राजनीति में स्वाभिमान बचा कहां है?: सुधांशु द्विवेदी

राजनीति में स्वाभिमान बचा कहां है?: सुधांशु द्विवेदी

राजनीति व राजनेताओं को भारतीय लोकतंत्र का ध्वजवाहक माना गया है लेकिन राजनीतिक बिरादरी में बढ़ती पद लोलुपता व स्वार्थपूर्ति ने राजनेताओं का इस हद तक नैतिक पतन कर दिया है कि उन्हें अपनी सुविधा, सहूलियत व हितों के अनुरूप रंग बदलने में कभी देर नहीं लगती। साथ ही पद, प्रतिष्ठा व पैसे की लालच में राजनीतिक बिरादरी के लोगों द्वारा पार्टी बदलना तो मानों फैशन बन गया है। अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये समस्त आदर्शों, सिद्धांतों एवं प्रतिबद्धताओं को तिलांजलि देकर दलबदल करने वाले राजनेता अपनी विचारधारा व दलीय निष्ठा को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर जाते हैं, फिर भले ही नये दल में प्रवेश करने के बाद उन्हें कुछ भी खास हासिल न हो अथवा नये दल में उन्हें उपेक्षा व अपमान का दंश झेलना पड़े। लेकिन देश में राजनेताओं द्वारा पार्टी बदलने का खेल हमेशा चलता ही रहता है। इसके अलावा देश में जब चुनावों को दौर चल रहा हो तब राजनेताओं द्वारा दल बदलने या उनके द्वारा दल-बदल को बढ़ावा देने को खास सियासी रणनीति माना जाता है। फिर भले ही वक्त का चाबुक ऐसा चले कि दल-बदल की यह पैंतरेबाजी धरी की धरी रह जाए तथा नतीजे के रूप में सिर्फ अपयश और निराशा ही हाथ लगे। देश में संभवत: ऐसा कोई भी राजनीतिक दल नहीं होगा, जिसे कूटनीति, फूटनीति व दलबदल को बढ़ावा देने में अपना हित दिखाई न देता हो। देश के पांच राज्यों में चुनावों का दौर चल रहा है, ऐसे में राज्य विधानसभा के इन चुनावों को दृष्टिगत रखते हुए पिछले कुछ महीनों में सियासी घमासान व राजनेताओं द्वारा पार्टी बदलने का खेल कुछ ज्यादा ही चलता रहा है।
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 कोई राजनेता अपने परिजन-रिश्तेदारों को टिकट न दिये जाने से नाराज हो गया तथा उसने पार्टी बदल ली तो किसी राजनेता को पद और प्रतिष्ठा सिद्धांतों एवं आदर्शों से ज्यादा महत्वपूर्ण लगे तो उन्होंने पार्टी बदलने में देर नहीं लगाई। अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा के बारे में कहा जा रहा है कि वह जल्द ही भाजपा में शामिल होने वाले हैं। अब एसएम कृष्णा को कांग्रेस पार्टी से क्या शिकायत है तथा उनका किन कारणों से पार्टी से मोहभंग हुआ है, यह तो कृष्णा ही बेहतर ढंग से बता सकते हैं। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अभी कुछ माह पूर्व उत्तरप्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रीता बहुगुणा तथा बसपा के पूर्व नेता स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा में शामिल हुए हैं। उक्त दोनों ही नेताओं को भाजपा में किस तरह से अपमान व उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, इससे एसएम कृष्णा जैसे नेताओं को कुछ सबक तो लेना ही चाहिये लेकिन शायद भाजपा में कृष्णा को अपने लिये बेहतर संभावनाएं व समीकरण दिख रहे होंगे। इसलिये उनके मन में भाजपा में शामिल होने के प्रति आतुरता बढ़ रही होगी। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस.एम. कृष्णा द्वारा कांग्रेस पार्टी छोडऩे पर भाजपा नेता व केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू उनकी खूब वाहवाही कर रहे हैं। नायडू का कहना है कि कोई भी बुद्धिमान कांग्रेसी कांग्रेस में नहीं रहेगा। कोई भी स्वाभिमानी नेता कांग्रेस में बना नहीं रह सकता। यह अनुभव रहा है। नायडू का कहना है कि एस.एम. कृष्णा एक बहुत वरिष्ठ नेता हैं। वह विचार करेंगे और निर्णय करेंगे। नायडू का यह भी कहना है कि कृष्णा ने दरकिनार किए जाने से दुखी होकर पार्टी छोड़ी है।
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 वैसे वेंकैया नायडू द्वारा कृष्णा की तारीफ किया जाना स्वाभाविक ही है क्यों कि विरोधियों के घर में आग लगने से देश के कतिपय राजनेता खुश ही होते हैं। उनसे उच्च कोटि के राजनीतिक आदर्शों की स्थापना की उम्मीद किया जाना ही बेमानी है तथा इसमें उन्हें अपना फायदा नजर आता है लेकिन वेंकैया नायडू को यह बताना चाहिये कि राजनीति में स्वाभिमान बचा कहां है तथा किसी राजनीतिक दल के नेता अगर अपनी पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल होते हैं तो वहां उनका स्वाभिमान कितना सुरक्षित रहने दिया जाता है, इसका जवाब भी वेंकैया नायडू को देना चाहिये। स्वामी प्रसाद मौर्य और रीता बहुगुणा अपनी-अपनी पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल हुए हैं तो उनकी फिर भाजपा में जय-जयकार होनी चाहिए थी लेकिन उक्त दोनों ही नेताओं को अब पहले की अपेक्षा और ज्यादा विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। अब भाजपा में उनके सम्मान व स्वाभिमान की कोई चिंता नहीं की जा रही है तो फिर नायडू जैसे नेता इस तरह से राजनीतिक बिरादरी के लोगों को दल-बदल के लिये उकसाने एवं विरोधी राजनीतिक दलों के अंदरूनी संदर्भों पर टिप्पणी करने से पहले अपना घर दुरूस्त करने की जहमत क्यों नहीं उठाते। इसके अलावा यहां विचारणीय विषय यह भी है कि विरोधी राजनीतिक दलों में तोडफ़ोड़ को बढ़ावा देकर तथा दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने पाले में शामिल कराकर भाजपा लगातार अपनी ताकत बढ़ाने की कवायद कर रही है लेकिन इसके बावजूद पार्टी को इससे कुछ खास हासिल नहीं हो पा रहा है। ऐसे में वेंकैया नायडू जैसे नेता यह क्यों नहीं सोचते कि अगर कूटनीति व फूटनीति न अपनाकर रचनात्मक प्रयासों के माध्यम से अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश की जाए तो उसके नतीजे ज्यादा लाभकारी व स्थायी रहेंगे।

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