस प्रथा से ही विश्वास उठ जाता है। लिव इन रिलेशनशिप का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है।
– मनोविज्ञान कहता है कि हर हालत में आपको समझने वाला और हर परिस्थिति में साथ देने वाले की तरफ आप आकृष्ट हो ही जाते हैं। यह एक दिमागी आकर्षण है जो एक दूसरे के साथ की मांग करता है। साथ ही समाज में बढ़ता आधुनिकीकरण ऐसे रिश्तों की नींव है।
– परिवार में उपेक्षित लड़के या लड़कियां सोशल सिक्यूरिटी के लिए अक्सर ऐसे कदम उठा लेते हैं।
– ऐसे रिश्तों का परिणाम हमेशा नकारात्मक ही होता हैं। लड़कों के मुकाबले ऐसे संबंधों से जुड़ी लड़कियों को इसका दुष्परिणाम ज्यादा भुगतना पड़ता है। एक नारी जब तक विवाह के बंधन में नहीं बंध जाती, तब तक हर कोई उसका फायदा उठाना चाहता है।
– लिव इन रिलेशनशिप में स्त्री को हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि कहीं उसका पुरूष साथी उसे छोड़ न दें। हमारे पुरूष प्रधान समाज में ऐसे लड़कों की शादी में कोई समस्या नहीं होती पर किसी लड़की के दामन में लगे इस दाग के साथ कोई भी उसे अपनाने को तैयार नहीं होता।
शादी के बाद कैसे करें नए रिश्तों से एडजस्टमेंट

– माता पिता की सहमति से हुए विवाह में अगर लड़के या लड़की का कोई अतीत होता है तो वह उन तक ही सीमित रहता है। शादी के बाद दोनों अपने रिश्ते को ईमानदारी के साथ निभाने की कोशिश करते हैं पर लिव इन रिलेशनशिप में दोनों एक दूसरे के अतीत को न सिर्फ जानते हैं बल्कि कई बार खुद उसका हिस्सा भी होते हैं। ऐसे में कई तरह की प्रताडऩा और तानों की शिकार सिर्फ महिलाएं ही होती हैं।
– लिव इन रिलेशनशिप को अपनाने वाली ज्यादातर महिलाएं मातृत्व के सुख से मुंह मोड़ लेती है। अगर मां बनती भी हैं तो इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि उसका पुरूष साथी उस बच्चे की कोई भी जिम्मेदारी उठायेगा।
– ऐसे संबंधों में पुरूषों को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास जरा कम ही होता है क्योंकि ऐसे संबंधों में आर्थिक से लेकर हर सुख-दुख में पार्टनर का बराबर का योगदान होता है।
– अनिल कुमार

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