लघुकथा-विश्वास

लघुकथा-विश्वास

क बहुत ही सज्जन व दयालु स्वभाव के व्यक्ति थे. उनके पड़ोस में एक महात्मा जी रहते थे. मोहनलाल जी के यहां से उन्हें प्रतिदिन रात का भोजन प्रदान किया जाता था. एक दिन महात्मा जी ने मोहनलाल को याद किया. वह तत्काल उनके पास पहुंचे.महात्मा जी ने कहा, ‘‘मुझे आप पर आने वाली विपत्ति का संकेत प्रतीत हो रहा है. क्या आप कोई बहुत बड़ा निर्णय निकट भविष्य में लेने वाले हैं?’’ मोहनलाल जी ने बताया-‘‘मैं अपने दोनों पुत्रों के बीच अपनी संपत्ति का बंटवारा करना चाहता हूं.’’ महात्मा जी ने यह सुनकर कहा- ‘‘आप अपनी संपत्ति के दो नहीं, तीन भाग कीजिये और एक भाग अपने लिये बचाकर रख लीजिये. इससे आप को जीवन में किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.’’मोहनलाल जी ने महात्मा जी की बात पर ध्यान न देते हुये संपत्ति का वितरण किया तो उसके दो ही हिस्से किए.धीरे-धीरे मोहनलाल जी को अनुभव होने लगा कि उनके बच्चे उद्योग-व्यापार और पारिवारिक मामलों में उनकी दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते हैं. कुछ माह में उनकी उपेक्षा प्रारम्भ हो गयी और जब स्थिति मर्यादा को पार करने लगी तो एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी के साथ दुखी मन से अनजाने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करने हेतु घर छोड़ दिया.जाने के पहले वह महात्मा जी के पास मिलने गए. उन्होंने पूछा, ‘‘आज बहुत समय बाद कैसे आए?’’ मोहनलाल जी ने उत्तर दिया, ‘‘मैं प्रकाश से अंधकार की ओर चला गया था और अब वापस प्रकाश लाने के लिये जा रहा हूं. मैं अपना भविष्य नहीं जानता, किंतु प्रयासरत रहूंगा कि सम्मान की दो रोटी प्राप्त कर सकूं.’’ महात्मा जी ने उनकी बात सुनी और मुस्कराकर कहा, ‘‘मैंने तो तुम्हें पहले ही आगाह किया था. खैर, मेरे पास काफी धन पड़ा है, जो मेरे लिये किसी काम का नहीं है. तुम इसका समुचित उपयोग करके जीवन में आगे बढ़ो और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करो.’’महात्माजी के रुपयों से मोहनलाल जी ने पुनः व्यापार प्रारम्भ किया. वे अनुभवी एवं बुद्धिमान तो थे ही, बाजार में उनकी साख भी थी. उनका व्यापार चल पड़ा.इस बीच उनके दोनों लड़कों की आपस में नहीं पटी और उन्होंने अपने व्यापार को चौपट कर लिया. व्यापार चौपट होने के कारण भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे दोनों पुत्र उनके पास पहुंचे और सहायता मांगने लगे.मोहनलाल जी ने स्पष्ट कहा, ‘‘इस धन पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. मैं तो एक ट्रस्टी हूं जो इसे संभाल रहा हूं. तुम लोग अगर सहायता चाहते हो तो उन्हीं महात्मा जी के पास जाकर निवेदन करो.’’ जब वे वहां पहुंचे तो महात्मा जी ने उनकी सहायता करने से साफ इन्कार करते हुए कहा, ‘‘जैसे कर्म तुमने किये हैं उनका परिणाम तो तुम्हें भोगना ही होगा.’’ [साभार-रचनाकार]–
राजेश माहेश्वरी
सम्पर्कः 106, नया गांव, रामपुर (म.प्र.)

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