लघु कथा: समझौता

लघु कथा: समझौता

pushplataझूठ ने एक बड़े झूठों के सरदार से सहायता ली और एक बड़े पद पर आसीन हो गया। सच को रोज कुतरकर खा जाता। सच हताश निराश उदास अब रोने चीखने की हिम्मत नहीं थी। उसके जिस्म से लहू की बूंदें बह चली शहर में शोर मच गया। झूठों की सभा हुई इस मुसीबत से कैसे निपटे झूठों का सरदार बोला हमारी उपलब्धियों के बड़े बैनर के साथ एक जलसा करो उसमें सच को बुलाओ हाँ संचालन किसी सच के सहायक से करवाना और एक दो सच्चे के हिमायतियों को विशिष्ट अतिथि भी बनाना पूरे शहर को आमंत्रित करना। विशेष रूप से झूठ के खिलाफ चिल्लाने वालों को। बोला आने लायक नहीं है सरदार। सरदार बोला उसे कहो तुम्हारा सम्मान करेंगे। मरा हुआ भी उठकर आएगा। सहायक बोला मगर इस तरह तो सच का महिमा मंडन करने से वह फिर से बड़ा हो जायेगा सरदार ने कहा जितना कहा उतना करो बाकि बाद में। मगर उपलब्धि याँ सहायक बोला। तुरंत कुछ फोरी उपलब्धियां जुटाओ, सरदार ने कहा। विशाल आयोजन हुआ सच भी सज धज कर वहां पहुंचा। तैयार होते हुए बेहोश हो रहा था मगर सम्मान का मोह खींच रहा था। मंच पर उसने आयोजक की उपलब्धियों और प्रशस्ति में झूठे कसीदे गढ़े मगर आँख से वहां भी लहू की बूंद के दो आंसू निकल पड़े। झूठों के सरदार और सहायकों ने मन ही मन गालियां बकी। उसके बाद झूठ ने अपने सभी सहायकों को सम्मान दिया। सहायक बोला सच का क्या करें सरदार बोला, हमारा काम हो गया जाने दो। सच फिर से कोठरी में। आज फिर उसकी कोठरी से लहू की बूंद निकली। आज फिर एक सम्मान का निमंत्रण पत्र आया है। सच का सहायक बोला हमारी सहायता से ही झूठ फल फूल रहा है। सच बोला क्या करूँ व्यवस्था है जीने के लिए समझोता करना पड़ रहा है।
डॉ. पुष्पलता

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