यकृत में सूजन: हिफाजत आवश्यक

यकृत में सूजन: हिफाजत आवश्यक

देश में स्वास्थ्य के सिद्धांतों का पालन न करने के कारण संक्रमण रोगों का प्रकोप विशेषकर आंतों के संक्रमण ग्रस्त रोगियों की बहुतायत है। आंतों में परजीवियों से संक्रमण अति सामान्य है। आंतों का संक्रमण अमीबा परजीवी (एंटअमीबा हिस्टोलिका), नाशपाती के आकार वाले जियारडिया परजीवी धागे के समान थ्रेडवर्म, लंबे गोल राउंड वर्म, (एस्केरिस), फीते जैसे चपटे टेप वर्म, छोटे घुमावदार हुकवर्म, जो आंत की दीवार से चिपककर खून चूसते हैं, इत्यादि से हो सकता है।
अमीबा के परजीवी से संक्रमित हो जाना अत्यधिक सामान्य सी बात है। अनुमानत: देश की चौथाई से अधिक आबादी अमीबा से संक्रमित है। कुछ मरीजों में संक्रमण मामूली रूप से होता है पर अनेक व्यक्ति पूरी जिंदगी इसके कारण होने वाली विभिन्न समस्याओं के कारण परेशान रहते हैं। अधिकांश मरीज चिकित्सक से उपचार न कराकर स्वयं ही दवाओं का सेवन करते रहते हैं और रोग को जीवन का अंश मान लेते है।
अमीबा परजीवी के संक्रमण, संक्रमित जल व पेय के सेवन, भोजन की गंदगी, स्वच्छता के नियमों के पालन न करने के कारण होता है। संक्रमित व्यक्ति के मल से अमीबा परजीवी और इसके जीवाणु निकलते रहते हैं। परजीवी तो आसानी से नष्ट हो जाते हैं पर जीवाणु हठीले होते हैं और लंबे समय तक पानी भरी मिट्टी में जीवित रहते हैं। यदि जल, पेय पदार्थ, भोज्य पदार्थ इन जीवाणुओं से संक्रमित हो जाते हैं तो भोजन के माध्यम से ये आंतों तक पहुंच जाते हैं।
इसका संक्रमण होने पर बड़ी आंत में सूजन (कोलाइटिस) गांठ-घाव (अल्सर), आंतों में रूकावट हो सकती है जिसके कारण मरीज को पतले दस्त, पेट फूलना महसूस होना, मल में आव (म्यूकस) आने, रक्त आने, पेट दर्द, कमजोरी, थकावट, भूख कम लगना, मिचली, अपच, खून की कमी, इत्यादि समस्याएं हो सकती हैं। उपचार में लापरवाही से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर यह परजीवी रक्तवाहिनियों द्वारा यकृत में पहुंचकर वहां पर तेजी से बढ़कर यकृत कोशिकाओं को नष्ट कर फोड़ा (अमीबिक-लिवर एब्सेस) तक बना देते हैं जो एक गंभीर घातक रोग है।
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अमीबा के कारण बड़ी आंत में सूजन हो जाती है जिसे कोलॉइटिस कहा जाता है। कोलाइटिस ग्रस्त होने के कारण अचानक पेट में दर्द, मरोड़, पतले दस्त, मल में आंव, की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। कुछ लोगों में रक्त मवाद भी आने लगता है। ज्वर, चक्कर, मुंह सूखना, पेट फूलना, पेट में गुडग़ुड़ की आवाज, पेशाब कम होना, कमजोरी, घबराहट इत्यादि के लक्षण भी उभर कर सामने आ जाते हैं। कुछ मरीजों के शरीर में जल तथा खनिज लवणों की कमी हो जाती है। रक्तचाप कम हो जाता है।
दीर्घकालीन कोलाटिस के मरीजों में वर्षों पेट गड़बड़ रहने की शिकायत होती है। मल साफ न होने, पेट फूलने, मल के साथ आंव या चावल के मांड जैसा सफेद गाढ़ा चिकना, चमकीला, मल निकलता है। कुछ रोगियों में सिर्फ आंव होती है या मरीजों को दिन में कई बार पैखाना जाना होता है, फिर भी पेट साफ नहीं होता। कुछ में कब्ज हो जाती है। मल साफ न होने के कारण कब्ज हो जाता है। भूख न लगना, जी मिचलाना, कार्य में एकाग्रता न रख पाना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
कुछ मरीजों में पेट में दर्द, मरोड़ भी होने लगते हैं। पेट दर्द, पेट के पूरे निचले हिस्से या बायें या दाएं निचले हिस्से में दर्द होता है। कुछ में शौच के समय तेज दर्द उठता है और मल त्याग के बाद राहत मिल जाती है। इनमें पेट फूलने, अधिक गैस बनने, डकार आदि की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। आधा-अधूरा उपचार कराने से लक्षण तो समाप्त हो जाते हैं किंतु पुराना संक्रमण पुन: सक्रिय होकर दु:ख देने लगता है।
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कभी-कभी अमीबा परजीवी आंतों से रक्तवाहिनियों द्वारा यकृत में पहुंचकर वहां विकसित होकर यकृत में फोड़ा भी बना देते हैं जिसमें मवाद के समान द्रव भर जाता है। इसे अमीबिक लिवर एब्सिस कहा जाता है। इस बीमारी में तेज बुखार, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, भूख न लगना, कमजोरी, खून की कमी, मितली, पीलिया, पैरों में सूजन इत्यादि समस्याएं हो सकती हैं। उपचार निदान में देरी होने से यकृत का फोड़ा, फेफड़े की झिल्ली, पेट की झिल्ली, फेफड़े, हृदयावरण अथवा त्वचा में फैलकर घातक जानलेवा हो सकता है।
समुचित उपचार के साथ ही स्वच्छता को अपनाना इस बीमारी के लिए अत्यावश्यक होता है। दूध पेयजल, भोज्य पदार्थ की स्वच्छता और शुद्धता का ख्याल रखना आवश्यक है। अमीबीएसिस ग्रस्त होने पर चिकित्सक से परामर्श लेकर पूरा उपचार कराने और स्वच्छता के सिद्धांतों का पालन करने से रोग से स्थायी निजात मिल सकती है।
– आनंद कुमार अनंत

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