मामूली न समझें दस्त को

मामूली न समझें दस्त को

loose motionभारत में हर साल 35 लाख से अधिक बच्चे दस्त रोग के शिकार हो जाते हैं। कुपोषण के अलावा इसका एक खास कारण यह भी है कि बच्चों के माता-पिता बीमारियों और उनसे बचने के उपायों को या तो बिल्कुल ही नहीं जानते या फिर जानकर भी उस ओर से लापरवाह बने रहते हैं। अगर माता, पिता या अभिभावकों को दस्त, हैजा, आंत्रशोथ जैसी आम किंतु गंभीर बीमारियों के बारे में जानकारी दे दी जाय तो अधिकतर बच्चों को कुपोषण और मौत का शिकार होने से बचाया जा सकता है।
बच्चों में होने वाली दस्त की बीमारी एक गंभीर और खतरनाक बीमारी है जिसका मुख्य संबंध खान-पान और पाचनशक्ति से होता है। इसके अतिरिक्त घर के आस-पास के वातावरण का साफ-सुथरा न होना भी इस बीमारी के लिए खासतौर से जिम्मेदार माना जाता है। ऐसी बात नहीं है कि दस्त की बीमारी केवल बच्चों में ही होती है। बड़े भी इसका शिकार बनते हैं लेकिन अधिकतर छोटी उम्र के बच्चों को ही यह बीमारी हुआ करती है।
बच्चे के जन्म लेने से पांच साल की उम्र के बीच 10 से 15 बार दस्त रोग होता है। इसमें भी उम्र के पहले साल में तीन से पांच बार तक इस रोग के होने की संभावना रहती है। वयस्कों के मुकाबले बच्चों के लिए यह अधिक घातक होता है क्योंकि इस रोग से बच्चे के शरीर से भी उतना ही पानी निकल जाता है जितना कि एक वयस्क के शरीर से निकलता है। आमतौर पर इस रोग में 70 कि. ग्रा. वजन वाले व्यक्ति के शरीर से एक लिटर पानी निकल जाता है। यह जानकर आश्चर्य होगा कि सात कि. ग्रा. वजन वाले बच्चे के शरीर से भी इस बीमारी में एक लिटर पानी ही निकलता है।
सत्तर किलोग्राम वजन वाला वयस्क व्यक्ति अपनी शारीरिक क्षमता और विकसित शरीर के कारण प्राय: एक लिटर पानी के निकल जाने को सहन कर जाता है किंतु सात कि. ग्रा. वजन का बच्चा पानी की इस कमी को किसी भी हालत में नहीं झेल पाता। दस्त के रोगी के शरीर में पानी निकलने पर ‘निर्जलीकरण’ की प्रक्रि या तेज होती है और शरीर इस झटके को झेल नहीं पाता।
दस्त रोग में शरीर से पानी तो निकल ही जाता है, साथ ही यह एक संक्रांमक बीमारी भी होती है। यह एक से दूसरे में तेजी के साथ फैलता है, इसलिए इस बीमारी के शिकार छोटे बच्चे ही अधिक हुआ करते हैं। यह रोग विशेष प्रकार के कीटाणुओं द्वारा फैलता है। अगर इस रोग के प्रारंभिक लक्षणों, सावधानियों एवं रोकने के उपायों को जान लिया जाय तो इस रोग पर आसानी से काबू पाया जा सकता है और बच्चे को असमय काल-कवलित होने से बचाया जा सकता है।
अगर किसी बच्चे को दिन में तीन या इससे अधिक बार एक सफेद पानी जैसा दस्त होने लगे तो सचेत हो जाना चाहिए। छोटे बच्चों में दस्त दांत निकलते समय भी हुआ करते हैं किंतु दोनों दस्तों के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।
दस्त होने पर सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि रोगी ने कितनी बार, कितनी मात्र में और कितने-कितने समय पर शौच किया है। दस्त में खून का अंश या आंव (श्लेष्मा) तो नहीं जा रहा है। अगर दस्त चावल के मांड जैसा सफेद और पतला आये तो समझना चाहिए कि यह दस्त संक्र ामक दस्त ही है। इसके साथ ही रोगी को कभी-कभी उल्टी भी होने लगती है। पेट में दर्द होना भी प्रारंभ हो जाता है।
दस्त के रोगी को कमजोरी आ जाती है और प्यास काफी लगती है। जीभ सूख जाती है। इसके अतिरिक्त रोगी की चमड़ी ढीली पडऩे लगती है। कई बार पसीना भी आने लगता है। रोग की प्रबलता में उंगलियों में भी टेढ़ापन आने लगता है। ऐसी हालत में शरीर का तापक्र म भी कम होने लगता है तथा नब्ज कमजोर पडऩे लगती है। पेशाब या तो बिल्कुल नहीं आता या अगर आता भी है तो बूंद-बूंद करके। कभी-कभी बच्चा बेहोश भी हो जाता है।
हो सकता है कि उपरोक्त सभी लक्षण रोगी में तत्काल दिखाई न पड़े। अगर इनमें से कुछ भी लक्षण मिलें तो यह समझना चाहिए कि रोगी दस्त के संक्र मण से संक्र मित हो चुका है। इस स्थिति में रोगी को अतिशीघ्र डॉक्टर से दिखाना चाहिए ताकि सही समय पर उपचार शुरू हो जाये।
डॉक्टर के पास ले जाने से पहले रोगी का प्राथमिक उपचार शुरू कर देना हितकर होता है। दस्त रोग में शरीर में पानी की कमी को दूर करने के लिए पुनर्जलीकरण घोल देते रहना लाभदायक होता है। इसे ओ. आर. एस. घोल भी कहा जाता है। ओ. आर. एस. घोल ग्लूकोज, नमक, चीनी तथा खाने के सोडे को मिलाकर बनाया जाता है। ओ. आर. एस का पैकेट नजदीक के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र से लाया जा सकता है।
ओ. आर. एस. घोल बच्चों के लिए अलग तथा वयस्कों के लिए अलग होते हैं। एक से पांच साल तक के बच्चे को हर पांच से दस मिनटों के भीतर दो से चार चम्मच तक घोल पिलाना चाहिए। इससे बड़े बच्चे को और वयस्कों को एक कप या एक गिलास तक की मात्रा में इस घोल को देना चाहिए। ओ. आर. एस. घोल के अभाव में एक चुटकी नमक, एक चम्मच चीनी तथा दस चाय चम्मच पानी को मिलाकर पांच-पांच मिनट के अन्तराल पर देते रहना चाहिए।
दस्त के रोगी को भूखा बिल्कुल नहीं रखना चाहिए। रोगी को अधिक से अधिक तरल पदार्थों को देते रहना चाहिए। अगर छोटा बच्चा दस्त रोग का शिकार है तो मां को उसे स्तनपान कराते रहना चाहिए। रोगी जितना पानी इच्छानुसार पी सकता हो, उसे देते रहना चाहिए। डॉक्टरी सलाह के बिना किसी भी दवा का इस्तेमाल करना खतरनाक भी हो सकता है, अतएव रोगी को अतिशीघ्र चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। संक्र ामक बीमारियां मुख्य रूप से गंदगी के कारणों से ही पनपती हैं। अत: घर के आस-पास की गंदगियों को साफ करते रहना चाहिए। भोजन को हमेशा ढ़ककर रखना चाहिए तथा परोसते समय या भोजन करते समय हाथों को अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।
आनंद कुमार अनंत

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