लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई…ये अभी सेमी फाइनल है नोटबंदी का !

लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई…ये अभी सेमी फाइनल है नोटबंदी का !

गरीब मर रहा है, अमीर डर रहा है। उद्योग बंद, व्यापार बंद, एटीएम बंद, धंधे बंद, पर खुश है चन्द! मजदूर घर लौटने को मजबूर। मोदी हैरान, विपक्ष परेशान, किसान बेकार, काला धन गुलाबी हो गया। लोग लाइन में खड़े के खड़े रह गए। आंतकवाद रूका नहीं, भ्रष्टाचार मिटा नहीं है। जीडीपी रेट घट गई। पूरा देश मंदी के वाटर लू का मैदान बन गया। तब मोदी जी ने सोचा भी नहीं होगा कि नोटबंदी से कितनी बड़ी मंदी आ जायेगी। आखिर, इस नोटबंदी से फायदा किसका हुआ?
जब आठ नवबंर को मोदी जी ने पांच सौ व एक हजार रूपये के नोट को कागज का एक टुकड़ा बना दिया था। तब नोटबंदी पर मेरी प्रतिक्रिया थी कि लाइन में खड़ी लोगों की यह कतारे अभी तो इन गरीबों की मुसीबतों का सेमीफाइनल मात्र ही है। असली मुसीबतें तब शुरू होगी, जब नोटबंदी से पैदा हुई, नोटों की तंगी से व्यापार व उद्योग धंधे दोनों चौपट हो जायेंगे, जिससे बेरोजगारी बढ़ेगी। बदहाली फैलेगी। आज मुरादाबाद का पीतल उद्योग दम तोड़ चुका है। अलीगढ़ की ताला फैक्ट्रियों में ताला लग चुका है। भदोई के कालीन उद्योग के कारीगर बेरोजगार हो चुके है। हरियाणा, पंजाब का कपड़ा उद्योग कंगाली की कगार पर है। व्यापार में भारी मंदा है।और चौपट सारा धंधा है।
दुनिया में जितनी भी सरकारों की प्लानिंग होती है, या हुई है। वह विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कींस के बताए मार्ग पर हुई है। कीन्स ने कहा था कि Inflation is unjust but deflation is inexpedient इन फलेसन इज अनजस्ट, बट डिफलेशन इज इनएक्सपैडियेंट। यानि महंगाई एक डकैती है तब वहीं मंदा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। दोनों बुराईयों में मंहगाई से मंदी ज्यादा खतरनाक है। यहीं कारण है कि सन 1936 में अमेरिका में आई भयानक मंदी से निपटने के लिए अमेरिकी सरकार ने हजारों टन गेंहू समुन्द्र में डूबों दिया था। कीन्स ने मंदी से निपटने के लिए एक फार्मूला सुझाया था और कहा था कि सरकारों को महंगाई निरन्तर बढऩे देना चाहिए। जब मंहगाई बढ़ती है तो Less efficient firm लेस एफीसेंट फर्मों को भी मुनाफा होने लगता है और जब मुनाफा होता है तो नये-नये उद्योग धंधे खुलने लगते है। जिससे ओर अधिक लोगों को रोजगार मिलता है और उनकी क्रय शक्ति बढ़ जाती है। क्रय शक्ति बढऩे से लोग अधिक मात्रा में खरीदारी करने लगते है। जिससे मुनाफा और अधिक बढ़ जाता है और नये-नये उद्योग लगते है। इस प्रकार विकास का आर्थिक चक्र चलने लगता है। ध्यान देकर देखे तो जिन देशों में महंगाई है, वहीं देश उन्नतशील है। कींस की यह भी सोच थी कि प्रत्येक व्यक्ति की उपभोग करने की अपनी एक प्रवृत्ति होती है। There is prevencity to consume देयर इज ए प्रिवेनसिटी ऑफ टू कंज्यूमी। और आदमी अपनी इस प्रवृत्ति से नीचे नहीं जा पाता है। एक कवि ने लिखा भी है कि-
बढ़त-बढ़त सम्पत्ति सलिल, मन सरोज बढ़ जाए।
घटत-घटत पुनि ना घटे, बर समूल कुम्बलाहे।।
कींस का ये भी कहना था कि जब आदमी की आमदनी बढ़ती है तो वो उसकों खाने में खर्च करता है। या वो उसको अपने ऊपर खर्च कर सकता है या फिर अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए व्यापार में लगा सकता है। आम आदमी उस पैसों को अपने ऊपर खर्च न करके उत्पादन में लगाए इसलिए सरकारें उत्पादन के लिए अल्प बचत के रूप में आम आदमी से उसके धन को उत्पादन में लगवा देती है और इसलिए सरकारें अल्प बचत पर जोर देती है। कींस ने भी अल्प बचत पर जोर दिया था। कींस का कहना था कि इससे अर्थ व्यवस्था मजबूत होती है।
नोटबंदी से पैदा हुई किल्लत से मंदी आना निश्चित है। जिसका नुकसान अंतता गरीबों को ही भुगतना पडेंगा। जो नोटबंदी गरीबों के नाम पर उनके हितों में की गई है वो आगे चलकर गरीबों को ही भारी पडऩे वाली है। मंदी से गरीब बेरोजगार हो जायेंगे। उद्योग-धंधे बंद होंगे, व्यापार बंद होगा तो मजदूरों की छटनी भी जरूर होगी। जिन-जिन देशों में नोटबंदी हुई है, उसके दुष्परिणाम ही निकले है। विकास दर घट गई है, अर्थ व्यवस्था बिगड़ गई है।
दिल्ली की जामा मस्जिद पर एक टीवी चैनल द्वारा नोटबंदी के बारे में जब पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मोदी जी हम तो आपके घर के आदमी थे, जब चाहते हमारे कान पकड़ लेते, पर पहले तो विदेशों में बैठे काले धन वालों का कान पकड़ों, जिनका आपने 15-15 लाख रूपये काला धन लाकर गरीबों को देने का वादा किया था। विदेशों से तो आप काला धन नहीं ला सके, क्योंकि वह भाई-बन्धुओं और बड़े-बड़े लोगों का मामला था। पर आपने भारत में नोटबंदी कर दी। गधों से जब पार नहीं बसाई तो हम कमजोर गधाईयों के कान ऐंठ डाले।
यदि नोट बंदी की हवा निकलती है। तब इसका ठीकरा बैंकों के सिर पर भी अवश्य फूटेगा। जिसने काले धन को गुलाबी कर पिछले दरवाजे से बाहर कर दिया। 90 लोगों की लाइन में खड़े होकर मौत हो गई। नोटों का कारवां गुजर गया और लोग कतारों में खड़े नोटों का गुबार ही देखते रह गए। काले धन के कतारों में वह लोग खड़े कर दिए गए, जिन पर धन ही नहीं था।
अंकल, कल वाली ज्यादा मस्त थी…!

मोदी जी की इस समय सबसे बडी समस्या यह है कि नोट उस मात्रा में छप नहीं पा रहे है, जितनी आवश्यकता है। उन्हें डर सता रहा है कि 30 दिसंबर के बाद यदि गरीब सड़कों पर आ गया तब उससे कैसे निपटा जाएगा। जिसकी आशंका सुप्रीम कोर्ट ने भी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालात गंभीर है, यदि यहीं हाल रहे तो दंगे भी भड़क सकते है। मुश्किल यह है कि अब तक तो पांच सौ और हजार रूपये के पुराने नोटों से भारत की अर्थव्यवस्था की गाड़ी खिच रही थी। 30 दिसंबर के बाद पांच सौ व हजार के नोट भी बंद हो जायेंगे। तब क्या होगा। पहले तो तीन लाख करोड़ छह माह से चल रही रिजर्व बैंक की तैयारी से बैंकों में नए नोट आ गए थे। अब उतनी तेजी से नोट नहीं छप पा रहे है। कुल 12 लाख करोड़ नोटों को छपना है। भूतपूर्व वित्त मंत्री पी. चन्द्रम के अनुसार नो करोड़ रूपये और छापने के लिए कम से कम सात माह लगेंगे। ना तो सरकार के पास अब नये नोट है और ना उसके लिए कागज है। उन्हें नोटबंदी ना तो उगलते बन रही है और ना निगलते बन रही है। रीछ ना तो कंबल को छोड़ रहा है और ना कंबल रीछ को छोड़ पा रहा है। इसलिए मोदी जी अब भ्रष्टाचार और काला धन की बात छोड़कर, प्लास्टिक नोट और कैश लेस की बात कर रहे है। कैश लेस की बात वह उस विशाल भारत में कर रहे है, जहां 90 प्रतिशत व्यक्ति कम्प्यूटर चलाना ही नहीं जानता है। जहां 70 प्रतिशत व्यक्ति निरक्षक है। भारत एक विशाल देश है, उसकी अर्थव्यवस्था भी बड़ी है। ये भारत को कैसे सूट कर सकती है। हो सकता है कि यह किसी छोटे देश को सूट करती हो।
इस सन्दर्भ में मुझे एक कहानी याद आती है, कि एक गधा और ऊंट पक्के दोस्त थे। एक दिन वह गांव में टहलने के लिए निकले। तो उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला। गांव के पास में एक नदी बहती थी। नदी के दूसरी पार उन्हें फल दिखाई दिए। ऊंट बोला कि चलों नदी पार कर फल खाने चलते है। गधा बोला कि नदी का पानी गहरा है। ऊंट बोला कि तुम रूकों में देखकर आता हूं। ऊंट नदी पार करके लौट आया और गधे से बोला कि चलों गले-गले पानी है। गधा समझदार था। उसने कहा कि मित्र तेरे ही तो गले-गले है पर मैं तो छोटा हूं, मैं तो डूब जाऊंगा। एक ही चीज दो लोगों के के लिए एक सी नहीं होती है। वैसे भी जिस-जिस देश में नोटबंदी हुई है। उन-उन देशों के विकास को जाम ही लगते देखा गया है।
मोदी जी आजकल गरीबों की बात बहुत करते है, उनका प्यार गरीबों की तरफ इतना बढ़ गया है कि उन्होंने मुरादाबाद में कह डाला कि जो पैसा, जन-धन खातों में गरीबों के धनवानों ने लगा दिया है, वो इसे वापिस ना करे। मैं रात दिन यहीं सोच रहा हूं कि यह पैसा गरीबों का कैसे हो जाए। इस बात ने मोदी जी की नैतिकता को ही सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
राजनीति का सिद्धांत हमेशा बांटों और राज करो करने का रहा है। भारत में यह बंटवारा अब तक जाति, मजहब और क्षेत्र के आधार पर होता रहा है। पर यह पहली बार हुआ कि इतने बड़े पैमाने पर गरीब और अमीर को मोदी जी ने अलग-अलग, आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है। जिसे मोदी जी की एक सफल इमोशनल राजनीति समक्षकर विपक्ष परेशान और हैरान है।
विपक्ष आज मोदी जी के नोटबंदी के चक्रव्यू में बुरी तरह से फंस चुका है, उसकी समझ में यह नहीं आ रहा है कि मोदी जी के गरीब को अमीर से लडाने के नोटबंदी के ट्रम कार्ड को कैसे खेले और कैसे काटे। उन्हें लग रहा है कि जात-पात और मजहब से ऊपर उठकर भारत की 95 प्रतिशत गरीब जनता मोदी जी को कहीं अमीरों के विरूद्ध वोट ना कर जाए। विपक्ष इसलिए संसद में कभी तूफान आ जाएगा की बात करता है, कभी मोदी जी को लाइव पालियामेंट में देखना चाहता है, कभी नोटबंदी को सही बताता है, कभी शोर मचाता है, जबकि आम जनता को उनकी इन बहके-बहके आरोपों से कुछ लेना-देना नहीं है।
कहानी-बदनाम बस्ती
आज मोदी सरकार पर विश्वास का संकट गहरा गया है। जबकि विश्वास का दूसरा नाम ही सरकार है। जामा मस्जिद पर एक टीवी चौनल को लोगों द्वारा कहते हुए सुना गया कि इस सरकार पर हम कैसे विश्वास करे, यह घडी-घडी गुलाटी मारती है। मोदी जी की यह कैसी सरकार है जो सुबह को कुछ कहती है, दोपहर को कुछ कहती है और रात को फिर बदल जाती है।
इस मामले में हमसे से ज्यादा ब्रिटिसस का चरित्र ऊंचा निकला। द्वीतीय महायुद्ध में हिन्दुस्तान की जनता का काफी पैसा अंग्रेजी सरकार पर ऊधार हो गया था। सन 1939 में द्वीतीय महायुद्ध हुआ था और 1947 में भारत आजाद हो गया था। आजादी के बाद इंग्लैंड की संसद में यह सवाल उठा कि भारतीयों का कर्जा हम क्यों लौटाए। कुछ सांसद इस पक्ष में थे कि भारत का कर्जा ना लौटाया जाए। उनका तर्क था कि भारत एक कमजोर देश है। भारत अब तक तो हमारा गुलाम था, वो हमारा क्या कर लेगा। लेकिन अधिकांश ब्रिटिस सांसदों ने कहा कि नहीं कमिटमेन्ट इज कमिटमेन्ट, और उन्होंने भारतीय कर्जे के बदले में हमें विशाल विक्रांत जहाज, अनेक तोपे और भारी मात्रा में बहुत सारा सामान लौटा दिया था। लेकिन मोदी जी अपने किसी कमिटमेंट पर भी खड़े दिखाई नहीं देते है। पहले मोदी जी नोटबंदी से कालाधन निकालने, भ्रष्टाचार से लडऩे और पाकिस्तानी आतंकवाद को खत्म करने की बात करते थे। पर अब वह कैशलेश अर्थव्यवस्था बनाना चाहते है। यानि वह अब देश को भी घुमा-फिरा रहे है। अब उनका उद्देश्य ही बदल गया है। बात अब प्लास्टिक मनी की भी चल रही है। मोदी जी अब प्लास्टिक सिक्का भी चलाना चाहते है। कभी किसी बादशाह ने चमड़े का सिक्का चलाया था। जिसका अंजाम सबकों मालूम है।
भ्रष्टाचार के मामले में मोदी जी के दो पैमाने लगते है। व्यापारी उन्हें भ्रष्ट दिखाई देता है। पर सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार पर उनकी चुप्पी रहस्यमयी है। भाजपा एक बनियों की पार्टी मानी जाती है। सबसे अधिक यहीं लोग मोदी-मोदी चिल्लाते है। संघ के प्रचारकों को भी यहीं पोषित करते है। लेकिन आज वहीं व्यापारी वर्ग सबसे अधिक मोदी जी के निशाने पर है। पहले व्यापारी वर्ग को एफडीआई की मार, फिर बिग बाजार और अब नोटबंदी से व्यापारी बहुत आहत है। व्यापारी वर्ग मोदी जी से नाराज है। ये भी सत्य है कि वह भाजपा को छोडकर किसी और पार्टी को वोट नहीं देंगा। भाजपा से नाराज होने पर वो घर बैठ जाता है। भाजपा को भी वोट डालने नहीं जाता। नोटबंदी से अब बैंकों को भी
खतरा पैदा हो गया है। बैंकों में जितना पैसा जमा होता है, वह जनता का होता है, सरकार का उसमें कोई पैसा नहीं होता है। नोटबंदी के बाद जनता बैंकों में नया पैंसा जमा नहीं करा रही है, सवाल यह है कि अब बैंक चलेंगे कैसे। जब उनमें न डिपोजिट होंगे और न एफडी होगी।
क्या मोदी जी अपनी छवि में कैद हो गए है। विरोधियों का आरोप है कि मोदी जी नोटबंदी से केवल अपनी टीआरपी बढ़ा रहे है। मोदी जी हर सर्जिकल स्ट्राईक चाहे वह आर्थिक हो या पाकिस्तान के खिलाफ हो, केवल वोटों के लिए कर रहे है। एक सवाल और है क्या मोदी जी पार्टी से ऊपर उठकर भाजपा को पीछे छोडऩा चाहते है, जब वह कहते है ना मेरा कोई नेता है और ना कोई हाईकमान है। पर इसमें भी दो मत नहीं हो सकते है कि गरीबों में उनकी टीआरपी बढ़ी है।
जयललिता की मौत पर तमिलनाडु बहुत रोया था। क्योंकि जय ललिता की सोच पॉजीटिव थी। उसने गरीबों को पांच रूपये की थाली उपलब्ध कराई। ब्राहमण होकर भी दलितों को 70 प्रतिशत आरक्षण दिलाया। मोदी जी की नोटबंदी की सोच पॉजीटिव कम और नेगेटिव ज्यादा लगती है। जब वह कहते है कि मैं बेईमान धनवानों को छोडूंगा नहीं। अगर मोदी जी की सोच जयललिता जैसी पॉजीटिव होती और वह केवल गरीबों को ऊपर उठाने की बात करते तब बात कुछ ओर होती।
-शिवकुमार अग्रवालवरिष्ठ पत्रकार व वरिष्ठ अधिवक्ता
संपर्क सूत्र-8476882882 

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