योगी और बदलाव छिपाए नहीं छिपते..!

योगी और बदलाव छिपाए नहीं छिपते..!

बदलाव आता है तो दिखता भी है। उसे चाहकर भी छिपाया नहीं जा सकता। दिखना बदलाव की सहज प्रवृत्ति है। उत्तर प्रदेश में सरकार बदल गई है और उसका असर थोडा ही सही, दिख तो रहा ही है। यही बात एक योगी पर भी लागू होती है। वह साधना काल में ही एक स्थान का आकांक्षी हो सकता है, एकांत प्रिय हो सकता है लेकिन उसका असल काम तो अलख जगाना ही है। योगी और बदलाव छिपाए नहीं छिपते। योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बने कुल जमा पांच दिन ही हुए हैं, लेकिन उन्होंने पुलिस और प्रशासन के पेंच अपने स्तर पर कसने शुरू कर दिए हैं। पुलिस की तैयारी और सक्रियता परखने के लिए वे हजरतगंज कोतवाली पहुंच गए। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहला मौका है जब कोई मुख्यमंत्री थाने में पहुंचा है। एक दिन पहले ही वे लोक भवन में पहुंच गए थे। वहां उन्होंने सभी सरकारी कार्यालयों में पान-गुटखा खाने पर रोक लगा दी है। प्रदेश की जनता मुख्यमंत्री के इस नए अंदाज को खूब पसंद कर रही है। उनमें वह एक नायक की छवि देख रही है जो व्यवस्था में सुधार चाहता है। योगी आदित्यनाथ के सभी सहयोगी मंत्रियों ने आवंटित विभागों में पदभार संभाल लिया है। मंत्रियों ने भी अपने कार्यालयों में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई है। पर्यावरण मंत्री ने तो अपने कार्यालय में गंदगी देख पूरी गांधीगीरी की। अपने हाथ से झाड़ू लगाई। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसका असर दिखेगा। अगले दिन से उन्हें खुद झाड़ू उठाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और अगर इसके बाद भी कार्यालय में गंदगी नजर आती है तो समझा जाना चाहिए कि संबंधित विभाग में स्वच्छता के प्रति कोई रुचि नहीं है या फिर उनकी खाल इतनी मोटी हो गई है, उनकी आंखों का पानी इतना मर गया है कि वे केवल अपनी सुविधा का संतुलन देखते हैं, काम नहीं करते।
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ऐसी स्थिति में कार्रवाई ही एक मात्र विकल्प है और जिस सरकार का मंत्री कार्यालय में झाड़ू लगा सकता है, वह निष्क्रिय कर्मचारियों और अधिकारियों को दंडित भी कर सकता है, इस बात को भी आसानी से जाना समझा जा सकता है। वक्फ एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहसिन रजा की आजम खान की तस्वीर पर नाराजगी स्वाभाविक भी है। उन्होंने जिस तरह अधिकारियों को फटकार लगाई है, अव्वल तो उसकी जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी। सत्ता परिवर्तन के साथ ही अधिकारियों को पुरानी सरकार से जुड़ी चीजों को हटा देना चाहिए। अगर नई सरकार के मंत्री को उन्हें ऐसा करने के लिए कहना पड़े तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है? मोहसिन रजा ने अपने विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे आजम खान की तस्वीर हटा कर वहां प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की तस्वीर लगाएं। आजम खान मुस्लिम हैं और अखिलेश यादव उनके मसीहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ भले ही अल्पसंख्यकों के हितों की कितनी भी बात करें लेकिन उन पर इस मजहब के लोगों का सहज ही विश्वास तो नहीं बनने जा रहा। मोहसिन रजा की तस्वीर लगाने में उन्हें शायद ही कोई गुरेज हो लेकिन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की तस्वीर लगाना आस्था का मामला है और यह आस्था एक झटके में तो नहीं बनती। विपक्ष मोहसिन रजा पर दबाव देने का आरोप भी लगा सकता है। ऐसे में उन्हें तस्वीर हटवाने की तो सलाह देनी चाहिए लेकिन तस्वीर लगाने की सलाह नहीं देनी चाहिए। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय और वक्फ बोर्ड यह काम स्वतः करे तो ज्यादा मुफीद होगा। एंटी रोमियो स्क्वाॅयड बनाने और शोहदों की धर-पकड़ को लेकर जिस तरह जगह-जगह अभियान चलाया जा रहा है, उसका सर्वत्र स्वागत किया जाना चाहिए।
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महिलाओं और युवतियों की सुरक्षा का मामला भाजपा के चुनावी एजेंडे में शामिल रहा है। महिलाओं को सुरक्षा मिलनी ही चाहिए लेकिन जिस तरह शोहदों की तरफदारी में कुछ राजनीतिक दल सामने आ रहे हैं, उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। कुछ इलेक्ट्राॅनिक चैनल सरकार बनते ही जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा के लोक कल्याण संकल्प पत्र में वर्णित सभी विवादों को एक झटके में ही पूरा हो जाना चाहिए। अभी तो सरकार के मंत्रियों को विभाग बंटा है। पहली बार वे अपने कार्यालय पहुंचे हैं। उन्हें सोचने-समझने और वहां की वस्तुस्थिति तो जानने दीजिए। इन मंत्रियों में कुछ पुराने हैं और कुछ बिल्कुल नए। मंत्री के रूप में उनका पहला अनुभव है। इसमें योगी सरकार के दो उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा भी शामिल हैं। उन्हें काम करने का मौका तो दिया ही जाना चाहिए। अखाड़े में जीत की जद्दोजहद कर रहे पहलवान को बाहर से दांव लगाने की सलाह बताना तो आसान है लेकिन जब खुद अखाड़े में उतरते हैं तो बुद्धि काम नहीं करती। हाथ की हथेली पर सरसों उगने का चमत्कार नहीं है विकास। सदियों की जड़ता को एक झटके में पूरा नहीं किया जा सकता। दिनेश शर्मा ने अपने पहले ही दिन नकल पर चिंता जताई है तो केशव प्रसाद मौर्य ने भी अपने अधिकारियों पर शिकंजा कसा है। उन्होंने मायावती और अखिलेश राज में बनी सड़कों की गुणवत्ता और उसमें हुए घपलों-घोटालों की जांच की बात कही है। वैसे भी जिस तरह से नई सरकार बनते ही पत्रावलियां फाड़ी गईं और उसे बोरों में भरकर सचिवालय के गेट पर फेंक दिया गया, जिस तरह लखनऊ विकास प्राधिकरण की सैकड़ों पत्रावलियां गायब की गई हैं, उसे बहुत हल्के में नहीं लिया जा सकता। नौकरशाहों को समझने में नेताओं को वर्षों लग जाते हैं। ऐसा करना एक दिन में तो संभव नहीं है। यह अलग बात है कि बूचड़खानों पर कुछ हद तक पाबंदी लगी है लेकिन जिस तरह बूचड़खानों के समर्थन में कुछ राजनीतिक दल आगे आए हैं, उसे किस रूप में देखा जाएगा। कहीं गुजरात के बब्बर शेरों के इटावा लायन सफारी में भूखा रहने की बात कही जा रही है तो कहीं किसी टुंडे कबाब की दुकान के बंद होने के शोशे उछाले जा रहे हैं। केवल अवैध बूचड़खाने ही अभी बंद हुए हैं। वह भी पूरे नहीं। जब सारे बूचड़खाने बंद होंगे और सरकार पशुधन को बचाने का अपना वादा पूरा करेगी तब क्या होगा? सरकार ने अभी ठीक से काम भी शुरू नहीं किया है। सवाल उठता है कि मौजूदा सरकार ने अपनी ओर से किसी अधिकारी को नहीं हटाया है। ये सारे अधिकारी अखिलेश सरकार के ही दौर के हैं, निजाम बदलते ही जब बूचड़खानों पर कार्रवाई हो सकती है, जब शोहदों पर कार्रवाई हो सकती है तो ऐसा पूर्व शासन में भी तो संभव था।
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इसके लिए कौन जिम्मेदार था? यह भी तो बताया जाना चाहिए। वैसे भाजपा सरकार जिस सधे अंदाज में आगे बढ़ रही है और जिस सक्रियता से मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी काम कर रहे हैं, उससे प्रथम दृटया यह हरगिज नहीं लगता कि यह सरकार एक खास कमरे में बैठकर निर्णय लेने में विश्वास रखती है। योगी आदित्यनाथ जिस तरह एक के बाद एक सुधारात्मक फरमान जारी कर रहे हैं, उससे उनका मंतव्य साफ है कि वे प्रदेश के विकास को अहमियत देते हैं। वे योगी हैं और योगी का स्वभाव भ्रमणशीलता है। उनकी यही भ्रमणशाीलता उत्तर प्रदेश को नई दशा और दिशा देगी, इसकी कल्पना तो की ही जा सकती है। एक बार पुनश्च, सरकार नई बनाई है तो उस पर ऐतबार भी कीजिए और उसे काम करने का मौका भी दीजिए। इतनी आतुरता ठीक तो नहीं। सरकार पर भगवा एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाना तो आसान है लेकिन उसकी विकास की सोच को भी तरजीह दी जानी चाहिए। सरकार को भी सोचना होगा कि वह शोहदों पर सहज ही नियंत्रण नहीं लगा सकती। विपक्ष उन्हें भड़काने की पुरजोर कोशिश करेगा। जब विपक्ष यह कहता है कि जिस लड़की से छेड़छाड़ होगी, वह पुलिस से खुद संपर्क कर लेगी। छेड़छाड़ हो ही गई तो पुलिस के आने का क्या मतलब। हालात तो ऐसे बनने चाहिए कि सूबे में कहीं भी छेड़छाड़ न हो। आज रायबरेली से लखनऊ आ रही रेप पीड़िता के मुंह में जिस तरह तेजाब डाली गई है, बरेली काॅलेज में महला प्रशिक्षु आइपीएस से छेड़छाड़ हो जाती है, यह घटना यह साबित करने के लिए काफी है कि पुलिस का मौजूदा तंत्र अभी भी दबंगों को नियंत्रित नहीं कर पा रहा है। सरकार को इस बावत कुछ ठोस प्रयास तो करना ही होगा। उसे एक ही सीट पर लंबे अरसे से जमे अधिकारियों और कर्मचारियों की गतिविधि पर भी नजर रखनी होगी। बिना भय के प्रीति नहीं होती, यह तो सुनिश्चित करना ही होगा। जब तक पुलिस महकमे के दोचार वरिष्ठों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक केवल संकल्प दिलाने भर से व्यवस्था नहीं सुधरेगी।-सियाराम पांडेय ‘शांत’

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