लघु कथा: अंतिम पैग

लघु कथा: अंतिम पैग

एक-एक बार और डालो। मित्र-मंडली बैठी हुई थी, फार्म-हाउस पर चने-मुरमुरे के साथ चार पैग हो चुके थे। मैं, दो के बाद ही अब नहीं, और नहीं की रट लगा रहा था लेकिन मेरी सुन कौन रहा था?
पांचवा पैग भरा जा चुका था … और उसे देखकर मुझे पिछले ऐसे ही एक दिन की याद आ गई, जब ‘एक और पैग’ के बाद मैंने जोरदार उल्टियाँ की थी और यही सारे हमदर्द दोस्त हँसते रहे थे।
इतना ही नहीं, सुबह मेरी पत्नी के सामने सभी ने मुझे ‘बेवड़ा’ साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सबूत के तौर पर उल्टियों से सने हुए कपड़े मेरी पत्नी को भेंट स्वरुप दिए गए … तब वह सब तो चले गए लेकिन पत्नी की आँखों में आंसू छोड़ गए। मेरा बेटा उससे दिन भर पूछता रहा,मम्मी! पापा दिन में भी क्यों सो रहे हैं?मुझे उनके साथ खेलना है… आज तो सन्डे है!
मेरा सर भारी-भारी बना रहा और मैं शाम तक बिस्तर पर पड़ा रहा। शाम को उठा तो पत्नी चाय लेकर आयी। तब मैंने झेंप मिटाते हुए कहा था- वो दोस्तों ने जबरदस्ती कई पैग… …
जब आपको एक औरत पसन्द करती है, तब आप एक पति हैं.. !

मैंने कभी मना किया है आपको, मेरी बात काटते हुए वह बोली।
लेकिन इतना ज्यादा क्यों पी लेते हैं आप, जब बर्दाश्त नहीं होता?
बच्चा बड़ा हो रहा है, क्या असर होगा उस पर?
अचानक मेरी तन्द्रा भंग हुई। फार्म-हाउस पर दोस्तों के ठहाके जारी थे।
मुझे सन्डे को बच्चे के साथ खेलना है, यह सोचकर मैंने भरा हुआ पैग उठाया और बाथरूम की तरफ चल पड़ा। मेरे दोस्त कुछ समझते, उससे पहले ही वह शराब वाश-बेसिन में बहा दिया।
जंकफूड से बचें

तबसे कभी मेरे दोस्तों ने ‘अंतिम-पैग’ के नाम पर जिद्द नहीं की। शायद उन्हें पता चल गया था कि संडे को अपने बच्चे के साथ मैं खेलता हूँ जो मेरे लिए किसी भी ‘अंतिम-पैग’ से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
– मिथिलेश कुमार सिंह

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