मोटापे का समाधान, योग से आसान…!

मोटापे का समाधान, योग से आसान…!

 शरीर में अनावश्यक रूप से चर्बी का बढऩा अधिकांश धनी लोगों में एक समस्या बनकर अभिशाप बनता जा रहा है। मोटापा शरीर की सुन्दरता का दुश्मन होने के साथ-साथ अनेक रोगों का जन्मदाता भी होता है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया, कमरदर्द, श्वासरोग, पित्ताशय की पथरी, पेट गैस इत्यादि रोग मोटापे के कारण वरदान स्वरूप प्राप्त हो जाते हैं। मोटापे का कारण आजकल की जीवन शैली है। सामाजिक प्रतिष्ठा का मापदंड योग्यता न होकर केवल पैसा कमाना ही रह गया है। वेद ने सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने का आदेश दिया है। बिना परिश्रम के जो अन्न खाया जाता है वह चोरी का अन्न बताया गया है।
वहीं भौतिकवादी विकृति में बिलकुल भी परिश्रम न करना सभ्यता और सामाजिक प्रतिष्ठा की निशानी माना जाता है। जिस घर में जितने नौकर चाकर प्रत्येक काम के लिए होंगे, वही उच्च घराना है।
विलासितापूर्ण जीवन और गरिष्ठ आहार ही मोटापे के मूल कारण हैं। हमारे प्राचीन राजा महाराजा घर में बहुत से नौकर चाकरों के होते हुए भी तथा विलासिता की पूर्ण सामग्री होते हुए भी अपनी जीविका के लिए परिश्रम करके व्यवस्था करते थे। महारानी सीता जी नौकर चाकर होते हुए भी घर का काम स्वयं करती थी। मोटापा उन्हीें लोगों को घेरता है जो विलासी जीवन व्यतीत करते हैं, गरिष्ठ भोजन खाते हैं और परिश्रम बिलकुल नहीं करते। आधुनिक युग की शैली ने प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा की झूठी जिन्दगी जीने को मजबूर कर दिया। यदि कोई व्यक्ति अपना काम स्वयं करे तो लोग कहते हैं कि बड़ा कंजूस आदमी है, एक पैसा भी किसी को नहीं देना चाहता। यदि कोई आदमी मिर्च मसालों से रहित सादा भोजन करता है तो भी लोग कहते हैं बड़ा कंजूस आदमी है, दो पैसे का मसाला भी नहीं लेता।
समाज की यह बनावटी धारणा ही हमारे रोगों का कारण है, इसलिए इस बनावटी जीवन को छोड़कर प्रकृति के अनुरूप हमें अपनी जीवन शैली बनाकर ही जीवन का सच्चा आनन्द प्राप्त हो सकता है। ऋषि महर्षियों जैसा सादा जीवन उच्च विचार को अपनाना पड़ेगा। योग के अनुरूप अपना जीवन ढालकर ही हम सुखी रह सकते हैं क्योंकि योगेश्वर श्री कृष्ण कहते हैं:-
‘पिकनिक नहीं जाऊंगा पापा’

युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नबाधिस्य योगो भवति दुखहा।।
अर्थात उपयुक्त आहार, विहार, कर्म, करने युक्त समय से जागरण निद्रा इत्यादि के द्वारा ही योगी जन समस्त दुखों का नाश कर देते हैं। इसलिए योग हर बीमारी की रामबाण दवा है। मोटापे का उपचार तो उससे बड़ी आसानी से हो जाता है। बस अपनी जीभ को वश में करेक योग साधना का कुछ समय अभ्यास करें। कुछ पालनीय नियम ये हैं।
– हो सके तो दो दिन का अथवा सप्ताह में एक बार नींबू पानी और शहद के साथ उपवास रखें।
– नमक की मात्र कम करें।
– भोजन से एक घण्टा पूर्व एक या दो गिलास गुनगुना पानी पियें और भोजन के तुरंत बाद पानी न पियें। चोकर युक्त आटे की रोटियां व हरी सब्जी का इस्तेमाल करें। वसायुक्त गरिष्ठ भोजन का परित्याग करें। इन बातों के साथ-साथ त्रिकोणासन, पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, सर्पासन, वज्रासन, नाभ्यासन, सूर्यनमस्कार प्राणायाम में कपालभाति, तथा हठयोग की नौली, गजकरनी इत्यादि लाभकारी होते हैं।
पवन मुक्तासन:- कमर के बल लेटकर दोनों घुटने मोड़कर हाथों से दोनों पैरों को दबाते हुए छाती पर दबाव बनाने से पवन मुक्तासन बनता है।
सर्वांगासन:- कमर के बल लेटकर दोनों पैरों को 90 डिग्री पर उठाते हुए हाथों से नितम्बों को साधकर कंधों पर पूरा वजन संतुलित करें। दृष्टि पैरों के अंगूठों पर रखें।
सर्पासन:- पेट के बल लेटकर श्वांस को अन्दर भरते हुए छाती को ऊपर उठायें जैसे सांप फन उठाकर केवल पीछे का भाग जमीन पर रखता है।
वज्रासन:- इस आसन को भोजन के तुरन्त बाद भी पांच मिनट करने से आंतों को शक्ति मिलती है। भोजन शीघ्र पच जाता है। पंजों को उल्टा करके एड़ी पर नितम्बों का भार रखते हुए उकडं बैठें। हाथों को घुटनों पर रखें। अंगुलियों द्वारा कोई भी मुद्रा लगाकर इस आसन पर ध्यान का अभ्यास भी किया जा सकता है।
नाभ्यासन:- पेट के बल लेटकर दोनों हाथों को सामने की ओर खींचकर रखें तथा पैरों को पीछे उठाकर जमीन पर केवल नाभि वाला भाग टिका रहना चाहिए।
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कुक्टासन:- पदमासन की अवस्था में दोनों हाथों को दोनों जांघों और पिंडलियों के बीच से निकाल कर हाथों के पंजों पर सारा वजन साध लेने पर आंतों पर दबाव पड़ता है जिससे वे सक्रिय हो जाती हैं।
कपालभाति प्राणायाम:- सिद्धासन, पदमासन, वज्रासन या सुखासन में बैठकर लोहार की धौंकनी की तरह तेजी से श्वास बाहर निकालना और लेना। पेट को बाहर कमर तक मिलाना चाहिए जब श्वास बाहर छोडं। इस प्रकार अनावश्यक चर्बी पिघल-पिघल कर शरीर से बाहर हो जायेगी। इन क्रियाओं के साथ-साथ होम्योपैथी, आयुर्वेद किसी भी पद्धति का उपचार भी किया जा सकता है। इससे मेद वृद्धि शीघ्र दूर होकर शरीर कान्तियुक्त और स्वस्थ बनेगा।
गजकरनी:- शौचादि से निवृत्त होकर भर पेट पानी पिएं ताकि पानी से अरूचि होकर जी मिचलाने लगे। फिर सीधे खड़े होकर घुटनों पर हाथ रखकर सिर झुकाते हुए दोनों हाथों से आंतों पर हल्का दबाव देने से वमन होने लगेगा। इस प्रकार जब तक श्वेत पानी अन्दर से न निकलने लगे, तब तक बार-बार पानी पीकर यह क्रिया करें।
इससे वात पित्त, कफ अनावश्यक रूप से जमा हुआ बाहर निकल जायेगा। शरीर के विजातीय द्रव्य नष्ट होकर चेहरा कान्ति युक्त यौवन से भरपूर बनेगा और मोटापे के अभिशाप से मुक्ति मिलेगी।
– रणवीर सिंह आर्य

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