यूपीः चुनाव परिणाम पर टिका है इस दोस्ती का भविष्य…?

यूपीः चुनाव परिणाम पर टिका है इस दोस्ती का भविष्य…?

उत्तर प्रदेश राजनीति की पहली पाठशाला है। कहा जाता है कि यहां उर्वर सियासी जमीन से दिल्ली के सिंहासन का रास्ता गुजरता है। राज्य में चौथे चरण की वोटिंग हो चुकी है। भाजपा, बसपा के अलावा सत्ताधारी दल सपा-कांग्रेस गठबंधन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। चुनावी मौसम पर फागुनी रंग चढ़ गया है। मुद्दों की सियासी जमीन खाली है। कब्रिस्तान और श्मशान से गुजरता कांरवा कसाब तक पहुंच गया है। इससे यहां के चुनावी मिजाज का पता लगाया जा सकता है। उधर,समाजवादी पार्टी में छिड़ी परिवारवाद की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। बाप-बेटे, चाचा-भतीजे एक दूसरे पर वार कर रहे हैं। अखिलेश और राहुल गांधी की दोस्ती एक दूसरे के लिए अग्नि परीक्षा बनी है। प्रतिपक्ष जहां सपा के आतंरिक विवाद का फायदा उठाना चाहता है, वहीं राज्य के सीएम अखिलेश यादव का राजनीतिक भविष्य परिवारवाद की वजह से दांव पर चढ़ा है। विरोधियों के साथ सपा में ही मुलायम और शिवपाल गठबंधन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सीएम अखिलेश यादव ने अंग्रेजी अखबार द हिंदू को दिए गए एक साक्षात्कार में बड़ा बयान दिया। कहा है कि अगर परिवार में झगड़ा नहीं होता तो कांग्रेस से गठबंधन भी नहीं होता। कांग्रेस के साथ गठबंधन हालात की वजह से हुआ। निश्चित तौर पर उन्होंने अपनी बात को बड़ी बेवाकी से रखा है। इस बात पर शक भी नहीं है की परिवारवाद की जंग की वजह से यह गठबंधन हुआ। असल में यदुवंशियों में सत्ता के केंद्रीयकरण को लेकर ही संघर्ष चल रहा था। सीएम को पिता मुलायम और चाचा शिवपाल सिंह के साथ अमर सिंह एंड कपंनी से  भी आतंरिक लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। यह जंग कोई साधारण नहीं बल्कि अखिलेश के अस्तित्व की थी, जिसमें चाचा रामगोपाल उनके सारथी बने और कानूनी रूप से उन्होंने यह जंग जीत लिया। पिता मुलायम सिंह यादव सीएम बेटे अखिलेश की नीतियों का बार-बार दुष्प्रचार कर रहे थे। उन्हें रिमोट सीएम बताया जा रहा था। इस पूरी लड़ाई में मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का नाम खुल कर सामने आया। इसके पीछे वह अपने बेटे प्रतीक और बहू अपर्णा यादव को राजनीति में स्थापित करना चाहती हैं, लेकिन यह बात अखिलेश को नागवार लग रही थी। क्योंकि उनका  पालटिक्स कैरियर ही दांव पर लगा था।फिलहांल सोहराब और रूस्तम के इस खेल में सीएम नई भूमिका में उभरे हैं। गठबंधन उनकी मजबूरी थी क्योंकि राज्य में मुसलमान सपा का बड़ा समर्थक है। 140 सीटों पर वह निर्णायक की भूमिका निभाता है। परिवारिक विवाद में इसका सीधा लाभ बसपा, दलित और मुस्लिम यानी एमडी इंजीनियरिंग के जरिए लेना चाहती थी। यही वजह है कि पार्टी ने 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। मुस्लिम मतों का बिखराव रोकने के लिए अखिलेश के पास कोई दूसरा विकल्प इस गठबंधन के सिवाय नहीं था। दूसरी वजह उनके पास वक्त नहीं था। एक तरफ उन्हें परिवार और पार्टी में खुद के विरोधियों से अघोषित युद्ध लड़ना पड़ रहा था। दूसरी वजह चुनाव तारीखों की घोषणा हो चुकी थी। इसी वजह से कांग्रेस और एसपी का गठबंधन हुआ। हलांकि काफी सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवारों का सीधा मुकाबला हो रहा है। 298 सीटों पर एसपी और 105 पर कांग्रेस लड़ रही है।राजनीति सबसे क्रूर और निर्मम होती है। यहां रिश्ते और संबंध कोई मायने नहीं रखते। अवसर और सत्ता सब कुछ होती है। सियासत में संकट मोचक के नाम से चर्चित ठाकुर अमर सिंह के साथ भी यही हुआ और मुलायम सिंह के पहलवानी लपेटे में वह भी आ गए। आज उनका राजनीतिक अस्तित्व हासिए पर है। यह बात सच है कि झगड़े की सारी स्क्रिप्ट मुलायम सिंह ने लिखी, लेकिन वह इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने खुद यह बात कहीं है कि चुनाव आयोग में पार्टी सिम्बल पर  अधिकार  की जंग में अपना पक्ष रखने के लिए मुलायम सिंह यादव ने उन्हें खुद भेजा था, लेकिन बाद में अपना निर्णय बदलते हुए वापस बुला लिया था। जब अखिलेश को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा था तो इसका पत्र टाइप करने के लिए अमर सिंह को ही जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। बाद में वह पत्र मुलायम के निर्देश पर रामगोपाल सिंह की तरफ से जारी किया गया।मुलायम ने भाई शिवपाल और बेटे अखिलेश, दोनों के बीच अहम भूमिका निभाई। अमर सिंह न घर के हुए न घाट के। यही वजह रही कि  बेटे अखिलेश ने पिता के एक भी करीबी का टिकट नहीं काटा। उसी में एक गायत्री प्रसाद प्रजापति भी हैं जिन पर कोर्ट के आदेश पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज हुआ। वह कोई और नहीं, पार्टी की कार्यकर्ता थी। प्रजापति को अखिलेश पार्टी से निकाल चुके थे। लेकिन वहीं मंत्री आज उनके गले की फांस बन गया। पूर्वांचल के कई दिग्गज नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया, क्योंकि वह चाचा के करीबियों में थे। अमर सिंह सिसासी हासिए पर हैं। वह जहां राहुल और अखिलेश की जोड़ी का मजाक उड़ा रहे हैं, वहीं मोदी और भाजपा  की प्रशंसा में  कसीदे पढ़ रहे हैं। यह साफ है कि  अगली पारी की शुरुवात भाजपा में कर सकते हैं। प्रियंका की तरफ से मोदी के लिए बोले गए बाहरी शब्द पर भी पलटवार करते हुए गांधी परिवार को उन्होंने कश्मीरी बताया है। शिवपाल ने नया दांव खेलते हुए कांग्रेस का प्रचार न करने की बात कही है। फिलहाल इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। शिवपाल खुद राजनीतिक वनवास झेल रहे हैं। अखिलेश ने चुनावी सभाओं में बगैर नाम लिए उन पर जमकर हमला बोला। उन्होंने यह बात भी कही है कि 11 मार्च के बाद पार्टी में अपमान और उपेक्षा न हो तो फिर वह साथ ही रहेंगे। यह स्थिति खुद परिणाम के बाद साफ हो जाएगी।परिणाम अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में रहे तो सीएम सपा की परिवारवादी राजनीति में नयी ताकत के रूप में उभरेंगे और शिवपाल का पार्टी में बने रहना मजबूरी होगी। लेकिन ऐसा नहीं होता, तो परिवारवाद की लड़ाई थमने वाली नहीं है | सपा और कांग्रेस की दोस्ती का भी भविष्य चुनाव परिणाम पर निर्भर होगा, फिलहाल यूपी की सियासत में अखिलेश एक सितारे के रूप में उभरे हैं। उन्होंने अपनी सियासी जमीन खुद तैयार की है। अमर सिंह और शिवपाल अखिलेश के लिए खास मायने नहीं रखते। यूपी के सियासी क्षितीज पर समाजवादी पार्टी में वह एक नए अवतार के रूप में उभरे हैं।-प्रभुनाथ शुक्ल

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