रिजर्व बैंक को मिली नई शक्तियों से सुधरेगी बैंकों की सेहत

रिजर्व बैंक को मिली नई शक्तियों से सुधरेगी बैंकों की सेहत

हाल ही केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश पारित कर बैंक अधिनियम 1949 में संशोधन किए हैं। इन संशोधनों के अनुसार भारत के रिजर्व बैंक को नई शक्तियां दे कर और अधिक सशक्त बनाया गया है। अब रिजर्व बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के डूबे हुए कर्जों को वसूलने के लिए संबंधित बैंक को कड़ी कार्रवाई के लिए निर्देशित कर सकेगा। निश्चित रूप से एनपीए यानी फंसे हुए कर्ज से छुटकारा दिलाने के नए अध्यादेश के तहत रिजर्व बैंक को दिए गए व्यापक अधिकारों से एनपीए के प्रभावी समाधान की राह आगे बढ़ेगी।
बैंक अधिनियम में यह संशोधन सरकार के उन प्रयासों का द्योतक है जिनमें सरकार भगोड़े उद्योगपति विजय माल्या को वापस भारत लाने के प्रयास कर रही है। विजय माल्या 17 बैंकों से 9,000 करोड़ रूपए का कर्ज ले कर देश से फरार हो गया है। ये बैंक अब तक अपने घाटे की भरपाई की कोशिशें कर रहे हैं। अब रिजर्व बैंक द्वारा नियुक्त निगरानी समितियां त्वरित रूप से बैंकों के एनपीए को निर्धारित समय में निपटाने का निर्णय लेंगी और उसे कार्यान्वित भी करेंगी।
नए संशोधन ने आरबीआई को जो शक्तियां प्रदान की हैं उनके उपयोग से विजय माल्या जैसे बकायेदारों के खिलाफ शीघ्र कार्रवाई हो सकेगी। अधिनियम के दिशा-निर्देशों के अनुसार बैंक द्वारा बकायेदारों की निजी परिसम्पत्तियों की सार्वजनिक नीलामी की जा सकेगी। यह अध्यादेश आरबीआई को सीधे बैंक व बकायेदार के मध्य कर्ज के समायोजन(सेटलमेंट) की मध्यस्थता का अधिकार देता है।
वस्तुत: यह एक ऐसा आर्थिक, ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकता है जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मजबूती देते हुए कर्ज से गंभीर रूप से बीमार भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में सार्थक भूमिका निभाएगा। उल्लेखनीय है कि हमारे देश में 90 प्रतिशत व्यावसायिक ऋण बैंकों द्वारा दिए जाते हैं। बैंकों के डूबत कर्जों ने औद्योगिक विकास दर पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। बैंकों द्वारा औद्योगिक ऋण स्वीकृति पर आरबीआई के नवीन आंकड़ों के अनुसार यह संख्या साल-दर-साल कम होती जा रही है।
जिंदगी कैसे जिएं
एनपीए के समाधान हेतु आरबीआई एक निगरानी समिति बनाएगा जिसमें आरबीआई के प्रतिनिधि भी होंगे। यह समिति बैंकों को सलाह देगी। आरबीआई विस्तृत फ्रेम वर्ग बनाएगा। इसमें एनपीए को तय समय में निपटाने का प्रावधान किया जाएगा। बैंक और एनपीए कंपनी को निर्धारित समय में निर्णय के लिए कहा जाएगा। ऐसा नहीं होने पर रिजर्व बैंक की समिति फैसला लेगी। कार्रवाई दिवालिया कानून के तहत होगी। कमेटी सबसे अच्छा रास्ता अपनाने के लिए रेंटिंग एजेंसियों की भी राय लेगी।
बैंक एनपीए के मामले इसी समिति को भेजेंगे। यह समिति एक तरह से जांच एजेंसियों से बैंकरों को बचाएगी। यह समिति तय करेगी कि किसी खास मामले में बैंक कितना कर्ज माफ कर सकते हैं। निगरानी समिति प्रत्येक समझौते के बाद उसे लागू कराएगी और जब समिति किसी कर्ज का मसला हल कर देगी, तो बैंकों की डूबत ऋण संबंधी ऐसी पुरानी चिंता खत्म हो जाएगी कि भविष्य में बैंक के फैसले की जांच हो सकती है।
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार 2013 में अग्रिम व डूबत परिसम्पत्तियां 1.759 लाख रूपए थी जो मार्च 2016 तक तीन गुना बढ़ कर 5.50 लाख करोड़ हो चुकी थी। हालांकि इस दौरान बैंकों द्वारा दिए जाने वाले कर्जों में भी 8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिली। इस दौरान बैंकों ने 68.7 लाख करोड़ रूपए के ऋण दिए। बैंकों द्वारा दिए गए इन ऋणों में सबसे बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का था। इस दौरान इन बैंकों का 1.55 लाख करोड़ रूपए डूबा जो कुल डूबत ऋणों का 88 प्रतिशत था। वहीं यह 2016 में बढ़ कर 5.02 लाख करोड़ हो गया जो कि 91 प्रतिशत रहा।
वर्ष 2017-18 के नए बजट के तहत वित्तमंत्री अरूण जेटली ने बैंकिंग क्षेत्र में सुधार के लिए जो घोषणाएं की हैं, उनके क्रियान्वयन पर नए वित्तीय वर्ष में पूर्ण ध्यान दिया जाना होगा। वर्ष 2017-18 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पर्याप्त रूप से इक्विटी पूंजी निवेश करने का प्रस्ताव किया है। एनपीए के बोझ से दबे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सरकार की ओर से ज्यादा पूंजी की जरूरत होगी क्योंकि कम मूल्यांकन के कारण वे बाजार से पैसा जुटाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं।
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जब बैंकों द्वारा दिए गए ऋण तेजी से डूबने लगे तो इस दौरान बैंकों ने कर्ज देने में सावधानी बरतनी शुरू कर दी। नतीजा इस दौरान बैंकों द्वारा स्वीकृत कर्ज में कमी देखने को मिली। डूबत कर्ज का सबसे बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के खाते में दर्ज हुआ। यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि भारत में बैंकिंग क्षेत्र के 70 प्रतिशत हिस्से पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का अधिकार है। बकाया ऋण बैंकों की वह गलती है जो भविष्य में उनके लिए कई समस्याओं का जनक बन सकता है।
जब भी कोई बैंक किसी ऋण को डूबा हुआ दर्शाता है तो उस बैंक की सकल पूंजी घट जाती है। नए संशोधनों के बाद बैंक को अपनी सकल पूंजी व जोखिम राशि में 8 प्रतिशत का अनुपात रखना आवश्यक होगा। अगर बैंक के डूबत कर्जे उसकी पूंजी को प्रभावित करते हैं तो उस बैंक की भविष्य में ऋण देने की क्षमता कम मानी जाएगी।
उल्लेखनीय है कि एनपीए के आसान समाधान का नया अध्यादेश देश के चिंताजनक बैंकिंग परिदृश्य को बदल सकता है जब बैंकों के डूबते कर्ज देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। आशा है बैंकिंग सुधारों के नए अध्यादेश व केंद्र के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मजबूती के नए प्रयास बैंकों को मजबूत बनाने और डूबते कर्ज से गंभीर बीमार भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में सार्थक भूमिका निभाएंगे।
– नरेंद्र देवांगन

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