राम किशन ग्रेवाल की आत्महत्या पर सवाल…पूरी हों पूर्व सैनिकों की न्यायोचित मांगें ..!

राम किशन ग्रेवाल की आत्महत्या पर सवाल…पूरी हों पूर्व सैनिकों की न्यायोचित मांगें ..!

ex-armyman-suicide-5-270x202वन रैंक वन पेंशन योजना (ओआरओपी) के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक पूर्व सैनिक ने आत्महत्या कर ली। पुलिस का कहना है कि पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल ने जहर खाकर जान दी। उक्त पूर्व सैनिक अन्य पूर्व सैनिकों के साथ मिलकर ओआरओपी मुद्दे पर रक्षा मंत्री को ज्ञापन सौंपने वाले थे। उक्त पूर्व सैनिक ने जिस ढंग से आत्महत्या की है, उससे उनकी मनोदशा का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यह भी बताया जा रहा है कि ग्रेवाल पिछले कुछ समय से ओआरओपी के मुद्दे को लेकर खासे परेशान थे। ग्रेवाल का लिखा सुसाइट नोट भी मिलने का दावा किया जा रहा है, जिसमें ग्रेवाल ने लिखा है कि वह सैनिकों के लिए एक बड़ा कदम उठा रहे हैं। वीर जवानों के लिए अपनी जान देने की बात भी ग्रेवाल के लिखे सुसाइट नोट में कही गई है। वैसे पूर्व सैनिकों की न्यायोचित मांगों को शासन तंत्र द्वारा मान लिया जाना ही देश व सर्वहित में होगा। क्योंकि ओआरओपी के मुद्दे पर सरकार द्वारा अब तक जो भी कदम उठाए गए हैं, उन्हें पूर्व सैनिकों द्वारा नाकाफी बताया जा रहा है। इस मुद्दे पर पूर्व सैनिक पहले भी आंदोलन कर चुके हैं तथा अब भी उनकी आंदोलनात्मक गतिविधियां चलती रहती हैं।यहां सवाल देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा देने वाले रणबाकुंरों के हितों से जुड़ा हुआ है। अगर पूर्व सैनिकों की मांगें मान ली जाएंगी तो मौजूदा समय में देश की हिफाजत में लगे जाबांज सैनिकों का मनोबल भी बढ़ेगा कि सरकार व देशवासियों को हमारे हितों की चिंता है। वैसे भी अगर ओआरओपी के मुद्दे पर पूर्व सैनिकों की मांगें मान ली जाएंगी तो इससे समाज में अच्छा संदेश ही जाएगा कि सरकारी तंत्र की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है तथा सत्ताधारियों द्वारा देश के रणबाकुरों के प्रति वैचारिक स्तर पर जिस तरह की प्रतिबद्धता व आत्मीयता जताई जाती है तो काम भी उसी ढंग का किया जाता है।लेकिन मौजूदा केन्द्र सरकार द्वारा ओआरओपी के मुद्दे पर पूर्व सैनिकों के प्रति जो टालू और संवेदनहीन रवैया अपनाया जा रहा है, उससे पूर्व सैनिकों की नाराजगी बढ़ रही है। वैसे पूर्व सैनिक आत्महत्या जैसा कदम न उठाएं क्योंकि देश के रणबाकुरों के जज्बे, जुनून को तो पूरा देश सलाम करता है फिर आत्महत्या जैसा दुखद और घातक कदम उठाने से कोई सकारात्मक संदेश नहीं जाएगा।वहीं सरकार का रवैया तो गैरजवाबदेही वाला ही है। क्योंकि जिस देश में लाखों करोड़ों रुपये की लूट मची हुई हो, माल्या जैसे लोग 11 हजार करोड़ रुपये की सरकारी देनदारी न चुकाते हुए लंदन भाग जाते हों, जिस देश में भ्रष्ट राजनेता और नौकरशाह करोड़ों रुपये डकारकर भी सजा
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से बच जाते हों, जिस देश में करोड़ों रुपये की विकास व जनकल्याणकारी योजनाओं को सिर्फ कागजों पर ही अंजाम देकर पूरी सरकारी धनराशि का गबन कर लिया जाता हो, उस देश के पूर्व सैनिकों की पेंशन अगर उनके मन मुताबिक ही निर्धारित कर दी जाएगी तो क्या शासनतंत्र पर कोई पहाड़ टूट पड़ेगा?सत्ताधारियों का विलासितावादी रवैया, उनकी ठाट बाट, उनके शाही खर्चे और उन्हें लगी फिजूलखर्ची की लाइलाज बीमारी तो वैसे भी देश की अर्थव्यवस्था पर एक तरह का बोझ है। फिर देश के सैनिक तो राष्ट्र और समाज के प्रति अपना कर्तव्य ईमानदारी पूर्वक पूरा करते हुए देश की उम्मीदों पर खरा उतरते हैं तथा आवश्यकता पडऩे पर अपने प्राणों की बाजी भी लगा देते हैं। फिर उनके हितों के मद्देनजर सरकारी खजाने में अकाल क्यों पड़ा हुआ है? वैसे भी वही सत्ता सर्वहितैषी और सर्वव्यापी मानी जाती है जिसमें सबका ख्याल रखने की नीयत व ईमानदारी हो। क्योंकि सिर्फ भाषणबाजी और बयानों से कोई भी राष्ट्रीय क्रांति नहीं हो सकती और देश के सैनिकों के मुद्दे पर बिल्कुल भी नहीं क्योंकि देश के सैनिकों के प्रति करोड़ों देशवासियों की भावनाएं जुड़ी हैं। देश के सैनिकों, पूर्व सैनिकों या खास-ओ-आम किसी भी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए मजबूर न होना पड़े, यह सुनिश्चित करना सरकार की महती जिम्मेदारी है। क्योंकि जो लोग मानव जीवन की अहमियत नहीं समझ सकते, लोगों को हत्या या आत्महत्या से नहीं बचा सकते, वे सत्ता कैसे चलाएंगे और उनके सत्ता में बने रहने या सत्ता हासिल करने का औचित्य क्या है?
-सुधांशु द्विवेदी

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