मौत के सामने मुस्कान बिखेरता एक चेहरा

मौत के सामने मुस्कान बिखेरता एक चेहरा

 फरवरी 1906 में अंग्रेजों ने एक प्रदर्शनी में तस्वीरों व कठपुतलियों के माध्यम से यह जाहिर करने की कोशिश की कि ब्रिटिश शासक विदेशी होने के बावजूद भारतीयों की मदद कर रहे हैं। प्रदर्शनी में मौजूद भारी भीड़ में सोलह साल का एक बालक खुदीराम बोस भी शामिल थे। वह प्रदर्शनी के विरोध में पर्चे बांट रहे थे। उस पर्चे पर शीर्षक था- सोनार बांग्ला और उसमें वंदेमातरम के जयघोष के साथ प्रदर्शनी आयोजित करने के पीछे ब्रिटिश सरकार की वास्तविक मंशा का खुलासा करते हुए अंग्रेजों के अन्याय और निर्दयता के विभिन्न रूपों का उल्लेख किया गया था।खुदीराम बोस एक ऐसा नाम है, जिन्होंने भारत को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों पर पहला बम फेंका था। वह जब  में थे, तो वंदे मातरम शब्द ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। सोलह साल की उम्र में इस बालक ने पुलिस को चुनौती दी और 19 साल की उम्र में वह शहीद हो गए। उनके हाथों में भागवत गीता थी और होठों पर वंदे मातरम। सौ साल पहले ११ अगस्त १९०८ को उन्हें फांसी दी गई। वह ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने काफी छोटी उम्र में ही मातृभूमि पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल के मेदनीपुर जिले के मोहोबनी गांव में हुआ। उनके पिता त्रिलोकनाथ बसु नैदाजोल प्रिंस के शहर में रेवन्यु एजेंट थे। उनकी माता लक्ष्मीप्रिया देवी धर्मनिष्ठ महिला थीं, जो अपने धार्मिक जीवन और उदारता के लिए जानी जाती थीं। भागवत गीता की प्रेरणा से खुदीराम बोस ने अपने जीवन का लक्ष्य तय किया और गीता उपदेश ने ही उन्हें ब्रिटिश राज को खत्म करने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने की शक्ति दी। 1905 में ब्रिटिश द्वारा बंगाल भंग की घोषणा ने उन्हें काफी निराश कर दिया था और वे क्रांतिकारी पार्टी जुगांतर से जुड़ गए। 19 जुलाई 1905 को अंग्रेज गवर्नर जनरल करजन ने बंगाल को दो भागों-पूर्वी बंगाल में असम व बाकी बंगाल में बिहार व उड़ीसा के कुछ भाग में बांटने की घोषणा कर दी थी। इस प्रस्ताव का देश भर में विरोध हुआ था।फरवरी 1906 में अंग्रेजों ने बंगाल के मेदनीपुर में एक बड़ी प्रदर्शनी का आयोजन किया। इसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश द्वारा किए गए अन्याय को छिपाना था। प्रदर्शनी में तस्वीरों व कठपुतलियों के माध्यम से यह जाहिर किया गया था कि ब्रिटिश शासक विदेशी होने के बावजूद भारतीयों की मदद कर रहे हैं। प्रदर्शनी में मौजूद भारी भीड़ में सोलह साल के खुदीराम बोस भी शामिल थे। वह प्रदर्शन के विरोध में पर्चे बांट रहे थे। उस पर्चे पर शीर्षक था- सोनार बांग्ला और उसमें वंदेमातरम के जयघोष के साथ प्रदर्शनी आयोजित करने के पीछे ब्रिटिश सरकार की वास्तविक मंशा का खुलासा करते हुए अंग्रेजों के अन्याय और निर्दयता के विभिन्न रूपों का उल्लेख किया गया था।प्रदर्शनी में मौजूद अंगे्रज व उनके समर्थकों ने ब्रिटिश शासन के अन्याय का खुलासा करने वाले खुदीराम बोस का विरोध किया। उन लोगों के लिए वंदे मातरम स्वतंत्रता और स्वराज चुभने वाले और निरर्थक शब्द थे। लोगों ने उन्हें पर्चे बांटने से रोकने की पूरी कोशिश की। उन्हें धमकाया भी गया, लेकिन इन सब बातों को नजरअंदाज करते हुए वह पर्चे बांटते रहे। जब कुछ लोगों ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, तो वह चतुराई से बच निकले। आखिर में एक पुलिसवाले ने उनका हाथ पकड़ लिया और पर्चे छीन लिए, लेकिन बालक खुदीराम को पकड़ना इतना आसान नहीं था। उन्होंने पुलिसवाले के हाथ को झटका दिया और उसकी नाक पर एक जोरदार प्रहार कर दिया। इसके बाद अपने पर्चे वापस छीन लिए और पुलिसवाले को चेता- सावधान, मुझे छूना मत, मैं देखता हूं, तुम मुझे बिना वारंट के वैसे गिरफ्तार करते हो। पुलिस वाला, जिस पर घूंसे से प्रहार किया गया था, दोबारा उनकी ओर लपका, लेकिन खुदीराम बोस भीड़ में कहीं गायब हो गए।
सोलह साल की छोटी सी उम्र में खुदीराम बोस पुलिस स्टेशन के पास बम रखने और सरकारी अधिकारियों को निशना बनाने के बाद पुलिस को चकमा देकर निकल गए। शृंखलाबद्ध बम विस्फोट करने के आरोप के तीन साल बाद उन्हें पकड़ा जा सका। उन्हें जिस बम विस्फोट के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी, उसमें तीन लोग मारे गए थे – मिसेस केनेडी, उनकी बेटी और एक नौकर। दरअसल खुदीराम बोस और उनके सहयोगी प्रफुल्ल चाकी ने विंगफोर्ड को मारने के लिए इस विस्फोट की योजना बनाई थी। विंगफोर्ड पहले कलकत्ता प्रिसिडेंसी में मजिस्ट्रेट थे, जो बाद में मुजफ्फरपुर, बिहार के मजिस्ट्रेट बने। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल विंगफोर्ड की हत्या के उद्देश्य से मुजफ्फरपुर पहुंचे थे।दोनों ने पहले विंगफोर्ड की दिनचर्या का जायजा लिया और उसके मुताबिक अपनी योजना बनाई। 30 अप्रैल 1907 की शाम दोनों यूरोपियन क्लब के गेट के सामने विंगफोर्ड की गाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे। जब गेट से एक गाड़ी बाहर निकली, तो उन्होंने बम फेंककर गाड़ी को उड़ा दिया। हालांकि गाड़ी में विंगफोर्ड नहीं था, बल्कि दो ब्रिटिश महिलाएं-बैरिस्टर प्रिंगल केनेडी की पत्नी व बेटी तथा एक नौकर था। इस विस्फोट में तीनों मारे गए और खुदीराम बोस व प्रफुल्ल चाकी वहां से भाग निकले। समस्तीपुर रेलवे स्टेशन में जब पुलिस ने प्रफुल्ल चाकी को पकड़ना चाहा तो, उन्होंने खुद को खत्म कर लिया। बाद में खुदीराम बोस को भी गिरफ्तार कर लिया गया। वह सबसे कम उम्र के स्वतंत्रता सेनानी थे। मुजफ्फरपुर बम विस्फोट व अन्य बम विस्फोट के मामलों में उन पर दो महीने तक मुकदमा चला। अंततः खुदीराम बोस को मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त 1907 को उन्हें फांसी दे दी गई। फांसी के समय वहां मौजूद हर एक शख्स के लिए यह आश्चर्यजनक मंजर था कि खुदीराम बोस के चेहरे पर मुस्कान बिखरी हुई थी।

Share it
Share it
Share it
Top