राजनीति को बना लिया व्यवसाय

 राजनीति को बना लिया व्यवसाय

तमिलनाडु में सत्ताधारी अन्नाद्रमुक में आये दिन नया घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। जयललिता के निधन के बाद शशिकला में राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग्रत होना तथा उसके बाद भ्रष्टाचार के एक मामले में उनके जेल चले जाने के पश्चात राज्य के मुख्यमंत्री पद पर पलानीस्वामी की ताजपोशी तथा बाद में पार्टी के दो गुट उभरने से इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि पार्टी में शह-मात का खेल अभी भी जारी है। पिछले दिनों दिल्ली पुलिस द्वारा शशिकला के भतीजे व पार्टी उप महासचिव टी.टी.वी. दिनाकरन के खिलाफ मामला दर्ज किये जाने से यह भी स्पष्ट हो गया है कि कतिपय राजनीतिज्ञ राजनीति को सिर्फ व्यवसाय ही समझते हैं तथा अपना मकसद पूरा करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं। दिनाकरन पर आरोप है कि उन्होंने अन्नाद्रमुक पार्टी के जब्त दो पत्ती चुनाव चिह्न को उनके गुट को आवंटित करने के लिए निर्वाचन आयोग अफसरों को रिश्वत देने की कोशिश की थी। बाद में निर्वाचन आयोग द्वारा तमिलनाडु विधानसभा की आर.के. नगर सीट पर 12 अप्रैल को होने वाले उपचुनाव को भी टाल दिया गया था। आयोग द्वारा यह भी पाया गया था कि मतदाताओं को रिश्वत के तौर पर नकदी दी जा रही थी। दिनाकरन सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के उम्मीदवार थे। अब दिनाकरन को लेकर अन्नाद्रमुक में नया घटनाक्रम सामने आया है। पार्टी द्वारा टी.टी.वी. दिनाकरन और उनके परिवार को पार्टी से अलग करने का फैसला किया गया है। पार्टी नेता और तमिलनाडु के मंत्री डी. जयकुमार का कहना है कि हमने टी.टी.वी. दिनाकरन और उनके परिवार को पार्टी से अलग करने का फैसला किया है।
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  अब एक कमिटी द्वारा पार्टी को चलाया जायेगा। उल्लेखनीय है कि सत्ता संघर्ष के कारण अन्नाद्रमुक दो खेमों में विभाजित हो गई है। एक गुट दिनाकरन की बुआ और जयललिता की करीबी माने जाने वाली शशिकला का है और दूसरा गुट राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम का है। दोनों ही गुटों द्वारा एक दूसरे को कमजोर साबित करने की रणनीति के तहत अन्नाद्रमुक में जो कुछ चल रहा है उसी के तहत पन्नीरसिल्वम गुट द्वारा शशिकला गुट के खिलाफ दिनाकरन पर सख्ती के रूप में यह दांव चला गया है। पार्टी में मची इस तरह की सियासी उथल-पुथल पार्टी को कितना कमजोर करेगी तथा इससे तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके सहित अन्नाद्रमुक के अन्य विरोधियों को कितना फायदा होगा यह तो समय पर देखने वाली बात होगी लेकिन दिनाकरन द्वारा चुनाव आयोग के अधिकारियों को रिश्वत देने की कोशिशों के आरोप में दिल्ली पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज किये जाने से स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति में प्रदूषण चरम पर है तथा दलाल व बिचौलिये चुनाव आयोग तक अपनी दखल का दावा करने लगे हैं। ऐसे दावों में कितनी सच्चाई है तथा चुनाव आयोग के ऐसे कौन से अधिकारी हैं जो रिश्वत के प्रलोभन से प्रभावित होते हैं। चुनाव आयोग को इस दिशा में भी जांच पड़ताल करनी चाहिये। दिनाकरन द्वारा एक बिचौलिये के माध्यम से जिस तरह से चुनाव आयोग के अधिकारियों को रिश्वत देने की कोशिश का दावा किया जा रहा है तथा उक्त बिचौलिये द्वारा केन्द्रीय चुनाव आयोग तक अपनी पहुंच व दखल का दावा किया गया था, उससे इस बात का अंदेशा तो गहराता ही है कि आखिर रिश्वत के लेन-देन का यह खेल चुनाव आयोग में किसके संरक्षण में संचालित हो रहा होगा? सवाल यह भी है कि अगर उक्त बिचौलिये के माध्यम से दिनाकरन को चुनाव आयोग के अधिकारियों को रिश्वत देने में सफलता मिल गई होती तथा दिल्ली पुलिस द्वारा मामले का पर्दाफाश न किया गया होता तब तो ऐसे बिचौलिये यूं ही अपना करतब दिखाते रहते। भारतीय राजनीति में बढ़ता नैतिक अवमूल्यन वैसे भी गंभीर चिंता का विषय है कि फिर चुनावी प्रक्रिया व संपूर्ण तंत्र में अगर रिश्वतखोरी की बीमारी भी लग जाएगी तब तो भारतीय लोकतंत्र की बची-खुची साख भी खत्म हो जायेगी। भारतीय राजनीति के बारे में आम जनमानस की धारणा यही है कि देश में संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया शुचितापूर्वक ही संपन्न होनी चाहिये तथा प्रभावशाली लोग संपूर्ण तंत्र को किसी भी ढंग से प्रभावित न कर सकें लेकिन ऐसे रिश्वत जैसे प्रकरण यह साबित करने के लिये काफी हैं कि शुचिता जैसी बातें सिर्फ दूसरों को उपदेश देने तक ही सीमित रह गई हैं। ऐसे श्रेष्ठ मूल्यों को खुद में आत्मसात करने के लिए कोई भी तैयार नहीं है।
– सुधांशु द्विवेदी

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