यूं ही नहीं मिली भाजपा को जीत…

यूं ही नहीं मिली भाजपा को जीत…

लखनऊ। सूबे में 403 विधानसभा सीटों के महासमर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जो शानदार प्रदर्शन किया है, उससे जहां कार्यकर्ताओं और समर्थकों का जोश देखते बन रहा है, वहीं यह सफलता पार्टी की कड़ी मेहनत और योजनाबद्ध तरीके से अपनी हर रणनीति को धरातल पर उतारने का परिणाम भी है। पार्टी के प्रदेश प्रभारी ओम प्रकाश माथुर के मुताबिक हमने जो चक्रव्यूह बनाया था, उसमें हम पूरी तरह सफल रहे और हमारा शानदार प्रदर्शन इसी की परिणीति है। यूं तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सभी सियासी दलों के लिए प्रतिष्ठा का विषय था, लेकिन भाजपा पर यहां लोकसभा चुनाव की तर्ज पर प्रदर्शन करने का भी दबाव था। पार्टी यूपी का किला फतेह करके 2019 में भी जनता के सामने पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ जाना चाहती थी। यही वजह है कि इस महारण को जीतने के लिए उसने एक साथ कई मोर्चा पर काम किया। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी की सियासत का मिजाज़, जातीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दों से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके थे। इसलिए उनका लोकसभा चुनाव का तजुर्बा एक बार फिर काम आया। उन्होंने हर बूथ पर ध्यान केन्द्रित करते हुए अपनी टीम के साथ रणनीति तैयार की और अन्त तक इसको जमीनी स्तर पर लागू कराने में सफल रहे। पार्टी का यूपी की सत्ता से वनवास खत्म करने में संगठन से जुड़े लोगों की बेहद अहम भूमिका रही। इनमें राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल, राष्ट्रीय सहसंगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने हर रणनीति को बखूभी अंजाम दिया। वहीं राष्ट्रीय महामंत्री भूपेन्द्र यादव तो लगातार लखनऊ में डेरा डाले रहे। उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सवाल पूछने का सिलसिला शुरू करके समाजवादी पार्टी (सपा) को घेरने का भी काम किया। इसके अलावा प्रदेश संगठन महामंत्री सुनील बंसल ने हर छोटे से छोटे और बारीक पहलू पर ध्यान दिया। बंसल पूरे चुनाव में मीडिया से दूर बनाते हुए पर्दे के पीछे से अपने काम को अंजाम देते रहे।
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उन्होंने प्रदेश स्तर, जिलास्तर और बूथ लेवल तक कार्यकर्ताओं को संगठित और योजनाबद्ध तरीके से काम करने का मंत्र दिया। इसी तरह जेपीएस राठौर प्रचार तंत्र की कमान संभालते नजर आये, जबकि संजय राय ने आईटी सेल का जिम्मा संभाला और साइबर योद्धाओं के जरिए पाटी की बात को लोगों तक पहुंचाने का काम किया। स्वतंत्र देव सिंह ने बड़े नेताओं के रैली प्रबन्धन की कमान संभाली तो संजय मयूथ मीडिया से बेहतर तालमेल बनाते नजर आए। इन सबके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने इस पूरे अभियान पर बेहद बारीकी से नजर रखी और कमी नजर आने पर निर्देश देते रहे। इस तरह भाजपा की हर रणनीति पर संघ की पैनी नजर रही। इसके साथ ही पार्टी ने अपने चुनाव कार्यक्रम को भी बेहद सधे हुए अन्दाज में धरातल पर उतारा। इसके तहत परिवर्तन महारैलियां आयोजित की गईं। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने इनमें क्षेत्रीय मुद्दों का ध्यान रखने साथ अखिलेश यादव सरकार की कमियों को खुलकर जनता के सामने रखा। उन्होंने कांग्रेस शासन की कमियों से लेकर मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकार पर भी हमला बोला। खास बात रही कि यह चुनाव विरोधी दल बनाम मोदी होने का लाभ भी भाजपा को मिला। इसके अलावा पार्टी ने सभी वर्गों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पिछड़ा सम्मेलन, युवा सम्मेलन, महिला सम्मेलन आदि का सहारा लिया। यूपी के मन की बात के जरिए जनता की नब्ज टटोली तो संकल्प पत्र में आम आदमी के मुद्दे शामिल करने के लिए पूरे प्रदेश में जगह-जगह आकांक्षा पेटी रखवायीं। प्रचार को प्रभावी बनाने के लिए मोटरसाइकिलों का भी सहारा लिया गया और हर विधानसभा में औसतन 04 मोटरसाइकिलों के जरिए प्रचार को मजबूती दी गई। वहीं इस बार मतदाता पर्ची पहुंचाने में भी पार्टी ने नई तरह की पहल की। इस बार इसे परिवार अपील पत्र बनाकर भेजा गया, जिसमें सम्बन्धित विधानसभा प्रत्याशी की फोटो के साथ एक सन्देश भी लिखा गया था, जिससे हर परिवारों तक सीधी पैठ बनायी जा सके। पार्टी ने चुनाव प्रबन्धन के लिए सामाजिक समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा। इसके तहत सम्बन्धित क्षेत्र में जिस जाति के लोगों की संख्या ज्यादा थी, वहां उसी बिरादरी के नेताओं के जरिए अपनी बात पहुंचायी गई। विकास के साथ जातियों का सन्तुलन बनाना भी पार्टी की जीत का मुख्य कारण बना। पार्टी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत से लेकर आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के अन्तिम दिन रोजाना 35 जनसभाएं आयोजित की। इस तरह 900 रैलियां आयोजित की गईं, जो जनता से सीधे रूबरू होने का अपने आप में एक रिकार्ड है। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही परिवर्तन रैलियों और विजय शंखनाद रैलियों को मिलाकर कुल 23 जनसभाएं कीं। जबकि सबसे ज्यादा रैलियां प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य ने की। केशव इस चुनाव में पार्टी के प्रमुख चेहरों में से एक रहे। प्रदेश अध्यक्ष के नाते उन पर हर क्षेत्र में पहुंचने का दबाव था और वह इस पर खरे भी उतरे। उन्होंने पिछड़ा वर्ग के वोटबैंक को पार्टी के पक्ष में करने में अहम भूमिका निभायी। इसके अलावा केशव लगातार अपने बयानों से सपा-कांग्रेस गठबन्धन पर भी प्रभावी तरीके से हमला बोलते रहे। इसी तरह गोरखपुर से पार्टी सांसद योगी आदित्यनाथ भी इस पर पूरे चुनाव के दौरान विरोधियों को धराशायी करने के अन्दाज में दिखे। पार्टी ने पहली बार अन्य चुनावों के मुकाबले उनका कहीं ज्यादा इस्तेमाल किया। न सिर्फ योगी ने अपने गढ़ पूर्वांचल बल्कि पश्चिम, बुन्देलखण्ड और रूहेलखण्ड सहित भाजपा के सभी 06 प्रान्तीय क्षेत्रों में जनसभाएं की। खास बात है कि भाजपा की जीत के लिए पर्दे के पीछे और अप्रत्यक्ष तरीके से भी लड़ाई लड़ी गई। इसके तहत समान विचाराधारा वाले संगठनों ने भी अपने दात्यिवों को बेहतर तरीके से निभाया। 
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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) पूरे चुनाव के दौरान छात्रों और युवाओं से मतदान की अपील करता नजर आया। इसके तहत पर्चे वितरण से लेकर नुक्कड़ नाटकों का सहारा लिया गया। इसमें जहां प्रदेश सरकार पर कानून व्यव्स्था को लेकर सीधा हमला बोला गया, वहीं अप्रत्यक्ष तरीके से भाजपा के पक्ष में वोट की अपील की गयी। यहां तक की हर विधानसभा में पहुंचायी गई मोटरसाइकिलों की कमान भी विद्यार्थी परिषद ने बाद में अप्रत्यक्ष तौर पर अपने हाथ में ले ली, जिससे प्रचार को और प्रभावी बनाया जा सके। इसी तरह किसान संघ ने किसानों, मजदूर संघ ने मजदूरों और कामगारों, विद्या भारती ने शैक्षिक संगठनों, सेवा भारती ने झोपड़ पट्टियों, बस्तियों के बीच जाकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का काम किया। इस पूरे अभियान के दौरान संघ के डॉ. कृष्ण गोपाल, भाजपा संगठन के राम लाल और शिवप्रकाश ने रूठे हुए भाजपाईयों को भी मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि टिकट कटने या दूसरे कारणों से नाराज चल रहे नेता मिशन 2017 की जीत में रोड़ा नहीं बने। इसलिए उनकी नाराजगी दूर करते उन्हें पार्टी में पूरी अहमियत दिए जाने का भरोसा दिलाया गया। पार्टी इस दिशा में भी बेहद सफल रही। चुनावी फिजा में हर क्षेत्र में पार्टी बेहद प्रभावी और आत्मविश्वास से लबरेज नजर आए, इसके लिए खास तरह का प्लान तैयार किया। यही वजह रही कि पहले तीन चरणों तक पार्टी ने जहां लखनऊ को अपना केन्द्र बिन्दु बनाया और वरिष्ठ नेता यहां मीडिया से मुखातिब होते रहे। वहीं आगे के चरणों में कानपुर, गोरखपुर और वाराणसी पर केन्द्रित किया गया। पार्टी के अलग-अलग तंत्र की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो प्रवक्ताओं में चन्द्रभूषण पाण्डेय, मनीष शुक्ला, शलभमणि त्रिपाठी, हरीश श्रीवास्तव, चन्द्रमोहन, राकेश त्रिपाठी, नरेन्द्र सिंह राणा, नवीन श्रीवास्तव, आलोक अवस्थी, डॉ. संजीव सिंह, डॉ. दीप्ति भारद्वाज और हिमांशु दूबे मीडिया में भाजपा का पक्ष मजबूती से रखते नजर आये। इसी तरह प्रचार तंत्र में गोविन्द नारायण शुक्ला के नेतृत्व में तरूणकान्त, निखिलेश और सन्तोष ने जिम्मा संभाला इसके अलावा बूथ विजय अभियान के तहत मिथिलेश त्रिपाठी, नितिन मित्तल, अशोक दूबे, आलोक शुक्ला, सच्चिदानन्द राय, हर्षवर्धन सिंह और प्रखर मिश्रा ने जेपीएस राठौर के नेतृत्व में हर बूथ पर जीत के लिए पसीना बहाया। जहां पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति कमजोर नजर आयी, वहां उसे सुधार करने का काम किया गया। वहीं प्रशासन तंत्र में कुलदीप त्रिपाठी, प्रखर मिश्रा, निखिल संगठन की ओर से मिली जिम्मेदारी को संभालते नजर आये। इन सबके साथ रिसर्च विंग का भी भाजपा की जीत में अहम योगदान रहा। इस विंग ने हर क्षेत्र के उन मुद्दों को तलाशने का काम किया, जो जनता को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा सरकारों की वादाखिलाफी के क्षेत्रीय मुद्दों को रिसर्च विंग प्रभावशाली तरीके से सामने लायी। इसके बाद इन मुद्दों को जनसभा करने वाले नेताओं को मुहैया कराया गया। खुद पीएम मोदी ने भी कई बार रिसर्च विंग की मदद से विरोधी दलों पर प्रहार किया। इस तरह भाजपा की जीत एक सधी हुई रणनीति, कई दिनों तक की गई लगातार मेहनत, संगठित नेतृत्व के तहत जमीनी स्तर पर किए काम और उनकी मॉनीटरिंग तथा मतदाताओं की नब्ज पकड़ने में कामयाबी का परिणाम है। हालांकि राजनैतिक विश्लेषक हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहते हैं कि जनता की नजरों में असली हीरो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही रहे हैं। पार्टी ने भले ही अपनी रणनति के तहत सीएम फेस घोषित नहीं किया, लेकिन पीएम मोदी उनसे ऐसे रूबरू होते रहे, जैसे यह चुनाव स्वयं उनका हो। इसका पार्टी को बहुत बड़ा फायदा भी चुनाव परिणाम के रूप में मिला। इस तरह अब केन्द्र के साथ राज्य में भी कमल खिलने के बाद पार्टी पर जनआकांक्षाओं पर खरा उतरने का दारोमदार होगा।  

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