मुर्गे का बंटवारा

मुर्गे का बंटवारा

नालंदा में किसी समय रामू नाम का लकड़हारा रहता था। वह नित्य प्रति जंगल जाकर लकड़ी काटकर लाता था तथा शहर में जाकर बेच देता था। लकड़ी बेचने से उसे जो मुद्रा प्राप्त होती थी, उसी से अपने परिवार का पालन पोषण करता था। एक दिन रामू जंगल में लकड़ी काटने जा रहा था कि उसे मार्ग में एक सुन्दर मुर्गा मिला। रामू ने मुर्गे को पकड़ लिया।
रामू ने सोचा कि यदि मैं मुर्गे को राजा को भेंट स्वरूप दे दूं तो राजा मुझे काफी इनाम दे देंगे तथा मैं लकड़ी काटने तथा बेचने का धंधा छोड़ दूंगा तथा अपने परिवार का पालन पोषण अच्छी तरह से कर सकूंगा। रामू मुर्गा लेकर राजा के दरबार में जा पहुंचा तथा राजा से कहा, ‘स्वामी, मैं आपको यह सुन्दर मुर्गा भेंट करना चाहता हूं, आपसे प्रार्थना है कि आप मेरी छोटी सी भेंट स्वीकार करें।’
राजा ऐसी छोटी सी भेंट स्वीकार करने के बाद बहुत हँसा। राजा ने रामू से कहा, ‘रामू, तुमने मुझे मुर्गा तो एक भेंट किया है और मेरे परिवार में खाने वाले छ: प्राणी हैं-हम, हमारी महारानी, दो राजकुमार तथा दो राजकुमारी। हम इस मुर्गे का बंटवारा कैसे करें।’
रामू राजा के व्यंग्य बाण को नहीं समझ सका। रामू ने कहा, ‘महाराज, यह तो बहुत आसान काम है। मैं अभी मुर्गे का बंटवारा किये देता हूं।’
राजा ने कहा, ‘अच्छा तुम हम सबके लिये मुर्गे का बंटवारा आसानी से कर दोगे।’
‘जी हां, स्वामी’ रामू ने सहज भाव से कहा। रामू ने विलम्ब किये बिना चाकू से मुर्गे के भाग जु़दा-जुदा कर दिये और राजा से कहा, ‘स्वामी, मुर्गे का सिर आपके लिये है, मुर्गे की पीठ रानी के लिये, मुर्गे की दोनों टागें दोनों राजकुमारों के लिये तथा दोनों पंख दोनों राजकुमारियों के लिये हैं।’
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राजा ने रामू से पूछा,’ यह बताओ तुमने मुर्गे का बंटवारा किस प्रकार किया है।’
लकड़हारे रामू ने उत्तर दिया, ‘स्वामी आप सिरमौर हैं, इसलिये सिर आपको दिया है। मुर्गे की पीठ महारानी के लिये है क्योंकि परिवार का भार उन्हीं की पीठ पर है। राजकुमारों के लिये दोनों टांगे है क्योंकि आपके परिवार का भविष्य राजकुमारों की टांगों पर निर्भर रहेगा। मुर्गे के दोनों पंख राजकुमारियों के लिये हैं क्योंकि उन्हें आपके घर से उडऩा है तथा अपनी ससुराल जाना है।’
राजा रामू के विवेक तथा तर्कपूर्ण उत्तर सुनकर अति प्रसन्न हुआ तथा रामू को मुर्गे की छोटी सी भेंट के बदले में बहुत से सोने के सिक्के देकर इज्जत के साथ विदा किया और लकड़हारे रामू के दिन फिर गये।
– तारा देवी ‘कुमार’

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