राजनीतिक हलकों में आजकल लाख टके का सवाल है…क्या अखिलेश बना सकते हैं नई पार्टी ?..विरोधियों ने दी हवा

राजनीतिक हलकों में आजकल लाख टके का सवाल है…क्या अखिलेश बना सकते हैं नई पार्टी ?..विरोधियों ने दी हवा

akhilesh-yadavलखनऊ । उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में आजकल लाख टके का सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी नई पार्टी बनायेंगे।
मार्निंग वाक के लिए पार्क हो या चाय-पान की दुकान।
चौराहा हो या बाजार।
हर आम और खास की जुबान पर एक ही चर्चा है कि क्या मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव को छोड़ नई पार्टी गठित करेंगे। इस चर्चा को इधर अचानक हुई कई घटनाओं ने बल दे दिया।
द्विअर्थी संवादों और कुछ निर्णयों ने इस चर्चा को और बढाया। समाजवादी पार्टी (सपा) दफ्तर पर रहने वाले मुख्यमंत्री के सुरक्षाकर्मी अचानक जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट कार्यालय में तैनात कर दिये गये। ट्रस्ट में तैनाती के साथ एक सन्देश चला गया कि अब मुख्यमंत्री शायद ही सपा दफ्तर आयें। इसके साथ ही मुख्यमंत्री की सुरक्षा के लिए पांच विक्रमादित्य मार्ग में तैनात सुरक्षाकर्मी मुख्यमंत्री के नये आवास चार विक्रमादित्य मार्ग कोठी पर आ गये। पहले मुख्यमंत्री अपने पिता मुलायम सिंह यादव के साथ पांच विक्रमादित्य मार्ग में रहते थे, लेकिन गत नवरात्रि में वह चार विक्रमादित्य मार्ग स्थित भव्य कोठी में शिफ्ट हो गये। पुराने आवास से नये में सुरक्षाकर्मियों का शिफ्ट होना तार्किक है, लेकिन सपा दफ्तर से जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट में सुरक्षाकर्मियों के जाने से राजनीतिक हलचल बढ गयी। 
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी ने हालांकि सपा दफ्तर से सुरक्षा कम किये जाने या हटाने से इन्कार किया और कहा कि उन्हें फिलहाल ऐसा कोई आदेश नहीं मिला है।
पार्टी से निष्कासित  यादव की ‘युवा ब्रिगेड’ का नया ठिकाना जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट है। लम्बे समय से सपा के कार्यालय सचिव रहे मुलायम के खास एस आर एस यादव भी अब जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट में ही बैठते हैं।
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वहीं मुख्यमंत्री के आसपास नजर आने वाले राजनीतिक पेंशन मंत्री राजेन्द्र चौधरी भी इसमें बैठ रहे हैं। सपा में मीडिया का काम देख रहे आशीष यादव भी ट्रस्ट कार्यालय में देखे गये, हालांकि वह पार्टी कार्यालय में भी बैठ रहे हैं। यादव परिवार में विवाद की वजह से अपने भविष्य को लेकर सबसे अधिक संंशय में कार्यकर्ता और नेता हैं। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि वह किसके पास जाएं। ज्यादातर युवाओं का आकर्षण यदि अखिलेश की तरफ है तो पार्टी के लिए समर्पित पुराने लाेग कहते हैं कि “नेताजी” ही सब कुछ हैं। जहां वह हैं, वहीं पार्टी है। विवाद को पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव के उस हालिया बयान से भी हवा मिली जिसमें कहा गया था कि समाजवादी पार्टी बहुमत में आई तो मुख्यमंत्री वह होगा जिसे विधानमण्डल दल चुनेगा। उन्होंने कहा कि पिछली बार अखिलेश ने मुलायम के नाम पर जनता से वोट मांगा था, और मैंने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था। इसके पहले मुख्यमंत्री ने यह बयान देकर सबको चौंका दिया कि वह अकेले प्रचार करेंगे। किसी का इंतजार नहीं करेंगे और बचपन में उन्होने अपना नाम खुद रख लिया था। उनके इस बयान के बाद ही मुलायम सिंह यादव का तल्ख बयान आया है । उधर, नेताजी के बयान के बाद मामले को हल्का करने के प्रयास भी किये जा रहे हैं।
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पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने कल इटावा में कहा “ नेताजी ने विधानसभा चुनाव के बाद विधायकों की सहमति से मुख्यमंत्री चुने जाने की बात जरूर की है मगर सपा के दोबारा सत्ता में आने पर अखिलेश एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर होंगे। पार्टी का जिम्मेदार नेता होने के नाते मै अपनी बात को अधिकार से कह सकता हूं। ” इस बीच पार्टी महासचिव और मुलायम सिंह यादव के अनुज प्रो रामगोपाल यादव ने एक बयान में कहा कि पार्टी को अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करने के बाद चुनाव मैदान मे उतरना चाहिये। अखिलेश विकास का पर्याय बनकर उभरे हैं और उनको आगे कर पार्टी आसानी से दोबारा सत्ता में काबिज हो सकती है। सपा के पुराने कार्यकर्ता लल्लन प्रधान का तो यहां तक कहना है कि देश की ताकतवर राजनीतिक परिवार में शुमार मुलायम सिंह यादव कुनबे को तोड़ने के लिए देश ही नहीं विदेश शक्तियां भी लगी हुई हैं। वह कहते हैं,, “जहां मुलायम हैं, वहीं पार्टी है। अखिलेश को यह समझना चाहिए। छोटी -छोटी शिकायतों को मिल बैठ कर दूर कर लेना चाहिए। यदि “एका” होने का सन्देश नहीं गया तो सब कुछ खतम हो जायेगा। अत्यन्त भावुक अम्बेडकरनगर जिले के रहने वाले लल्लन प्रधान कहते हैं कि झगडा हर परिवार में होता है, लेकिन वह यदि सार्वजनिक हो गया तो नुकसान होना तय है। लेकिन, अभी भी समय है। पांच नवम्बर को पार्टी की रजत जयन्ती समारोह में एकजुटता दिखाकर कुछ “डैमेज कन्ट्रोल” किया जा सकता है। मुख्यमंत्री के तुरुप का पत्ता और मोहब्बत में जुदाई भी होती है, जैसे बयानों से स्पष्ट हो गया था कि यादव परिवार में झगड़ा अब जल्द ही सतह पर आने वाला है। गत 21 जून को कौमी एकता दल (कोएद) के सपा में विलय के बाद से परिवार में तल्खियां बढीं।
हालांकि 25 जून को संसदीय बोर्ड की हुई बैठक के अनुसार विलय को निरस्त कर दिया गया और इसी वजह से मंत्रिमंडल से निकाले गये बलराम यादव को फिर से मंत्री बना दिया गया।
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विवाद के कारणों में परिवहन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति भी एक कारण रहे हैं। भ्रष्टाचार के आरोपी  प्रजापति को मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल से निकाल बाहर किया था लेकिन पिता के दबाव मेें उन्हें फिर वापस लेना पडा। अखिलेश यादव को सपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाये जाने पर विवादों की खाई और चौडी हो गयी। उन्हें हटाकर शिवपाल यादव को अध्यक्ष बनाते ही मुख्यमंत्री ने उनसे सभी विभाग छीन लिये थे। झुंझलाये शिवपाल यादव ने मंत्रिमंडल से ही इस्तीफा दे दिया था लेकिन मुख्यमंत्री ने उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया। विवादों के कारणों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि विवाद की नींव तो सरकार बनने के समय मार्च 2012 में ही पड गयी थी जब शिवपाल यादव ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बजाय सपाध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव किया था। सपा के जानकारों का कहना है कि यह टीस मुख्यमंत्री के मन में रही है। समय समय पर शिवपाल विरोधियों ने इसे खाद-पानी देकर हवा दी।आप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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