मानसिक तनाव से होती है शरीर में विकृति…पागलपन की स्थिति तक पहुंच सकता है !

मानसिक तनाव से होती है शरीर में विकृति…पागलपन की स्थिति तक पहुंच सकता है !

 मनुष्य सांसारिक परिवेश में आर्थिक, सामाजिक व पारिवारिक उन्नति के लक्ष्य को क्रियान्वित करने के लिये मस्तिष्क में नयी नयी कल्पनाओं के स्वरूप को तैयार करता है। यदि उचित समय पर उनका उपयोग नहीं किया जाता तो यह मानसिक तनाव का रूप धारण कर लेता है। जीवन में मानसिक विकार क्या है? संकीर्ण विचारधारा में जीवन को व्यतीत कर रहे मनुष्य पर कुछ हल्के शब्द भी उत्प्रेरक का काम करते हैं जो मानसिक तनाव में वृद्धि कर देते हैं।
जब परिवार में नित्य कलह, क्लेश, द्वेष, जलन की भावनाओं का समूह मन को विचारों के द्वन्द्व से परिपूर्ण करके मस्तिष्क को प्रभावित करता है तो जीवन में विघटन की स्थिति को उत्पन्न करता है। शुभ विचारों की आवृत्ति मानसिक तनाव को कम करके सकारात्मक सोच बनाने में सहायक होती है। आध्यात्मिक परिवेश में मनुष्य के विचारों में उत्पन्न विकार अपने स्वरूप का त्याग कर देता है।
कानों में सत्य पवित्र अमृत रूपी शब्दों की गूंज से भावनायें निर्मल एवं शुद्ध हो जाती हैं। यदि आध्यात्मिकता के कट्टरपन में मनुष्य की विचारधारा बदल गई तो वह सत्य से विमुख होकर भटक जाता है। जो मनुष्य मानसिक दबाव के चंगुल में फंस गया, वह छोटी-छोटी चीजों से तुरन्त प्रभावित होकर प्रेम और आनन्द को समाप्त कर लेता है।
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मानसिक तनाव से पीडि़त मनुष्य शरीर में धीरे-धीरे निर्बलता को स्वीकार करता जाता है। रक्तचाप में विकार उत्पन्न होते हैं जिससे पाचनतंत्र कमजोर पड़ जाता है। स्मरण शक्ति कम हो जाती है। मानसिक तनाव के मूल कारण को जाने बगैर औषधि का सेवन करने में संकोच करें।
शरीर की संरचना में मस्तिष्क को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है। यदि इसमें बुरे विचारों की भरमार हो जाये तो मस्तिष्क प्रदूषित हो जायेगा जिसका प्रभाव शरीर के अन्य भागों पर भी पड़ेगा जो प्रतिरोध के रूप में प्रकट होगा। स्त्रियों के मुकाबले में पुरूषों के अंदर मानसिक तनाव अधिक पाया जाता है।
महिलाओं के अंदर भावुकता की भावना अधिक प्रबल होती है। अपनी भावना को तुरन्त प्रकट करने की प्रवृत्ति होती है लेकिन मनुष्य के अपने हृदय में पनप रहे नकारात्मक प्रश्नों के जवाब जब तक प्राप्त नहीं होते, तब तक वैसे ही विचार दिल दिमाग में गुंजन करते रहते हैं। वह स्वयं ही जब तक उन्हें क्रियान्वित नहीं करता, मानसिक तनाव को बढ़ाता रहता है।
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आध्यात्मिक आनन्द के परिवेश से मानसिक तनाव को दूर किया जा सकता है। जब तक मनुष्य नकारात्मक सोच रखेगा एवं अल्प समय में उन्नति के मार्ग को अपनाकर आगे बढऩे की सोचेगा, जीवन सुखी नहीं रह सकेगा। नकारात्मक सोच के कारण मानसिक तनाव बढ़ता है। खान-पान से भी मनुष्य के मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है। जो लोग तनाव को दूर करने के लिये नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, वे हीन भावना एवं मानसिक तनाव को और बढ़ाते है।
नशीले पदार्थों से मुक्त होकर सकारात्मक नजरिये को अपनाकर घर परिवार में स्वच्छ वातावरण का निर्माण किया जा सकता है। मनुष्य की मन की मुराद यदि पूरी न हो तो मन की शान्ति समाप्त हो जाती है और मानसिक तनाव के कारण वह पागलपन की स्थिति तक पहुंच सकता है।
– विकास बिहानिया

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