ये जातीय संघर्ष ठीक नहीं

ये जातीय संघर्ष ठीक नहीं

    मेरे मित्र ने एक सवाल किया कि क्या जनता मूर्ख है? मुझे बुरा तो लगा लेकिन सोचा तो देखा सही है तो है। आप खुद सोचिए हम मूर्ख नहीं होते तो जाति, धर्म, पार्टी आदि के नाम पर क्यों लड़ते। उत्तर प्रदेश में जो घटना हुई, वो पढ़े लिखे और आधुनिक समाज के लिए शोभा नहीं दे सकती है और उचित भी नही है। आज दलित और उच्च में कोई भेद नहीं है। ऐसा सिर्फ बरगलाने और राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए कहा जाता है। हमारी मित्र मण्डली में सभी प्रकार के जाति, धर्म के लोग हैं और हम अपनी रसोई शेयर करते हैं। कोई भेदभाव नहीं आता है हमारे मन
में। सहारनपुर की घटना नहीं होनी चाहिए क्योंकि जनता को ऐसी उम्मीद नहीं थी। जनता ने सत्ता परिवर्तन तो कर दिया है लेकिन अभी व्यवस्था परिवर्तन होना बाकी है। जब तक सत्ता के साथ व्यवस्था परिवर्तन नहीं होता, तब तक सत्ता परिवर्तन का लाभ जनता को नहीं मिल पाता। आजादी के बाद से चल रही व्यवस्था का परिवर्तन करना कोई आसान कार्य नहीं है क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन के लिए दिल, दिमाग व कार्यशैली में बदलाव लाना आवश्यक है। पूरी की पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार में डूब गई है और भ्रष्टाचार व्यवस्था का एक अँग बन गया है। व्यवस्था से जुड़े लोग विभिन्न राजनैतिक दलों व विचार धाराओं के समर्थक हो गये हैं और उसके लिये वह व्यवस्था का दुरुपयोग करने में जरा भी संकोच नहीं करते। सहारनपुर मे पिछले एक माह से तनाव चल रहा था लेकिन प्रशासन जानते हुए भी अनजान बना रहा। अगर प्रशासन शुरुआत में ही इस तरफ ध्यान दे देता तो शायद आज स्थिति नियंत्रण से बाहर न होती और योगी सरकार के माथे पर हिंसा का कलंक नहीं लगता।  सहारनपुर घटना के लिए सबसे बड़ा दोषी प्रशासन है क्योंकि यदि वह सजग होता तो स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। सहारनपुर घटना के पीछे उन अराजक तत्वों का हाथ है जो योगी सरकार की लोकप्रियता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। सहारनपुर घटना के पीछे बसपा प्रमुख योगी सरकार को दोषी मानकर भीम सेना से अपना पल्लू झाड़ रही है जबकि प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या उन पर जातीय हिंसा कराने का दोषी मढ़ रहे हैं। यह बात सही है कि सहारनपुर में जातीय हिंसा की शुरुआत बसपा प्रमुख के वहाँ जाने के बाद हुई। बसपा प्रमुख को ठाकुरों का अत्याचार दिखाई दे रहा है लेकिन दलित युवकों द्वारा किया गया नंगा नाच नहीं दिखाई दे रहा है। सहारनपुर में जो कुछ भी हुआ, उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता। गलती हमेशा व्यक्ति करता है। कोई समाज उसके लिए कभी दोषी नहीं होता है।  
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      सहारनपुर में सबसे पहले हिंसा की शुरुआत करके दूसरे पक्ष को हिंसा के लिये उकसाने वाले अधिक दोषी हैं क्योंकि बचाव करना हर एक का अधिकार होता है। अभी इसकी शुरुआत ही हुई है। अगर इसे शुरुआत में ही रोक लिया गया तब तो ठीक है वरना जातिवादी जहर पूरे प्रदेश में फैला कर सरकार की नींद हराम की जा सकती हैं। भीम आर्मी के चीफ चन्द्रशेखर आजाद की कार्यशैली को कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता और उनकी जुबान पर ताला नहीं लगाया गया तो वह समाज में जातीय जहर फैलाकर समाजिक भाईचारे को समाप्त कर देगें।सहारनपुर की घटना को लेकर योगी का रूख कड़ा हो गया है और पूरे प्रशासन को हटा दिया गया है। सहारनपुर की घटना की जाँच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के माध्यम से होनी चाहिए और जो भी दोषी मिले, उसे सख्त सजा मिलनी चाहिए। आग में घी डालने वालों की भी जाँच होनी चाहिए और ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि भविष्य में कोई ऐसी हिमाकत करने की हिम्मत जुटा न सके। समाज को तोड़कर राजनीति करना समाजिक अपराध होता है। जातिवादी व साम्प्रदायिक राजनीति से देश कमजोर होता है और असामाजिक तत्वों को फूलने फलने व पैर फैलाने का अवसर मिलता है। किसी भी दृष्टिकोण से अगर देखा जाय तो ऐसा नही होना चाहिए क्योंकि सभ्य समाज के लिए ऐसी बातें शोभा नहीं देती। जिसके लिए हम एक दूसरे का खून बहाने पर उतारू हैं वो हमें उकसा कर अपना उल्लू सीधा कर लेगा लेकिन हमारे बुरे वक्त पर हमारा वही पड़ोसी काम आयेगा जिसको आज हम जाति, धर्म के तराजू से तौल रहे है। सोच के देखिए कि जो बोया जाता, वही काटा भी जाता है। तो ऐसी चीज न बोई जाय जिसको काटने में सबको शर्म आये।– विनय कुमार मिश्र 

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