यूं बहकते हैं कदम किसी और की तरफ

यूं बहकते हैं कदम किसी और की तरफ

other-manऐसे बहुत सारे दंपति मिल जाएंगे जिनके मध्य कोई तीसरा इस तरह आ जाता है कि पता ही नहीं चल पाता कि ऐसा कब और कैसे हो गया और फिर देखते ही देखते खुशहाल जीवन भी नारकीय बन जाता है तथा परिणाम आत्महत्या, तलाक अथवा गृह क्लेश के रूप में सामने आता है।
आखिर ऐसा क्यों होता है? क्यों आ जाता है पति-पत्नी के बीच कोई वो जिसे नहीं आना चाहिए था। प्राय: देखने में आता है कि आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी एवं बढ़ती आवश्यकताओं के चलते पति या पत्नी के पास एक दूसरे के लिए दो पल हंसने, बोलने, मिल बैठने, बतियाने, अपने सुख दु:ख को बांटने का वक्त ही नहीं मिल पाता। धीरे-धीरे यह संवादहीनता एवं दूरी इतनी बढ़ जाती है कि इस दूरी को पाटने के लिए वे किसी दूसरे की तरफ बरबस ही खिंचे चले जाते हैं।
कई बार पति या पत्नी को सेक्स ज्ञान न होना अथवा यौन तृप्ति देने में अक्षम होना, लगातार बीमार रहना अथवा बदसूरत होना भी ‘वो’ को दोनों के बीच ले आता है।
पति या पत्नी द्वारा एक दूसरे की भावनाओं को न समझना अथवा उपेक्षा करना, बात-बात पर झगडऩा, कलह करना, ताने कसना अथवा एक दूसरे का उपहास करना या फिर किसी एक का तीसरे के आकर्षण में बेवफा हो जाना भी इस टूट का कारण बन जाता है। कई बार गरीबी एवं अभाव भी सम्पन्न तीसरे को जिंदगी में प्रवेश का मौका दे देते हैं तो कई बार मासूमियत एवं भोलेपन का लाभ उठाकर भी कोई सौत या शोहदा बनकर चालाकी से सुखी दांपत्य में जहर घोल देता है।
यही नहीं, कभी-कभी मजबूरी या भयादोहन अथवा ब्लैकमेलिंग भी दांपत्य जीवन में तीसरे को ले आने में मदद करते हैं किंतु शारीरिक एवं मानसिक असंतुष्टि अथवा असुरक्षा का भाव पति-पत्नी के बीच ‘वो’ के आने का सबसे बड़ा कारण बनता है।
अत: जरूरी है कि अपने पारिवारिक जीवन में एक दूसरे का पूरा ख्याल रखें, भावनाओं को परस्पर समझें, उपेक्षा व तानाकशी तथा कलह से बचें। यौन अक्षमता तथा बीमारी में धैर्य रखें तथा वफादारी का महत्व समझें। अपनी आवश्यकताओं को अपने बजट के अनुसार सीमित रखें। घर आने वाले दोस्तों या सहेलियों को भी असीमित छूट न दें तथा अपनी यौन क्रि याओं अथवा शयन कक्ष की गतिविधियों को कभी सार्वजनिक न बनने दें।
जो सुख व संतोष पति-पत्नी के पवित्र बंधन वाले संबंध में है, वह कोई तीसरा कभी नहीं दे सकता। क्षणिक वासना, शारीरिक आनंद, मौज-मस्ती अथवा भावना या प्रतिशोध में बहकर किसी को अपनी जिदंगी नारकीय न बनाने दें व सामाजिक उपहास का पात्र बनने से बचें।
– घनश्याम बादल

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