लाखों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र है ‘कुमाऊं का मिनी हरिद्वार’

लाखों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र है ‘कुमाऊं का मिनी हरिद्वार’

 उत्तराखण्ड की तपोस्थल और अपने आप में पौराणिक इतिहास को संजाएं कुमाऊं का मिनी हरिद्वार रानीबाग वर्षों से श्रद्धालुओं की अमिट आस्था का प्रतीक बना हुआ है। पर्वतों की घाटियों में तथा नदियों के संगम में ज्ञान की खोज करने वाले तपस्वी जिस स्थान पर ब्रहम ज्ञान का अप्रत्यक्ष रूप में साक्षात्कार करते हैं, वस्तुत: वही स्थान तीर्थ कहलाता है। ऐसा ही एक श्रद्धा स्थल है रानीबाग जहां आने वाले प्रत्येक यात्री के मन में सात्विक श्रद्धा उदय होती है, दुष्प्रवृत्तियां दूर होती हैं तथा समस्त पापों का नाश होता है।
उत्तराखण्ड का प्रवेश द्वार कहे जाने वाला यह स्थान चारों ओर से विशाल शिलाखण्डों से अटी पड़ी पहाडिय़ों से घिरा है। रानीबाग का वर्णन पुराणों में भी अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया है। इस दर्शनीय तीर्थस्थल के पश्चिम में मार्कण्डेय ऋषि का तप कुण्ड है जहां पर वर्षों तक तपस्या कर उन्होंने ताड़ के पत्ते पर ईश्वर के बाल सुलभ दर्शन किए थे। पूर्व में हैडाखान बाबा का सुंदर कलात्मक वास्तुकला का उत्कृष्ट प्रदर्शन करता आश्रम है तो उत्तर दिशा में कामक्षा शिला व उससे जुड़ा छोटा सा मन्दिर। कामक्षा शिला के विषय में प्रसिद्ध है कि यह सती के दुग्ध शरीर से गिरे 52 टुकड़ों में से एक है। रानीबाग मार्कण्डेय ऋषि के अतिरिक्त गर्ग ऋषि तथा सुतप ब्रह्म आदि मुनियों की भी तपस्थली रही है। गर्ग मुनि के नाम पर ही यहां बहने वाली नदी का नाम गार्गी पड़ा। नैनीताल तथा भीमताल की दिशा से काफी लम्बा रास्ता तय करते हुए नदी की दोनों धाराओं का संगम भी यहीं पर होता है। वैसे तो इस नदी में अनेकों धाराएं आ कर मिलती हैं परंतु इनमें पुष्पभद्रा, कमल भद्रा, सुभद्रा, चन्द्रभद्रा तथा शेषभद्रा मुख्य हैं।
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नदी के तट पर स्थित है रंग-बिरंगे पत्थरों से निर्मित स्त्री घाघरे के स्वरूप का आभास देती विशाल शिला। इस शिला के विषय प्रसिद्ध है कि नदी चाहे कितने ही अधिक वेग से बहे परंतु यह शिला अपने स्थान पर अडिग रहती है। कहते है सुतप ब्रहम ऋषि की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने अनेक रत्न जडि़त आभूषणों से विश्वकर्मा द्वारा शिखा का निर्माण करवाया तथा शिला पर आसन ग्रहण कर ऋषि को वरदान दिया। इस स्थान का नाम रानीबाग क्यों पड़ा, इस विषय पर अनेक किंवदंतियां प्रचालित हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार कत्यूरी वंश की रानी जियारानी ने अपने शासन काल में आम व अमरूद के वृक्षों का एक विशाल बाग लगाया और शायद इसीलिए इसे रानीबाग कहा गया। रानीबाग की प्रतिष्ठा सर्वविदित है। उत्तरायणी पर्व, मकर संक्रांति, माघ पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, वैशाख पूर्णिमा तथा शिवरात्रि के अवसर पर पवित्र नदी में स्नान के लिए हजारों की संख्या में भक्त यहां आते हैं। इन अवसरों पर जो जन सैलाब उमड़ता है, उसकी प्रतिध्वनि जग जाहिर है। रोजमर्रा की आपाधापी तथा पाश्चात्य सभ्यता के मध्य भी यह क्षेत्र अपनी पहचान व अस्मिता को सुरक्षित रखे हुए है और संजोए हुए है एक सुनहरा इतिहास।  कुमाऊं के इस मिनी हरिद्वार में स्थित है चित्रशिला घाट जहां दूर-दूर से लोग दाह संस्कार हेतु आते हैं। विभिन्न मेलों के अवसर पर श्रद्धालु नदी में स्नान करने के पश्चात जिया रानी की गुफा में जाना नहीं भूलते। नदी से काफी ऊपर पहाड़ में प्राकृतिक रूप से बनी इस छोटी सी गुफा के विषय में भी एक रोचक कथा प्रचलित है।
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ई. 905 महाभारत काल में सम्पूर्ण कुमाऊं व गढ़वाल में कत्यूरी राजाओं का राज्य था। मुगल काल में जियारानी ने इस क्षेत्र पर राज्य किया था। उसी समय की बात है कि एक बार रानी गार्गी नदी में स्नान कर रही थी तब कुछ ही दूर पर रह रहे मुगल सैनिकों ने उसे नहाते देख उसका पीछा किया। अपनी अस्मिता की रक्षा हेतु रानी गुफा में प्रवेश कर गायब हो गयी। कहते हैं उस समय यह गुफा हरिद्वार में जा कर खुलती थी। शायद इसीलिए रानीबाग को मिनी हरिद्वार के नाम से अधिक जाना जाता है। अपने आप में नैसर्गिक सौंदर्य से वशीभूत रानीबाग प्रकृति का अनुपम उपहार है। यहां पर एक बार जो आता है वह मन से सदा के लिए यहीं का होकर रह जाता है। रानीबाग अन्य तीर्थ स्थलों की तरह हर धड़कन व विश्वास को टटोलता है परंतु फिर भी इस नगरी की अनुगूंज सभी के लिए मील का पत्थर है। सुंदर कलात्मक मन्दिर व एक मौन भटकती नदी के किनारे स्थित मिनी हरिद्वार आइना है मानवीय प्रतिछाया तथा प्रकृति के अभिलेखों का और प्रतिबिंब करता है उन लोगों की भक्ति भावना को जो सुख व शांति की तलाश में यहां आते हैं।
– दीपक नौंगाई

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