मोदी की पहल से मिटेगा आम और खास का फर्क

मोदी की पहल से मिटेगा आम और खास का फर्क

लोकतंत्र में कौन आम है और कौन खास, यह किसी से छिपा नहीं है लेकिन कब, आम खास हो जाता है और कब खास आम, पता ही नहीं चलता। लोकतंत्र का पर्व आने पर ही पता चलता है कि जनता ही खास है। नेता तो उनके प्रतिनिधि भर हैं जिन्होंने अपने खास होने के तमाम इंतजाम कर रखे हैं। भले ही जनता के वोट से ही वे सांसद, विधायक और मंत्री बने हों लेकिन प्रभुता पाने के बाद वे जनता से कुछ इस तरह की दूरी बना लेते हैं, जैसे उसे पहचानते ही नहीं। चुनाव में वे जनता के पीछे दौड़ते हैं और चुनाव बाद जनता उनके पीछे दौड़ती है। अजब तमाशा है। कबीर की उलटबांसी देखनी हो तो राजनीति और उससे जुड़े लोगों का स्वभाव देख लीजिए। कंबल के बरसने और पानी के भीगने का बोध हो जाएगा।
योगी के मंत्री ने किया दिव्यांग सफाई कर्मचारी का अपमान, कहा- लूला लंगड़ा कुछ नहीं कर पाएगा..!

संस्कृत में एक नीति पद है- ‘काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः। वसंत समये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः।’ अर्थात कोयल और कौआ दोनों काले हैं। उनकी पहचान मुश्किल है लेकिन वसंत ऋतु आने पर कौए और कोयल की पहचान आसान हो जाती है। कमोवेश यही सूत्र लोकतंत्र के आम और खास पर भी लागू होता है। लोकतंत्र का पर्व चुनाव आता है तो पता चल जाता है कि जनता ही खास है। लोकतंत्र में वही संप्रभु है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट ने एक बड़ा फैसला किया है। उसने अतिविशिष्ट संस्कृति को खत्म कर दिया है। मजदूर दिवस पर देश की जनता को केंद्र सरकार की ओर से दिया जाने वाला यह विशेष उपहार कहा जा सकता है जब देश में सभी आम होंगे। कोई खास नहीं होगा। सभी मंत्रियों और अधिकारियों की कार से लाल और नीली बत्ती उतर जाएगी। लाल और नीली बत्ती का ही भौकाल होता था। सायरन से पता चलता था कि कोई खास आ रहा है। राजनीति की यही तो खासियत है कि दूर से ही उसके होने का पता चले लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीति का रंग ही फीका कर दिया है। बिना लाल बत्ती के नेताओं की और बिना नीली बत्ती के अधिकारियों की कार कैसी लगेगी? उसमें बैठे शख्स पर क्या बीतेगी, इस बारे में सोचना तक मुनासिब नहीं समझा गया है। कार में न लाल बत्ती, न सायरन। ऊपर से अपनी संपत्ति बताने का दबाव, ऐसी राजनीति का क्या फायदा? मजबूरी में ही सही, केंद्र और प्रदेश सरकारों के मंत्री अपनी-अपनी कारों से लाल बत्ती उतार रहे हैं। अपने हाथ से उतार रहे हैं और सोशल साइट्स पर उसकी तस्वीर भी पोस्ट भी कर रहे हैं। अंदर से दिल दुखता हो तो भी बाहर से प्रसन्न होने का दावा कर रहे हैं। उन पर क्या गुजर रही होगी जो अन्य दलों से भाजपा में आए हैं और मोदी लहर में जीकर मंत्री बन गए हैं।
यूपी सरकार ने लिया निर्णय.. आज से गाड़ियों पर नहीं जलेगी लाल और नीली बत्ती..!

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री समेत सभी मुख्यमंत्रियों ने अपनी-अपनी कारों से लालबत्ती उतार दी है। भाजपा शासित राज्यों में तो मंत्रियों के बीच अपनी कार से लाल बत्ती उतारने की होड़ मची हुई है। कांग्रेस वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक से परेशान हैं। उन्हें लग रहा है कि यह मु्द्दा तो पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने सत्ता संभालते ही उछाला था कि उनका कोई भी मंत्री अपनी कार पर लाल बत्ती नहीं लगाएगा। यह अलग बात है कि उनके मंत्री उनकी इस शालीनता और उदारता का राजनीतिक भाष्य नहीं कर पाए। अधिकांश तो अपनी सरकारी कोठी में ही नहीं गए। उनका रंग-रौगन करवा रहे हैं। नए सिरे से कोठियों की मरम्मत करा रहे हैं। एक ओर कैप्टन अमरिंदर सिंह राज्य में खजाना खाली होने की बात कर रहे हैं, वहीं उनके मंत्रियों की नफासत के मद्देनजर उनकी कोठियों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, इसे क्या कहा जाएगा? हाथी के दांत खाने और दिखाने के अलग-अलग होते हैं, यह कांग्रेस के मंत्रियों ने अपने आचरण से साबित कर दिया है। वहीं प्रधानमंत्री लगातार अव्यवस्था पर सुधार का चाबुक चला रहे हैं। इस बात की परवाह किए बगैर कि उस चाबुक से उनकी अपनी पार्टी के लोग भी आहत हो रहे हैं लेकिन सुधार के लिए अपने-पराए का भेद नहीं होता। अपनों पर तो और भी सख्ती होती है। सहृदय व्यक्ति दूसरों के प्रति उदार और अपने प्रति कुछ ज्यादा ही कठोर होता है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके अपवाद कैसे हो सकते हैं? इसे सुखद संकेत कहा जाएगा कि लालबत्ती की संस्कृति को खत्म करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुहिम को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रियों के अलावा अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी भरपूर साथ मिला है। राजनीतिक भौकाल टाइट रखने के खिलाफ मोदी के इस कदम की चतुर्दिक प्रशंसा हो रही है। योगी आदित्यनाथ ने प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी के सुर में सुर मिलाते हुए यहां तक ट्विट कर दिया कि जनता ही अति विशिष्ट है। उनका लक्ष्य अंत्योदय है। प्रण अंत्योदय है और पथ अंत्योदय है। प्रधानमंत्री ने मजदूर दिवस से लाल बत्ती कल्चर को खत्म करने की बात कही थी। यहीं योगी आदित्यनाथ गच्चा खा गए जब अन्य भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्री अपने वाहनों से लाल बत्ती उतार रहे थे, उस समय बुंदेलखंड के दौरे पर गए योगी आदित्यनाथ के काफिले में लाल बत्ती लगी कई कारें नजर आईं। इस पर विपक्ष ने चुटकी भी ली लेकिन वे शायद यह भूल गए कि अपने ट्विट में योगी आदित्यनाथ पहले ही कह चुके हैं कि मई के पहले दिन से देश में किसी भी नेता और अधिकारी की गाड़ी पर लाल और नीली बत्ती नजर नहीं आएगी। इसे गनीमत ही कहा जाएगा कि उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी अपनी कार से लालबत्ती उतरवा दी। साथ ही यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में गरीबों की सरकार है। प्रधानमंत्री की इस पहल से मानसिकता बदलेगी।
मोदी के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के पशुधन मंत्री एसपी सिंह बघेल, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने खुद अपनी गाड़ी से लालबत्ती हटाई। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने मंत्रियों को लालबत्ती हटाने के आदेश दिए हैं। यह भी आश्वस्त किया है कि राजस्थान का कोई भी मंत्री अपनी गाड़ी पर लालबत्ती नहीं लगाएगा। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी मोदी सरकार के इस निर्णय का असर दिखने लगा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पर आतंकी खतरे कम नहीं हैं। वे नक्सलियों की हिट लिस्ट में हैं लेकिन 2008 से ही वह अपनी सरकारी गाड़ी पर लालबत्ती का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल के नए निर्णय और वाहन अधिनियम में तब्दीली के बाद छत्तीसगढ़ के अन्य मंत्रियों पर भी लाल बत्ती हटाने का दबाव बनेगा, इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी उस गाड़ी में नहीं बैठते जिसमें लाल बत्ती लगी हो। इससे साफ जाहिर है कि लालबत्ती से परहेज करने का सिलसिला पहले से इस देश में चलता रहा है लेकिन इसे आगे बढ़ाने की व्यापक पहल प्रधानमंत्री ने की है, इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। हालांकि इस बात को वे पहले ही कह चुके हैं कि देश से वीआईपी कल्चर को बहुत पहले ही खत्म हो जाना चाहिए था लेकिन जब जागे तभी सबेरा।
नौकरशाह बिना किसी भय के फैसले लें..मैं हमेशा आप लोगों के साथ हूं : मोदी

कांग्रेसियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उनके मुद्दे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है। कुछ इसी तरह के आरोप समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी भाजपा पर लगाया था। भाजपा के लोक कल्याण संकल्प पत्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अखिलेश यादव ने कहा था कि भाजपा ने उनके घोषणा पत्र की नकल की है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन वाहनों का परित्याग करने और उस दिन साइकिल से अपने दफ्तर जाने की अपील की थी तब भी अखिलेश यादव ने इसका श्रेय लिया था। अखिलेश यादव के पास अब भी मौका है। वे कह सकते हैं कि वे खुद अपने मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और अधिकारियों के साथ साइकिल चला चुके हैं। यह तो वीआईपी कल्चर समाप्त करने का उत्कृष्ट नमूना है। इसकी बानगी तो मोदी जी की पहल में नजर नहीं आती। बेशक यह दृष्टांत किसी को भी लाजवाब करने वाला होगा लेकिन देखना यह होगा कि हम किस तरह की कार्य संस्कृति बनाना चाहते हैं। दिखावे की कार्य संस्कृति या यथार्थ और व्यवहार की कार्य संस्कृति। अखिलेश के साइकिल सवारों की साइकिल प्रतीकात्मक रूप से उनकी कारों पर सवार हो गई लेकिन मोदी के साथ ऐसी बात नहीं है। वह जो व्यवस्था बना रहे हैं, उसका देश में सकारात्मक संदेश जाएगा। इससे नेताओं और जनता के बीच की दूरी घटेगी, संवाद बढ़ेगा। समस्याओं के समाधान सहज होंगे। लाल बत्ती की वजह से यातायात में आम आदमी को बेवजह परेशानी नहीं झेलनी पड़ेगी।
अब सिर्फ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा अध्यक्ष की कारों पर ही लाल बत्ती लगेगी या फिर एंबुलेंस,फायरब्रिगेड और पुलिस जैसे अत्यावश्यक सेवाओं से जुड़े वाहनों पर। वैसे भी हमारे देश के नेताओं को विदेशी नेताओं की ओर देखना चाहिए। वहां मंत्री भी अपनी गाड़ी खुद चलाते हुए कार्यालय चले जाते हैं। बिल क्लिंटन सरीखे स्वनाम धन्य नेता साइकिल चलाकर अपने फार्म हाउस जाते हैं लेकिन भारत में छोटे-छोटे काम के लिए, छोटी दूरी तय करने के लिए भी टवेरा जैसे बड़े वाहनों का इस्तेमाल होता है। वैसे भी विपक्षी दलों को मोदी का यह प्रयोग तो रास आने से रहा। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की टिप्पणी तो कमोवेश ऐसा ही संकेत देती है। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री बस से अपने कार्यालय जाएं तो बात समझ भी आए। देश में इस तरह की छिद्रान्वेषी सोच रखने वालों का अभाव नहीं है। दिग्विजय सिंह को प्रधानमंत्री की इस बात पर भी कदाचित आपत्ति है कि उन्होंने हर भारतवासी को अतिविशिष्ट कह दिया है। दिग्गी राजा ने इस पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन इतना जरूर जोड़ दिया है कि प्रधानमंत्री को हर भारतीय को अतिविशिष्टों जैसी सुविधाएं देनी चाहिए। जो संभव नहीं है, उसके बारे में क्या सोचना लेकिन जो संभव है, देर से ही सही, आजादी के सत्तर साल बाद उस पर पहल शुरू हो गई है। जब आम और खास का भेद ही नहीं रहेगा तो खास सुविधाओं का सवाल ही कहां खड़ा होता है? होना यह चाहिए कि यह प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर मूर्त स्वरूप ले। अगर ऐसा होता है तो इससे बड़ी उपलब्धि दूसरी नहीं हो सकती।
-सियाराम पांडेय ‘शांत’

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