मुस्लिम पति-पत्नी विवाद में ‘वो’ क्यों?

मुस्लिम पति-पत्नी विवाद में ‘वो’ क्यों?

अक्टूबर 2016 में केंद्र सरकार ने `समान नागरिक संहिता’ लागू करने के लिए लोगों से राय मांगी। विधि आयोग की वेबसाइट पर जारी प्रश्नावली ने बड़ी बहस को जन्म दे दिया। 45 दिन में लोगों से सलाह मांगी गई थी। यह सबकुछ इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार `एक देश एक कानून’ बनाना चाहती है। सरकार की सोच है कि हिन्दुस्तान एक है तो कानून भी सबके लिए एक हो। प्रश्नावली में तीन तलाक को खत्म करने पर भी विचार मांगे गए थे। अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि तीन तलाक असंवैधानिक है, पर्सनल लॉ बोर्ड के नियम संविधान के ऊपर नहीं हो सकते। इसके बाद फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई। बहस महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि समान क़ानून के अभाव में महिलाओं के बीच सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा बढ़ती जा रही है। पहले की सरकारें भी इस तरह का क़ानून बनाने की हिमायत तो करती रही हैं, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों की वजह से ऐसा नहीं हो पाया। वर्तमान में देश हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ (सामाजिक नियमों एवं परंपराओं) के अधीन करते हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है, जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। समान नागरिक संहिता का अर्थ एक पंथनिरपेक्ष (सेक्युलर) कानून होता है, जो सभी धर्म के लोगों के लिये समान रूप से लागू होता है।
ब्लैकमनी का बादशाह: अरबपति भजियावाला के खिलाफ छापेमारी जारी, मिली 400 करोड़ की संपत्ति
दूसरे शब्दों में, अलग-अलग धर्मों के लिये अलग-अलग सिविल कानून न होना ही समान नागरिक संहिता की मूल भावना है। समान नागरिक कानून से अभिप्राय कानूनों के उस समूह से है, जो देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी भी धर्म या क्षेत्र से संबंधित हों) पर लागू होता है। यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। यह हर आम नागरिक को संविधान के मुताबिक एक जैसा हक देता है। प्रश्नावली में विवाह, तलाक़, गोद लेना, गुज़ारा भत्ता, उत्तराधिकार और विरासत से जुड़े सवाल हैं। विधि आयोग ने इस बारे में भी राय मांगी है कि क्या ऐसी संहिता बनाई जाए, जिससे समान अधिकार तो मिले ही साथ ही, देश की विविधता भी बनी रहे। पूछा गया कि क्या समान नागरिक संहिता वैकल्पिक होनी चाहिए। इस पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समान अधिकार संहिता के विरोध में उतर गया। बोर्ड कह रहा है- देश में कई संस्कृतियां हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए, हम देश में संविधान के हिसाब से रह रहे हैं, जो हमें अपने मज़हब को मानने की आज़ादी देता है। तीन तलाक संबंधी फैसले के विरोध में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया, जिसमें महिलाओं से अपनी संस्कृति बचाए रखने की अपील के साथ हस्ताक्षर करवाए जो रहे हैं। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद भी कह चुके हैं कि संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता का आदेश देता है। देशभर के कई महिला मुस्लिम संगठन भी पर्सनल लॉ बोर्ड के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। महिलाओं का सवाल है कि क्या इस लॉ के अंतर्गत शादीशुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार तलाक कहकर विवाह संबंध तोड़ लेता है।
बीसीसीआई को उच्चतम न्यायालय से एक बार फिर झटका.. संशोधन याचिका भी खारिज
पति या पत्नी को अपनी गलती का अहसास हो जाने पर वह पुन: अपनी जिंदगी साथ गुजारना चाहें तो इस स्थिति में पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ निकाह करके उसके साथ हमबिस्तर होना पड़ता है और पुन: तलाक लेकर पूर्व पति के साथ निकाह करना पड़ता है, जबकि तलाक लेने के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है। 19 अक्टूबर 2016 को “क्या है हलाला? जानें- कैसे मुल्लाओं ने की है इस अच्छे नियम से शरारत” शीर्षक से एक न्यूज के वरिष्ठ प्रोड्यूसर ने तीन तलाक की काफी आलोचना की है। इस आधुनिक युग में ऐसी परंपराओं को कैसे जायज ठहराया जा सकता है। मर्द की गलती की सजा औरत क्यों भुगते अथवा पति अपनी गलती के प्रायश्चित करने के बाद भी सारा जीवन क्यों शर्मिदा हो? फिर उस पति से तलाक लेकर अपने पुराने पति से निकाह कर सकती है। तलाक के बाद पति से किसी तरह के गुजारे-भत्ते या संपत्ति पर अधिकार नहीं दिया गया है, हां मेहर अदायगी का नियम जरूर है। भारत में हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाया गया। देश में इसके विरोध के बाद इस बिल को चार हिस्सों में बांट दिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे हिन्दू मैरिज एक्ट, हिन्दू सक्सेशन एक्ट, हिन्दू एडॉप्शन एंड मैंटेनेंस एक्ट और हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में बांट दिया था। इस कानून ने हिन्दू महिलाओं को सीधे तौर पर सशक्त बनाया है। इसके तहत महिलाओं को पैतृक और पति की संपत्ति में अधिकार मिलता है। इसके अलावा अलग-अलग जातियों के लोगों को एक-दूसरे से शादी करने का अधिकार है, लेकिन कोई व्यक्ति एक शादी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता है। अब जब ऐसे मामले कोर्ट में पहुंचते हैं तो अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इन सभी परेशानी से निजात मिलेगी। अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे। पाकिस्तान, बांग्लादेश के अलावा मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे २२ देशों में पर्सनल लॉ बोर्ड के नियम मान्य नहीं हैं। जब हम तीन तलाक पीड़ितों का दर्द सुनते हैं तो ये सवाल भी उठता है कि तीन तलाक आखिर क्या है, धर्म या अधर्म? भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की जाकिया सोमन ने पिछले साल प्रधानमंत्री को तीन तलाक सहित कई मुद्दों पर पत्र लिखा था। 6 मुस्लिम महिलाओं ने भी अर्जी दाखिल कर कोर्ट की मदद मांगी थी। पीएमओ से जवाब नहीं आया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दवे और जस्टिस गोयल की बेंच ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेकर सरकार से जवाब मांग लिया।
मुंबई: अंधेरी से डेढ़ करोड़ के नोट जब्त, तीन गिरफ्तार
सरकार ने 7 अक्टूबर को कोर्ट में दिए हलफनामे में कहा था कि संविधान में तीन तलाक की कोई जगह नहीं है। 2 सितंबर को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोर्ट में दलील दी कि पत्नी से छुटकारा पाने के लिए पति उसका कत्ल कर दे, इससे बेहतर है कि उसे 3 बार तलाक बोलने दिया जाए। पत्नी के रहते दूसरी शादी की इजाजत से मर्द अवैध संबंध नहीं बनाता या रखैल नहीं रखता। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ीं एनी राजा और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एवं रंगकर्मी डॉ. नूर जहीर ने एक प्रेस कांफ्रेंस में `तीन तलाक’ की भुक्त भोगियों से मीडिया से रूबरू कराया। गुजरात के अहमदाबाद की पीएचडी छात्रा मुबीना कुरैशी और लखनऊ की मुमता, फातिमा ने अपनी आप बीती भी सुनाई कि किस तरह उन्हें तीन तलाक की कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। मध्य प्रदेश के देवास जिले के दतोत्तर गांव की रहने वाली मुस्लिम महिला शबाना शाह ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जज टीएस ठाकुर को अपने खून से खत लिखा कि तीन तलाक ने उसकी और 4 साल की बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी, इसलिए तीन तलाक को रद्द किया जाए। देशभर में ऐसी कई मुस्लिम महिलाएं सामने आ चुकी हैं जिन्होंने तीन तलाक का खुलकर विरोध किया है। एनी राजा कहते हैं कि उनका संगठन `तीन तलाक’ को प्रतिबंधित करने के पक्ष में है।  भारत के मुसलमानों में पति फोन, एसएमएस संदेश यहां तक कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइटों तक पर पत्नियों को तलाक दे रहे हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने एक अध्ययन के हवाले से बताया है कि भारत की 92.1 फीसदी मुसलमान महिलाएं तीन तलाक पर प्रतिबंध लगवाना चाहती हैं।  अब जबकि सरकार आगे आ चुकी है तो विभिन्न छोटे फायदों के बजाय दूरगामी विकास में यकीन करना शुरू कर दें, इससे सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन सुधरेगा और समाज भी विकसित होगा। मुस्लिम समाज को स्वयं आगे आकर पहल करना चाहिए। अन्यथा समय की गति से आगे नहीं बढ़ने पर मुस्लिम समाज अन्य समाजों की तुलना में बहुत पीछे छूट जाएगा।-दीपक राय

Share it
Top