‘रजोनिवृत्ति’ कोई समस्या नहीं…प्रत्येक स्त्री के जीवन का अत्यावश्यक व महत्त्वपूर्ण दौर है..!

‘रजोनिवृत्ति’ कोई समस्या नहीं…प्रत्येक स्त्री के जीवन का अत्यावश्यक व महत्त्वपूर्ण दौर है..!

 रजोनिवृत्तिकाल प्रत्येक स्त्री के जीवन का अत्यावश्यक व महत्त्वपूर्ण दौर है। जिस प्रकार रज: प्रवृत्ति शुरू होने की उम्र होती है उसी प्रकार एक उम्र के बाद यह स्वत: ही बंद भी हो जाती है। प्राय: 40 से 55 वर्ष की उम्र के दौरान रजोनिवृत्ति होती है। हर स्त्री में इसका समय अलग-अलग हो सकता है। पूर्णत: रजोनिवृत्ति होने में 2 से 5 वर्ष का समय लग सकता है।
कुछ तथ्य:- देश, काल जाति इत्यादि के हिसाब से भी रजोनिवृत्ति विभिन्न समय पर होती है। गर्म प्रदेश की स्त्रियों में ठंडे प्रदेश की स्त्रियों की अपेक्षा जल्दी रजोनिवृत्त होती है। जल्दी रज:प्रवृत्ति शुरू होने पर रजोनिवृत्ति देर से होती है एवं रज:प्रवृत्ति देर से शुरू हो तो रजोनिवृत्ति जल्दी हो जाती है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं। कभी-कभी 35 वर्ष की उम्र से पहले ही रजोनिवृत्ति हो जाती है। ऐसा ओवरी की क्रियाशीलता कम होने या अन्य शारीरिक कारणों की वजह से होता है। 52 से 55 वर्ष की उम्र के बाद रजोनिवृत्ति को देर से होने वाली रजोनिवृत्ति कहा जाता है। ऐसा प्राय: श्रोणिगत विकार, गर्भाशय में गांठ या डायबिटीज़ इत्यादि की वजह से होता है।
रजोनिवृत्तिकाल में प्राय: महिलाओं को शारीरिक व मानसिक तौर पर कई परिवर्तन महसूस होते हैं किंतु प्रत्येक महिला को परेशानी हो, यह कोई आवश्यक नहीं। प्राय: 35 प्रतिशत महिलाओं को ही अधिक तकलीफों का सामना करना पड़ता है। कुछ महिलाओं को कोई भी दिक्कत नहीं होती एवं यह समय बड़ी आसानी से कट जाता है।
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रजोनिवृत्ति के लक्षण:- प्राय: मासिक स्राव कम व धीरे-धीरे कई-कई माह के अंतराल पर होकर बंद हो जाता है। कभी-कभी यह अचानक भी बंद हो जाता है। आम धारणा के अनुसार अत्यधिक व जल्दी-जल्दी मासिक स्राव होना रजोनिवृत्ति का लक्षण है-किंतु ऐसा बिलकुल भी नहीं है। ऐसा प्राय: श्रोणि अथवा गर्भाशयगत विकार के कारण होता है अत: किसी भ्रम में न रहकर तुरंत जांच कराएं व उचित उपचार कराएं। कुछ महिलाओं को ओस्टियोपोरोसिस के कारण जोड़ों में व कमर में दर्द रहता है। इसके अलावा वजऩ बढऩा, अधिक या कम सहवास की इच्छा जागृत होना, हॉटफ्लश यानी अधिक गर्मी लगना, पसीना आना, हथेलियों व पैरों के तलवों में जलन होना, सुई चुभने अथवा कीड़ी चलने के समान पीड़ा का अनुभव होना, त्वचा व योनि प्रदेश का खुश्क होना इत्यादि लक्षण होते हैं। सिररर्द, बेचैनी, चक्कर आना, नींद न आना, धड़कन का बढऩा, थकान, डिप्रेशन व स्वभाव में चिड़चिड़ापन भी हो सकता है। उपरोक्त लक्षण रजोनिवृत्ति काल में हार्मोन्स में होने वाले परिवर्तन के कारण होते हैं।
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सावधानियां:- चिकित्सक की उचित सलाह व आश्वासन के द्वारा इनसे बखूबी छुटकारा पाया जा सकता है बशर्ते महिलाएं इन्हें कोई बीमारी न समझें बल्कि शारीरिक परिवर्तन के तौर पर लें व मानसिक संतुलन बनाए रखें। हल्का फुल्का व्यायाम करें, पर्याप्त विश्राम लें, चर्बीयुक्त आहार न लें व पेट साफ रखें। इसके बावजूद यदि शारीरिक कष्ट अधिक हो तो चिकित्सक को अविलम्ब दिखाएं व उपचार कराएं।
-नीरज सुधांशु

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