योगाभ्यास से दूर होती हैं लिवर की बीमारियां

योगाभ्यास से दूर होती हैं लिवर की बीमारियां

यकृत शरीर का उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है। यह अंग चौबीस घंटे कार्य करता रहता है। छोटी-सी भी लापरवाही से यह अंग बीमार पड़ सकता है। बाजार का तला-भुना खाना, बासी वस्तुओं को खाने आदि से लिवर (यकृत) में खराबी आ जाती है। उसमें सूजन तक आ जाती है। उसका आकार बढ़ जाता है और उसमें दर्द होने लग जाता है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार इसे ‘यकृत प्रदाह’ कहा जाता है। लिवर में सूजन आने के बाद भूख न लगना, कब्ज बना रहना, नींद न आना, पेट में दर्द होते रहना आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
यकृत को शरीर में रसायनों का भंडार भी माना जाता है। यह शरीर को जरूरत के अनुसार सामग्री जुटाने, भोजन पचाने, चर्बी निर्माण तथा कार्बोहाइडे्रट, वसा एवं प्रोटीन के पाचन का काम करता है। शरीर में रक्तशुद्धि का दायित्व भी इसी अंग का है।
शरीर के इतने महत्त्वपूर्ण अंग को शक्तिशाली कैसे बनाया जाए ताकि हमारा शरीर पूर्ण स्वस्थ रहे। इसके लिए योगाभ्यास का साधन सर्वोत्तम साधन माना जाता है। लिवर को सशक्त बनाने तथा लिवर की सूजन को दूर करने के लिए जो यौगिक क्रियाएं रामबाण मानी जाती हैं। उनका विवरण प्रस्तुत है-
लिवर को मजबूत करने के लिए सबसे पहले पवनमुक्तासन, वज्रासन, पद्मासन तथा शशांकासन आदि करना चाहिए। कुछ दिनों के बाद सूर्य नमस्कार के साथ ही पश्चिमोत्तानासन, हलासन, योगमुद्रा तथा भुजंगासन आदि का अभ्यास करना हितकर होता है।
पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं। दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएं। इसके बाद नितम्ब तथा कमर को ऊठाएं। कमर पर हाथ का सहारा देते हुए धड़ के भाग को भी ऊपर उठाएं। पूरे शरीर का वजन गर्दन पर आ जाता है। धड़ तथा पैर को गर्दन से 60 अंश ऊपर उठाएं। इस स्थिति में कुछ देर रहने के बाद सामान्य स्थिति में आ जाएं।
प्राणायाम, भ्रस्त्रिका, सूर्यभेदी तथा नाड़ी शोधन आदि प्राणायाम, लिवर के लिए बहुत उपयोगी हैं। इसका प्रतिदिन आधे घंटे का अभ्यास योग्य योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में करना चाहिए।
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लिवर को सशक्त करने के लिए उड्यिान बंध का भी अभ्यास हितकर होता है। षटकर्म, कुंजल, शंख प्रक्षालन का अभ्यास भी लिवर के लिए लाभप्रद माना जाता है।
मानसिक एवं भावनात्मक असंतुलन लिवर को कमजोर बनाते हैं अत: तनाव का त्याग सर्वथा उचित होता है।
लिवर की सूजन कीे स्थिति को सही करने के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम क्रिया का अभ्यास अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। बुखार न रहने की स्थिति में ही इसे करना चाहिए। शरीर में थोड़ी ताकत आने के बाद ताड़ासन, त्रिकोणासन, कटिचक्रासन, जानुंशिरासन, अर्द्धमत्स्येन्द्रासन, वज्रासन, उष्ट्रासन, मकरासन आदि का अभ्यास महत्त्वपूर्ण माना जाता है, जिन्हें करना चाहिए।
लिवर के सूजन तथा लिवर से संबंधित अनेक प्रकार की बीमारियों को दूर करने का एक महत्त्वपूर्ण आसन कुचचक्रासन माना जाता है। यह आसन मुख्य रूप से औरतों के लिए ही होता है। इस आसन से पेट से संबंधित अनेक बीमारियां दूर की जा सकती हैं।
‘योगतरंगिणी’ पुस्तक के अनुसार कुचचक्रासन के लिए पीठ के बल शवासन की भांति चिट लेट जाना चाहिए। हाथ-पांव सभी को शिथिल छोड़कर दोनों हाथों से दोनों कुचों (स्तनों) को पकड़कर गहरी सांस लेते हुए क्रमश: चक्र के समान दाएं से बाएं एवं बाएं से दाएं घुमाना चाहिए। इस आसन का अभ्यास प्रतिदिन 15-20 मिनट तक करना हितकर होता है।
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विधिजानु शिरासन लिवर के सूजन के लिए अत्यंत उपयोगी होता है। किसी दरी पर बैठकर दोनों टांगों को सीधा कर लें। इसके बाद बायें घुटने को मोड़कर जमीन पर लगा दें। बायीं एड़ी को जांघ के अंदर वाले भाग को छूना चाहिए। पांव का अंगूठा दायें पांव के जांघ को छूए। घुटने को यथासंभव पीछे धकेलें। दायीं टांग को सीधा करके बांहों को पैर की ओर ले जाकर दाहिने पैर के अंगूठे को पकडऩे की कोशिश करें। अब घुटने को कसें और सांस छोड़ते हुए माथे को आगे झुकाएं। पीठ को तानते हुए धड़ को आगे की ओर खींचें। इस स्थिति में कुछ देर रहकर अब दाहिनी टांग को जांघ के नीचे दबाकर इसी प्रकार का अभ्यास करें।
योगाभ्यास के अन्तराल में आहार का विशेष रखना आवश्यक होता है। फलाहार एवं फलों के रसों का सेवन, छेने का पानी, शहद मिलाकर दूध, क्रीम निकला हुआ दूध, सब्जी का सूप, पपीता, खरबूजा आदि का सेवन लिवर के सूजन की स्थिति में लाभप्रद माना जाता है।
किसी भी योगाभ्यास के लिए प्रात: काल का समय ही अच्छा माना जाता है। खुली हवा में योगाभ्यास करना चाहिए। योगाभ्यास से पूर्व किसी भी योगप्रशिक्षक से योग के आसनों की अच्छी तरह जानकारी ले लेनी चाहिए। नियमित योगाभ्यास से ही लाभ होता है। कुचचक्रासन का अभ्यास 16-45 के बीच की नारियों को ही करना चाहिए। योगाभ्यास के तीस मिनट बाद तक पानी नहीं पीना चाहिए।
– पूनम दिनकर

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