यूं दूर क्यों जा रहे हैं भारत के मित्र देश

यूं दूर क्यों जा रहे हैं भारत के मित्र देश

भारत के सबसे विश्वसनीय मित्र के रूप में विश्वभर में चर्चित रहे रूस द्वारा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का समर्थन किया गया है। सीपीईसी को रूस का इस ढंग से समर्थन मिलना भारत के लिए एक कूटनीतिक दृष्टि से बिल्कुल ही सही नहीं कहा जा सकता। क्यों कि खासकर दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान में से किसी भी मुद्दे पर किसी भी देश का साथ देने की जब भी बात आती रही है तो रूस हमेशा ही भारत के पक्ष में मजबूती के साथ खड़ा होता आया है तथा रूस द्वारा हमेशा से यह सुनिश्चित किया जाता रहा है कि भारत का अहित किसी भी परस्थिति में न होने पाए। जबकि अमेरिका सहित दुनिया के अन्य प्रभावशाली देश हमेशा से भारत के साथ चालाकी पूर्ण बर्ताव करते आये हैं। फिर भारत के शासनाध्यक्ष अमेरिका, चीन सहित दुनिया के अन्य बड़े देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत बनाने का चाहे जितना भी दावा कर लें लेकिन इन देशों ने ऐन वक्त पर हमेशा ही भारत की अपेक्षा पाकिस्तान को ज्यादा महत्व दिया है। वह तो केवल रूस ही ऐसा बड़ा मुल्क रहा है जिसने भारत के हितों की अनदेखी कभी नहीं की तथा खासकर जब किसी भी मुद्दे पर पाकिस्तान व भारत की प्रतिष्ठा का सवाल आया है तो रूस हमेशा ही पाकिस्तान को जोर का झटका देता आया है।
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भारत द्वारा पोखरण का परमाणु परीक्षण किये जाने के बाद अमेरिका ने जब भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया था तथा उसने यह धारणा बना ली थी कि भारत ने पोखरण परमाणु परीक्षण के माध्यम से सामरिक दृष्टि से खुद को मजबूत बनाकर एक गुनाह कर डाला है तब भी रूस ने भारत का समर्थन किया था तथा उसके द्वारा स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि सामरिक दृष्टि से खुद को आत्मनिर्भर व शक्ति संपन्न बनाना भारत का अधिकार है तथा ऐसे मामलों में किसी भी देश द्वारा दखलंदाजी नहीं की जानी चाहिये। लेकिन अब अपने बदले हुए रवैये के अनुसार रूस द्वारा सीपीईसी से जुडऩे की इच्छा जतायी गई है तो उसे स्पष्ट तौर पर पाकिस्तान के प्रति रूस का यह दोस्ताना रवैया ही माना जायेगा क्यों कि इसके पूर्व रूस द्वारा कहा गया था कि उसकी सीपीईसी में कोई दिलचस्पी नहीं है लेकिन अब भारत के इस पुराने मित्र ने अपने यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन प्रोजेक्ट को इस गलियारे से जोडऩे की इच्छा जतायी है तो इसे भारत के लिये बड़ा झटका ही माना जा सकता है। क्यों कि रूस का पाकिस्तान के प्रति इस तरह सकारात्मक रूख अपनाना भारत के लिए परेशानी का सबब बन सकता है क्योंकि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत दुनियाभर में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश में जुटा है, ऐसे में उसे रूस का पुरजोर समर्थन मिलना चाहिये था लेकिन अब आशंका जताई जा रही है कि आतंकवाद के मुद्दे पर भी कहीं रूस पाकिस्तान के साथ न खड़ा हो जाए क्यों कि चीन जैसे शातिर देश तो खुले तौर पर ऐसा कर ही रहे हैं, जो भारत की बर्बादी के लिये पाकिस्तान को मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं तथा उनकी लगातार यह कोशिश जारी है कि विश्व बिरादरी में भारत की साख कभी भी बढऩे न पाए।
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अभी कुछ माह पूर्व जब भारत को एनएसजी की सदस्यता मिलने की बारी आई थी तो चीन द्वारा पाकिस्तान का अरमान पूरा करते हुए भारत के इस बड़े कूटनीतिक कदम को रोकने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया गया था। इसके बाद अंत में एनएसजी की सदस्यता के मुद्दे पर भारत को निराशा ही हाथ लगी थी। वैसे विश्व बिरादरी के बीच भारत की इस तरह कमजोर होती स्थिति के लिये केन्द्र की मौजूदा सरकार की विदेश नीति को प्रमुखता के साथ जिम्मेदार माना जा सकता है। क्यों कि नरेन्द्र मोदी सहित उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को जानकारों द्वारा शुरुआती दौर से ही कूटनीतिक रूप से अपरिपक्व माना जा रहा है जो कभी अमेरिका की अनावश्यक यात्रा को अपनी प्रतिष्ठा का सूचक मानते हैं तो कभी उनके द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत आमंत्रित करके खुद ही चाय बनाकर पिलाने की गैर जरूरी कवायद की जाने लगती है। ऐसे कदमों से सिर्फ चर्चित बना जा सकता है लेकिन देश की प्रतिष्ठा व साख में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हो सकती। साथ ही विश्व बिरादरी के बीच यह नकारात्मक संदेश भी जा सकता है कि भारत के शासनध्यक्ष जब अमेरिका की अनावश्यक चाटुकारिता में ही अपना समय गुजार रहे हैं तो फिर किसी भी मुद्दे पर हम भारत के साथ प्रतिबद्धतापूर्ण मैत्री का निर्वहन क्यों करें। वैसे दुनिया के प्रतिष्ठित देशों की अमेरिका से इस तरह नाराजगी तो स्वाभाविक ही है क्योंकि अमेरिका की तानाशाही व चालाकी से दुनिया के कुछ बड़े देश भी प्रभावित हैं तथा भारत का अमेरिका के पिट्ठू के रूप में इस्तेमाल होना रूस सहित अन्य बड़े देशों को नागवार तो गुजरेगा ही। अब यह तो नरेन्द्र मोदी व उनकी सरकार के विवेक पर निर्भर करता है कि वह रूस सहित दुनिया के अन्य प्रभावशाली देशों की भारत के प्रति बढ़ती बेरुखी और पाकिस्तान के प्रति उनकी परवान चढ़ती निकटता को रोकने के लिये कौन से प्रभावशाली काम करते हैं। क्यों कि कूटनीतिक सफलता के लिये सूझबूझ, संवाद व प्रतिबद्धता की जरूरत होती है तथा इसके लिये विदेश नीति के जानकारों, विपक्षी वरिष्ठ राजनेताओं आदि से भी सलाह-मशविरा किया जाना चाहिये।
-सुधांशु द्विवेदी

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