यूरोप में ट्रंप और मोदी

यूरोप में ट्रंप और मोदी

पहले डोनाल्ड ट्रंप और अब नरेंद्र मोदी यूरोप में हैं। ट्रंप और मोदी में कई समानताएं हैं लेकिन मुझे विश्वास है कि यूरोप में मोदी की भूमिका ट्रंप के मुकाबले बेहतर होगी। ट्रंप ने नाटो देशों को अपने भाषणों में हड़का दिया है। उन्होंने नाटो देशों से साफ-साफ कह दिया है कि अमेरिका आपकी सुरक्षा का बोझ कब तक ढोता रहेगा ? आप अपने सकल उत्पाद का दो प्रतिशत भी खर्च नहीं करते, अपनी सुरक्षा पर और सारा बोझ अमेरिका पर डाल रखा है।
ट्रंप शायद जानते न हों या भूल गए हों कि दूसरे महायुद्ध के बाद इस ‘नाटो’ नामक सैन्य-गठबंधन का जन्मदाता अमेरिका ही था। सोवियत रूस के जोज़फ स्तालिन के डर के मारे अमेरिका ने अपना यह कवच खड़ा कर लिया था। ट्रंप ने जर्मनी में यह भी कह डाला कि हम आपकी कारों का अमेरिका में ढेर नहीं लगने देंगे याने यूरोपीय देशों को ट्रंप ने व्यापारिक धमकी भी दे दी है। इटली में जी-7 की बैठक में ट्रंप ने पेरिस के जलवायु समझौते को भी रद्द कर दिया है।
यूरोप की मनस्थिति आज क्या है, इसका पता जर्मनी की चासंलर एंजला मर्केल के इस बयान से चल जाता है कि हम अब पूरी तरह से बाहरी तत्वों पर निर्भर नहीं रह सकते। याने अब यूरोप को अमेरिका की बैसाखी छोड़ने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। आजकल यूरोप पहुचे हुए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा का जितना भावभीना स्वागत वहां हो रहा है, उससे आप अंदाज लगा सकते हैं कि ट्रंप के प्रति यूरोप का रवैया क्या है।
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ऐसे में पहले मोदी और उनके तुरंत बाद चीन के प्रधानमंत्री का जर्मनी पहुंचना बहुत मायने रखता है। अमेरिका द्वारा खाली की गई जगह को अब ‘पूरब’ के ये दो राष्ट्र भर सकते हैं। चीन के ‘ओबोर’ के प्रति यूरोप के राष्ट्र अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं और भारत के साथ भी अभी तक उनका मुक्त व्यापार समझौता नहीं हुआ है। लेकिन यूरोप और भारत दोनों की मजबूरियां हैं कि वे एक-दूसरे के नजदीक आएं, क्योंकि अमेरिका, रूस और चीन का नया त्रिकोणात्मक संबंध अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में उभर रहा है। इसे मैं ‘कोलूपीटिव’ (याने प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोगी) संबंध कहता हूं।
इस नई दौड़ में भारत को अपने हितों की रक्षा करना है। इस दृष्टि से मोदी की इस यूरोप-यात्रा का विशेष महत्व है। ‘शांघाई सहयोग परिषद्’ में 15 जून से भारत और पाक भी शामिल हो जाएंगे। इस मास्को-यात्रा के दौरान मोदी को पुतिन से कहकर यह देखना होगा कि ‘शांघाई सहयोग परिषद्’ भी कहीं ‘दक्षेस’ की तरह नया अखाड़ा न बन जाए ! चीन चाहे तो भारत और पाक के संबंधों में नरमी ला सकता है लेकिन भारत के प्रति उसकी अपनी वक्र-दृष्टि तो पहले सीधी हो। ऐसे में यही पहल बची रहती है कि यूरोपीय और एशियाई देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर भारत अपने संबंध घनिष्ट बनाए।
– डॉ. वेद प्रताप वैदिक

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