महिलाएं प्रताडऩा के विरोध का साहस करें

महिलाएं प्रताडऩा के विरोध का साहस करें

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की है कि 'क्या इस देश में महिलाओं को शांति से जीने का हक नहीं है?' महिलाओं के विरूद्ध निरंतर बढ़ते अपराधों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय की यह प्रतिक्रिया एक आस बंधाती है कि शायद देश में हजारों की संख्या में लंबित, महिलाओं के विरूद्ध किए गए आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई आरंभ हो जाए। सवाल यही है कि क्या ऐसा हो पाएगा? ऐसा संभव हो चाहे न हो, पर महिलाओं को अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के विरोध में उठ खड़ा होना अत्यंत आवश्यक है।
राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कार्यस्थलों में स्त्रियों के सम्मान के खिलाफ होने वाली घटनाएं काफी तेजी से बढ़ी हैं। वर्ष 2013 में लगभग ढाई सौ शिकायतें आईं तो वर्ष 2014 में इनकी संख्या दोगुनी हो गई। इससे पूर्व ऑक्सफैम इंडिया और सोशल एंड रूरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के सर्वे 'सेक्सुअल हरैस्मेंट एट वर्कप्लेस इन इंडिया 2011-2012' के अनुसार लगभग 17 फीसद नौकरीपेशा महिलाएं कार्यस्थलों में यौन उत्पीडऩ से जूझती हैं। गौरतलब है कि 2013 में यौन उत्पीडऩ रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम बना जो ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बनाया गया है।
विकास की राह पर बढ़ते किसी भी देश के लिए उसकी आधी आबादी का प्रतिशत महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन यह तब है जब विकास के मौकों से ले कर व्यवहार तक में समानता हो। घरेलू हिंसा के संदर्भ में ही यही बात सबसे ज्यादा मायने रखती है कि इंसान होने का भाव स्त्री तक आते-आते भाप की तरह उड़ जाता है। इसके विरूद्ध लड़ाई में कानूनी सहायता, सामाजिक सहयोग आदि के अलावा जो चीज मायने रखती है वो है पीडि़ता का खुद साहस से खड़े रहना। प्रताडऩा सहते हुए बेचारी वाली भूमिका को स्वयं महिलाओं को ही तोडऩा होगा क्योंकि उनका यही साहस ही इन स्थितियों में न्याय दिला सकता है।

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घरेलू हिंसा का सांकेतिक मतलब है घर की चारदीवारी के भीतर, परिवार के सदस्यों या पति द्वारा दी जा रही प्रताडऩा, जो मानसिक या शारीरिक किसी भी रूप में स्त्री को पीड़ा या दुख देती है। इस प्रताडऩा का स्तर आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर करने से ले कर जान लेने तक का हो सकता है। किसी भी स्त्री के लिए यह एक बड़ा आघात होता है जब वह अपने ही लोगों द्वारा चोट खाती है चाहे फिर यह दहेज के लिए ससुराल वालों द्वारा दी जा रही प्रताडऩा हो, पति द्वारा किसी विशेष मांग को पूरा न करने पर दी जा रही प्रताडऩा हो या किसी भी प्रकार की स्थिति में परिवार द्वारा की जा रही हिंसा हो।
इन सबकी शुरूआत पर ही इनके विरूद्ध खड़े हो जाना महत्त्वपूर्ण है। घरेलू हिंसा के ज्यादातर मामलों में यही बात सामने आती है कि महिलाएं लंबे समय तक स्थिति के सुधरने की आशा में प्रताडऩा सहती रहती हैं और यही कदम कई बार उनकी जान का गाहक बन जाता है। इसलिए खुद में साहस बटोर कर पहली बार ही अपनी तरफ उठे हाथ को रोक देना आवश्यक है।
कहने को भले ही अब प्रोफेशनल कोर्स करने से ले कर नौकरी करने तक वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है लेकिन आत्मनिर्भर और शिक्षित महिलाओं की संख्या अब भी कम है, जिसके चलते उनमें खुद के प्रति आत्मविश्वास नहीं पनप पाता और वे यह सोच कर अन्याय सहती हैं कि वे क्या करेंगी अगर पति ने घर से निकाल दिया? इसलिए महिलाओं के शिक्षा और रोजगार के प्रतिशत में भी इजाफा होना जरूरी है।
दुखद है कि हमारा समाज अब भी महिलाओं को हर तरह से सामंजस्य करके चलने की ही सीख देता है। घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं विदेशों में भी होती हैं लेकिन वहां समाज उन्हें हर हाल में सामंजस्य करके सहते रहने को बाध्य नहीं करता। भारतीय समाज में पुरूषवादी विचारधारा में कुछ बदलाव तो आया है लेकिन बड़े पैमाने पर अब भी पुरूष के लिए तमाम छूट और महिलाओं के लिए तमाम बेडिय़ां विरासत में मिलती हैं। ऐसे में पुरूष का हिंसावादी व्यवहार समाज जायज ठहराता है और महिलाओं का विरोध उच्छृंखलता कहलाता है। इस सोच को सिरे से बदलने की जरूरत है ताकि महिलाएं अत्याचार सहने को बाध्य न हों।

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यह सबसे बड़ा सम्बल है घरेलू हिंसा के मामलों में लेकिन विडंबना यह है कि ज्यादातर महिलाओं को अपने अधिकारों और अपने लिए बने कानूनों की जानकारी ही नहीं होती जबकि यह जानकारी उनके लिए बहुत बड़ी मदद हो सकती है। कानून की भाषा में महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का शारीरिक दुव्र्यवहार या पीड़ा, अपहानि, जीवन, शारीरिक अंग या स्वास्थ्य को खतरा, लैंगिक दुव्र्यवहार या गरिमा का उल्लंघन, अपमान, तिरस्कार, अतिक्रमण करना या मौखिक और भावनात्मक दुव्र्यवहार अर्थात उपहास करना, गाली देना, आर्थिक दुव्र्यवहार यानी आर्थिक या वित्तीय संसाधनों, जिसकी वह हकदार है उससे उसे वंचित करना, ये सभी घरेलू हिंसा अधिनियम 2006 की धारा 2(छ) और 3 के अनुसार घरेलू हिंसा कहलाते हैं।
धारा 4 के अंतर्गत घरेलू हिंसा की जा चुकी हो, की जाने वाली हो या की जा रही हो, इनकी सूचना कोई भी व्यक्ति संरक्षण अधिकारी को दे सकता है। इसके लिए सूचना देने वाले पर किसी प्रकार की जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी। धारा 5 के अंतर्गत जिस भी प्रशासनिक या न्यायिक अधिकारी को हिंसा की सूचना दी गई है वह पीडि़त को उसके अधिकारों व लाभों संबंधित तथ्यों की जानकारी देगा।
धारा 16 के अंतर्गत बंद कमरे में कार्यवाही का अनुरोध माना जाएगा। अन्य कई धाराओं के अंतर्गत पीडि़त स्त्री को साझी गृहस्थी में निवास का अधिकार, पीडि़ता तथा उसकी संतान के संरक्षण तथा आर्थिक लाभ का अधिकार आदि भी उपलब्ध होगा। इसके अतिरिक्त 2006 में घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत कई धाराओं में सुविधाएं व अधिकार प्राप्त हो सकते हैं।
- नरेंद्र देवांगन

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