मानसून से पूर्व हम कितने चौकस

मानसून से पूर्व हम कितने चौकस

rainविगत 2 वर्ष से पूरा राष्ट्र्र स्वच्छता मुहिम का साक्षी है। करोड़ों रूपये विज्ञापनों में फूंके जा चुके हैं और संभवतया अगले तीन वर्षो में उतने ही करोड़ और फूंके जाएंगे। यह सुनिश्चित नहीं है कि देश सचमुच स्वच्छ एवं सुंदर हो जाएगा। कभी कभी सोच कर शर्म महसूस होती है। पी.एम को ऐसी अपील की जरूरत ही नहीं थी। यह तो सजग नागरिकों का नैतिक कर्तव्य है कि वे अपने घर, दफ्तर, कार्यालय, मोहल्ला, शहर एवं राष्ट्र्र को स्वच्छ एवं सुंदर बनाने की नैतिक जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाएं।
पहाड़ों पर भी लोगों ने अवैध बस्तियां बना ली है। बारिश के मौसम में मूसलाधार बारिश नहीं हुई कि नदी, नाले किनारे की बस्तियां जलमग्न हो जाती हैं। कई शहरों में जहां नदी नहीं है और जनता इस भ्रम में थी कि यहां बाढ़ का दूर दूर तक कोई खतरा नहीं है, अचानक होने वाली बारिश में बाढ़ का शिकार हुई।
मानसून से पूर्व शहरों में नालों और नालियों की साफ सफाई हो जानी चाहिए। अवैध रेत उत्खन्न पर अंकुश लगाने हेतु प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि प्राकृतिक आपदाओं को अधिक से अधिक टाला जा सकें। महानगरों में खुले नाले कचरों से लबालब नजर आयेंगे। इनकी समयानुसार साफ सफाई होनी चाहिए किंतु सावधानी बरतना हमारे लिए शर्म की बात है। शायद इसलिए संबंधित विभाग कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं करता। कूड़े कचरे से निपटा जा सकता है। उनसे बिजली उत्पन्न कर बिजली संकट से भी बचा जा सकता है।
नगरों में ड्रेनेज सिस्टम बारिश के सीजन में प्रशासन की पोल खोल देता है। जनता हलकान होती है। जान-माल की हानि भी होती है। किंतु नगर प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता। सफाई कर्मचारी अपना रोना रो रहे हैं। उनकी हमेशा वेतन को लेकर शिकायत रहती है कि कई कई महीने वेतन नहीं मिलता। राजधानी दिल्ली खुद इस गुनाह की गवाह है। अन्य नगरों में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। शहर की घनी आबादी वाले एरिया में भी नालों की गंदगी से रहवासी त्रस्त हैं। गुहार करे तो किससे?
सड़कमार्ग से यात्रा के दौरान आप कई दृश्य देख सकते हैं। जर्जर पुलिया, सड़क किनारे नाले में पानी कम, कूड़ा कचरा ज्यादा। बारिश के दिनों में जो पानी नालियों से नालों में बहना चाहिए, वह वहां से न बह कर सड़कों को जलमग्न कर देता है। सड़कें पहले ही डूबी होती हैं। फिर खुले हुए गटर भी मौत को आमंत्रित करते हैं। तेज बारिश में कुछ ही घंटों की लगातार बारिश में ओवर फ्लो दृश्य देखने को मिल जाता है। काश! नगर प्रशासन अपनी इन लापरवाहियों से सबक लेता और समय रहते आवश्यक कदम उठाता तो बाढ़ की संभावनाओं को रोका जा सकता है।
छोटे छोटे जलाशय भी दूषित हैं। कहीं मवेशी नहाते नजर आते हैं तो कहीं रहवासी बर्तन धोते, गंदे कपड़े धोते। छोटी छोटी नदियों की ग्रीष्म काल में स्थिति दयनीय हो जाती है। यह भी कहा जा सकता है। नदी, नालों की सफाई समयानुसार हो जाए तो बाढ़ का कहर कम जरूर किया जा सकता है। बारिश के पानी का संरक्षण जरूरी है। रेन वाटर हारवेस्टिंग के प्रति अभी भी जनता की सकारात्मक सोच नहीं है। हम जिस तरह नाली नालों की सफाई की बात कर रहे हैं उसी तरह हमें इमारतों की छत की साफ सफाई को भी गंभीरता से लेना चाहिए। पानी के निकासीद्वार पूरी तरह खुले रहने चाहिए ताकि जमा हुआ पानी छत पर न जमा रहे।
सीपेज प्राब्लम से निपटना इतना आसान काम नहीं होता। बारिश के दिनों में पेड़ टूटने, आंधी-तूफान के साथ बारिश के दौरान बिजली की आपूर्ति भी खंडित हो जाती है। सार्वजनिक स्थलों पर विशेष ध्यान की जरूरत है ताकि मानसून की दस्तक के बाद किसी भी तरह की अफरा-तफरी न मचे। पेयजल समस्या से निपटने हेतु मानसून से पूर्व सभी सावधानियों पर ईमानदारी से गौर किया जाना चाहिए।

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