महिलाओं की फिजूलखर्ची-परिवार की परेशानी

महिलाओं की फिजूलखर्ची-परिवार की परेशानी

Shopping_004020परिवार के बजट को संतुलित रखने में सबसे अहम् भूमिका पत्नी की होती है। आम तौर पर महीने भर की जरूरत के सामान की खरीदारी महिला ही करती है। यह अलग बात है कि कई बार मासिक बजट बनाते समय पत्नी अपने पति के साथ एक बार विचार विमर्श कर लेती है।
फिजूलखर्ची की वैसे भी कोई सीमा नहीं होती। अगर आपको इसकी आदत है तो आपकी गृहस्थी की नैय्या आर्थिक बोझ से न केवल डगमगाएगी बल्कि उसके डूबने का भी खतरा बना रहेगा।
जिन महिलाओं के पति ज्यादा व्यस्त रहते हैं, वे तो पारिवारिक खरीदारी से संबंधित बातचीत की औपचारिकता भी पूरी नहीं कर पातीं। इसके अतिरिक्त घर आए मेहमानों हेतु खरीदारी, उत्सवों हेतु खरीदारी तथा कहीं शादी विवाह के अवसर पर जाने के लिए खरीदारी का भार साधारणत: पत्नी पर आ जाता है।
कई बार खरीदारी में पत्नी के साथ पति भी सक्रि य भूमिका निभाते हैं पर निर्णायक मत पत्नी का ही होता है। ऐसे में परिवार का पूरा आर्थिक कार्यक्र म पत्नी के आसपास ही घूमता है। परिवार के लिए निर्धारित बजट के संतुलित उपयोग का अधिकांश दायित्व पत्नी के ऊपर आ टिकता है।
आर्थिक दायित्वों से घिरी पत्नी यदि स्वयं फिजूलखर्च हो जाए तो परिवार की आर्थिक अधोगति अवश्यम्भावी है। एक फिजूलखर्च महिला परिवार को बरबाद करने के लिए काफी होती है चूंकि साधाणतया घर के आर्थिक मामलों पर पत्नी का अधिकार ज्यादा होता है इसलिए इस लिहाज से पत्नियों के दायित्व बढ़ जाते हैं।
परिवार की आय की एक सीमा होती है और फिर आय के मुताबिक समाज में अपनी स्थिति को बनाए रखने की चुनौती भी। जैसे आप प्रथम श्रेणी की सेवा में हैं तो वेतन के हिसाब से बड़े बजट वाले जरूरी खर्च को आप दरकिनार नहीं कर सकते। विशेषकर मध्यमवर्गीय परिवार को इस दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ता है। आय के मुताबिक खर्च और थोड़ी बचत भी।
उत्सव विशेष पर अगर आपको कपड़े खरीदने हैं तो इसके लिए उतनी राशि ही तय की जानी चाहिए जिससे परिवारिक बजट पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। पति व बच्चों के कपड़ों के अलावा अपने लिए भी अगर साड़ी खरीदनी है तो पहले से ही एक राशि तय कर लें और उसके हिसाब से खरीदारी करें।
आम महिलाओं में एक खास कमजोरी होती है जब वे खरीदारी के लिए जाती है तो वहां विशेषकर साडिय़ों के डिजाइन पर उनके बजट का स्वरूप बनता बिगड़ता है।
एक साड़ी खरीदने गई पर वहां दो-तीन साडिय़ां पसंद आ गईं तो उन्हें भी खरीद लिया। बात यहीं तक सीमित नहीं होती। कई बार अगर जान पहचान की दुकान हो तो अंधाधुंध खरीदारी कर ली जाती है क्योंकि ऐसी दुकान में तुरन्त भुगतान की समस्या नहीं होती।
फिजूलखर्ची पर लगाम जरूरी-
कई बार जरूरत के सामान को महिलाएं ठीक ढंग से नहीं रखतीं। इस कारण एक ही सामान की बार-बार खरीदारी करनी होती है, इसलिए यह बात एकदम जरूरी है कि पैसे का सही उपयोग हो और जरूरत के हिसाब से पैसे खर्च किए जाएं। फिजूलखर्ची पर लगाम लगाकर आप पति के अलावा अपने को भी राहत दे सकती हैं।
कई बार महिलाएं दूसरे की देखादेखी बेकार ही पैसे खर्च कर डालती हैं। कभी-कभी वे अपने पड़ोस की बात-बात पर नकल करती हैं। एक पड़ोसी की आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर और जीने की शैली आपसे काफी भिन्न हो सकती है। किसी के लिए होली में नए कपड़े बनवाना जरूरी है तो कोई दुर्गा पूजा पर कपड़े की खरीदारी करेगा।
अगर आपका पड़ोसी होली में मिठाई, पकवान बनाता है तो आप भी उसे दिखाने के लिए कि आप उससे पीछे नहीं हैं, उस दिन खाने-पीने पर सैंकड़ों खर्च कर दें तो यह बुद्धिमानी नहीं है क्योंकि हर त्यौहार सबके लिए महत्त्वपूर्ण नहीं होता है। अगर आप खान-पान, कपड़े आदि के मामले में दूसरों की नकल करते हैं तो इसे फिजूलखर्ची के सिवा और कुछ नहीं कहा जाएगा।
वैसे भी दूसरों की नकल करने वाला आदमी जीवन में सुखी नहीं रह पाता। फिजूलखर्ची सिर्फ खरीदारी तक ही सीमित नहीं रहती। इसका क्षेत्र बहुत व्यापक होता है। किसी काम को करने से पहले सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए।
– ओंकार सिंह

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