युवाओं में डच रूल का चलन

युवाओं में डच रूल का चलन

पहले कुछ ऐसा ही दस्तूर था कि कोई युवक और युवती जब सैर सपाटे पर निकलते थे तो उस दौरान स्कूटर-टैक्सी या खाने-पीने का सारा खर्च प्रेमी युवक ही अदा किया करते थे। गर्लफ्रेंड अगर अपने पर्स का मुंह खोलना भी चाहती थी तो उसका ब्वायफ्रेंड ‘यह क्या कर रही हो’ कहकर युवती के भुगतान के लिए बढ़े हाथों को रोक दिया करता था। महिला मित्र को कुछ खर्च करना पड़े, यह बात युवकों को गवारा नहीं थी। एक नियम बन गया था कि सारा खर्च ब्वाय फ्रेंड ही करेगा और दशकों तक यह चलन बदस्तूर जारी रहा। आज के आधुनिक दौर में जब युवतियां भी अपने ब्वाय फ्रेंड के समान ही पढ़ी-लिखी हैं, अपने ब्वाय फ्रेंड के समान ही कमा रही हैं और कई मामलों में तो ब्वाय फ्रेंड से ज्यादा सैलरी पा रही हैं तो युवक-युवतियों की दोस्ती के बीच कोड ऑफ कंडक्ट एंड बिहेवियर के नियम भी बदल चुके हैं। ऐसे बदलाव के पीछे वजह है युवतियों की युवकों-सी होने की सोच।
इस मुद्दे पर मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि नए जमाने की युवतियों को युवकों जैसा बन कर रहना कुछ ज्यादा ही अच्छा लगने लगा है। इससे उनको उनकी ‘हम किसी से कम नहीं’ वाली भावना को बल मिलता है। आजकल युवतियां भी वह सब काम करती हैं जो कभी केवल युवक ही किया करते थे। युवतियों की इस धारणा के समर्थन में मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह तो नए जमाने का चलन है और जब नए चलन की बयार बहती है तो बहुतों को अपने साथ लपेटते हुए ले जाती है। नए जमाने की युवतियां अब जब युवकों की तरह सोचने लगी हैं तो वे युवकों जैसा ही व्यवहार करती हैं। ऐसे व्यवहार से युवतियां शायद अपने को स्ट्रांग होना जाहिर कर रही हैं।
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सैर सपाटे को लेकर साझे खर्च के मुद्दे पर कुछ युवकों में अभी भी हिचक बाकी है। इस साझे खर्च के मुद्दे पर मनहर छाबड़ा का कहना है कि किसी रेस्तरां में खाने-पीने के बाद मेरी गर्लफ्रेंड जब बिल पे करना चाहती है तो मुझे बड़ा अटपटा लगता है। मैं अपनी गर्लफ्रेंड सुधा को कई बार समझा चुका हूं कि मेरे होते हुए तुम्हें अपना बटुआ खोलना पड़े, यह मुझे अच्छा नहीं लगता है। मेरे सामने तुम कोई ऐसी कोशिश मत किया करो लेकिन सुधा के पास डच रूल को वाजिब साबित करने वाले अपने ही तर्क हैं।
सुधा कहती हैं कि मैं अच्छी सैलरी वाली नौकरी कर रही हूं। अपनी कमाई का एक अंश मेरे पास अपने निजी खर्चों के लिए सुरक्षित होता है। ऐसे खर्च से जब मुझे कोई तकलीफ नहीं होती, तब तुम मुझे बिल पे करने से मना क्यों करते हो ? तुम्हारे बार-बार मना करने से मुझे ऐसा लगता है कि तुम मुझे दोस्ती में कुछ खर्च करने के काबिल ही नहीं समझते। दोस्ती में कोई लगे-बंधे नियम नहीं होते। मेरे बिल पे करने की बात को तुम अपनी मर्दानगी को चैलेंज के रूप में क्यों लेते हो ? इस बात को अगर इस ढंग से समझो कि हम बराबर के दोस्त हैं, तो तब तुम्हें मेरा बिल पे करना शायद बिलकुल भी बुरा
नहीं लगेगा। सुधा के मुख से यह सब सुनकर मनहर को तब चुप रह जाना पड़ता है।
साझे खर्च का बिल पे करने के मुद्दे पर एक युवती अंजलि का कहना है कि महिला मित्र के खर्च में हिस्सेदारी में बुरा कुछ भी नहीं है। हां, जिस दिन मेरे ब्वायफ्रेंड का जन्मदिन या उसको प्रमोशन मिलता है, उस शाम आयोजित पार्टी में, बिल में किसी प्रकार की हिस्सेदारी या अपना बटुआ खोलने की बात मैं सोच भी नहीं सकती। उस दिन मैं अपने ब्वायफ्रेंड के खर्चे पर अपने लिए बढिय़ा-बढिय़ा भोजन मंगवाती हूं। उस दिन तो अपने ब्वायफ्रेंड का खूब खर्च करवाती हूं। इस तरह जिस दिन मेरा जन्मदिन होता है, उस दिन मैं अपने ब्वायफ्रेंड को उत्साहित करती हूं कि महेश, आज खाने-पीने, मौज-मस्ती में कंजूसी न करना। खाओ-पियो, मौज करो। इससे मुझे खुशी मिलेगी।
खुली मानसिकता वाले युवकों ने तो इस बात को मान लिया है कि कहीं मिल बैठने पर जब हम अपने किसी पुरूष दोस्त के सामने बिल पे करने को लेकर ‘बिल तो मैं ही दूंगा’ वाली जिद नहीं करते, दोस्त के बिल पे करने की बात को सहज स्वीकार कर लेते हैं, तब जिस महिला मित्र को हम अपने बराबर का समझते हैं, अपने बराबर का दर्जा देते हैं, उसके बिल पे करने को लेकर जिद क्यों करें ? इसमें कुछ भी तो बुरा नहीं।
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सो आज जब कोई युवक और युवती घूमने-फिरने के लिए निकलते हें तो खर्च को लेकर डच रूल को फालो किया जाता है। मौके पर बिल बेब पे करे या ड्यूड, कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि खर्च को लेकर युवक-युवतियां अब ओपन हो चुके हैं।
सारे दिन में जो खर्च आता है, शाम को अलग होने से पहले आधा-आधा बांट लिया जाता है। इससे किसी एक की जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता वरना पहले कुछ युवक तो ऐसे खर्चे के डर से दिल में अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने की तीव्र इच्छा होने के बावजूद या खर्च का जुगाड़ न होने की वजह से अपनी गर्लफ्रेंड से छिपते रहते थे। डच रूल के चलन ने युवक-युवतियों का मिलना-जुलना अब आसान बना दिया है। पहले जब किसी वजह से कोई युवती अपने ब्वाय फ्रेंड से किनारा कर लेती थी तो उसका प्रेमी यार-दोस्तों के बीच रोना रोया करता था कि मेरी गर्लफ्रेंड ने तो मुझे लूट खाया। मैंने उस पर बेतहाशा पैसा लुटाया, फिर भी उसने मुझसे दोस्ती तोड़ ली। मुझे तो उसने कहीं का नहीं छोड़ा।
डच रूल का चलन होने के बाद ऐसे युवकों के पास अपनी गर्लफ्रेंड को लोभी, लालची साबित करने लायक शायद अब कुछ भी नहीं बचेगा, सो डच रूल का प्रत्यक्ष लाभ शायद सबसे ज्यादा युवतियों को ही मिलेगा। उन्हें कोई नाहक बदनाम तो नहीं कर सकेगा।
– नरेंद्र देवांगन

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