मैक्रों के सिर पर ताज, चुनौतियां कम नहीं

मैक्रों के सिर पर ताज, चुनौतियां कम नहीं

यूरोपीय समुदाय के एकीकरण के प्रबल समर्थक इमैनुएल मैक्रों इस सदी के बहुचर्चित चुनावी संग्राम में महानायक बन कर उभरे हैं। पांचवें फ्रांस गणराज्य के 59 वर्षों के इतिहास में सब से युवा 39 वर्षीय इमैनुएल मैक्रों की धमाकेदार जीत से आह्लादित यूरोपीय संघ के 27 देशों में रविवार की देर रात तक जश्न का माहौल रहा। इस जीत से यूरोपीय समुदाय के अगुआ और एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की नायक पश्चिम जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने राहत की सांस ली है और कहा है कि मैक्रों की इस जीत से यूरोपीय समुदाय की एकजुटता और मजबूत होगी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिïषद में स्थाई सदस्य तथा नाटो के एक अग्रणी सदस्य की भूमिका का निर्वाह करने वाले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ आने वाले समय में कैसे संबंध होंगे, यह एक बड़ा सवाल है। वैसे, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मैक्रों की जीत के तुरंत बाद ट्वीट कर उन्हें बधाई दी और साथ मिलकर काम करने की इच्छा जाहिर की है।  
डोनाल्ड ट्रंप की तरह राजनीति में नवोदित मध्य मार्गी और इन्वेस्टमेंट बैंकर इमैनुएल मैक्रों की जीत की खास बात यह रही कि उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर तीखे प्रहार करने की बजाए देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किए जाने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी, तो देश में खुशहाली होगी और यह खुशहाली यूरोपीय समुदाय को तोड़ऩे अथवा वैश्वीकरण के खिलाफ आवाज बुलंद करने से नहीं आएगी। इसके लिïए उन्होंने एक ओर जहां बेरोजगारी को वैश्वीकरण और उदारीकरण का मुद्दा उठाते हुए स्कूल कालेज से बाहर निकलने वाले 18 से 24 वर्ष की उम्र के लाखों युवकों का साथ लिया, वहीं देश के छोटे-बड़े कल कारखानों में श्रम समस्याओं को मिल बैठ कर दूर किए जाने की वकालत कर कामगारों को अपना मुरीद बना लिया। यही नहीं, देश में पिछले दो सालों में हुए इस्लामिक हमलों पर भी उन्होंने अपनी बेबाक राय जाहिर करते हुए कहा था कि मस्जिदें ध्वस्त कर और प्रवासी मुस्लिमों को देश से जबरन बाहर करना गृह युद्ध को निमंत्रण देना है, जो देश का कोई भी सहिष्णु समुदाय नहीं चाहेगा। इस अपील का फ्रांस के कंजर्वेटिव ईसाई समुदाय पर बड़ा असर पड़ा। फ्रांस में 50 लाख प्रवासी मुस्लिम हैं, जो दशकों पहले आए थे।
लखनऊ: रियल स्टेट कारोबारी के घर 19.5 लाख की डकैती, परिवार के मुंह पर टेप लगाकर बदमाश फरार
अंग्रेजी और फ्रैंच भाषा में निपुण मैक्रों की बातों का फ्रांस के जनमानस पर इतना गहरा असर पड़ा कि स्थापित राजनैतिक पार्टियों के कंजर्वेटिव, समाजवादी और वामपंथी नेता पहले चरण में ही ढेर हो गए। निवर्तमान राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांदे सरकार में आर्थिक मामलों के दो साल तक मंत्री रहने के बाद इमैनुएल मैक्रों ने पद से त्यागपत्र देकर पिïछले साल ’एन मार्श’ अर्थात आगे बढ़ो नाम से एक नई पार्टी का गठन कर चुनावी महासमर में उतरने का फैसला लिया था। उस समय राष्ट्रपति , देश के स्थापित दलों और मीडिया ने गौर नहीं किया। लेकिन उनकी योजना बड़ी थी और उन्होंने उसे मूर्त रूप भी दे दिया।रविवार देर सायं जीत के बाद उन्होंने फांसीसी जनता का आभार व्यक्त करते हुए अपने चुनावी वादों पर खरा उतरने के साथ-साथ सीधे मुकाबले में परास्त प्रतिद्वंद्वी मैरी ली पेन का आभार व्यक्त करना नहीं भूले। राष्ट्र्पति डोनाल्ड ट्रंप की तरह पहली बार एक बड़ा चुनाव जीतने वाले युवा मैक्रों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब जबकि वह राष्ट्र्पति निर्वाचित हो चुके हैं। उनका यह दायित्व है कि वह अपने समर्थकों की बात पर गौर करने के साथ साथ अपनी प्रतिद्वंद्वी मैरी ली पेन के विचारों को सुनें।फ्रांस मूलत: एक कंजरवेटिव ईसाई बहुल उन्मुक्त समाज है। इस चुनाव में महिलाओं ने मैक्रों का बढ़ चढ़ कर साथ दिया। महिलाओं ने मैक्रों की उम्र से 24 साल बड़ी 64 वर्षीय पत्नी ब्रिगेटे और उनके तीन बच्चे तथा सात पोते-पोतियों को अपनाने तथा उन्हें साथ ले कर चलने को भी एक अच्छा संकेत बताया। हालांकि फ्रैंच समाज में नारी को अमेरिका और भारत की तरह वह गरिमापूर्ण स्थान नहीं मिला है,पर तिरस्कार की भी कभी स्वीकृति नहीं दी गई है।
दिल्ली मेट्रो का सफर बुधवार से होगा महंगा..डीएमआरसी बोर्ड ने दी मंजूरी ..अधिकतम किराया 30 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये हो जाएगा !

फ्रांस के संविधान में प्रथम महिला को अमेरिका की तरह वैधानिक दर्जा नहीं दिया गया है, इसलिए आधुनिक गणराज्य में फ्रांस के बुजुर्ग राष्ट्र्पतियों ने भी अपने से आधी उम्र की महिलाओं को अपनी पत्नी बनाने से गुरेज नहीं किया। फ्रांस के उन्मुक्त समाज को भी इससे कभी सरोकार नहीं रहा है। एक लंबे अर्से के बाद यह पहला मौका आया है जब मैक्रों की पत्नी उनसे 24 साल बड़ी हैं। मुमकिन है कि वह विधान के मुताबिक भले ही प्रथम महिला का गौरव ना पाएं, लेकिन मंत्रिमंडल में तो दायित्व निभा ही सकती हैं। मैक्रों के सामने इस समय एक बड़ी चुनौती 577 सदस्यीय संसद में बहुमत हासिल कर अपने चुनावी एजेंडे को मूर्त रूप देना है। यह तभी संभव है, जब वह एन मार्श के झंडे के नीचे अपने प्रबल समर्थकों को चुनाव जिताने में सफल होंगे। ऐसा नहीं हो पाता है तो निश्चित तौर पर प्रतिद्वंद्वी दल एक जुट हो कर उन पर हावी हो सकते हैं।

Share it
Share it
Share it
Top