लघुकथा: अंतिम इच्छा

लघुकथा: अंतिम इच्छा

 हरदीप का बापू मृत्यु शैय्या पर लेटा अपने जीवन की अन्तिम घडिय़ां गिन रहा था। घर के सभी लोग उसकी चारपाई के इर्द-गिर्द सिमटे खड़े थे। हरदीप के बापू ने जब देखा कि वह अब कुछ ही देर का मेहमान है तो उसने अपनी टूूटती हुई आवाज में हरदीप से कहा, ‘पुत्र, मेरा अन्त समय आ गया है – अब मैं बचूंगा नहीं – मेरी अन्तिम इच्छा है कि मेरे मरने के बाद तू मेरा नाम ऊंचा करना – ताकि लोग मुझे याद करते रहें……।’
मानसिक रोगों का जनक भी है शोर…जानिये कौन सा शोर कितना है नुकसानदायक…?

इतना कहकर हरदीप के बापू ने प्राण त्याग दिए। अपने बापू का दाह-संस्कार करने के बाद हरदीप इस सोच में डूब गया कि अब वह अपने बापू की अन्तिम इच्छा कैसे पूरी करे? उसके बापू ने तो अपना सारा जीवन लड़ाई झगड़ों और मुकद्दमों में ही व्यतीत कर दिया था। जिसका नाम जीवित अवस्था में ही निम्न रहा हो, उसका नाम मरने के बाद भला कैसे ऊंचा हो सकता है? यह भोले-भाले हरदीप को समझ नहीं आ रहा था। उसे तो बस अपने बाप की अन्तिम इच्छा पूरी करनी थी चाहे जैसे भी पूरी हो।
जरा सा बाहर निकलने पर सताने लगती है चिंता….ठंड से डरना कैसा…?

आखिर कई दिनों की सोच के बाद उसे एक युक्ति सूझ ही गई। उसने भी अपने बापू की तरह गांव के लोगों के साथ व्यर्थ में लडऩा-झगडऩा आरम्भ कर दिया। दिन बीतते रहे और फिर एक ऐसा दिन भी आया जब गांव के लोग उसकी हरकतों से तंग आकर कहने लगे, ‘अरे, इस बदमाश हरदीप से तो इसका बाप गुरनाम ही कहीं अच्छा था। बेचारा जब तक जिया, शान से जिआ’। हरदीप जब भी गांव के लोगों के मुख से ऐसे शब्द सुनता तो अपने हृदय में एक विचित्र सी खुशी अनुभव करता। उसे लगता, उसने अपने बाप का नाम ऊंचा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।
– गुरिन्द्र भरतगढिय़ा

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