महामारी से कम नहीं तंबाकू….सभी समझदार हैं किंतु खबरदार नहीं

महामारी से कम नहीं तंबाकू….सभी समझदार हैं किंतु खबरदार नहीं

tamaku हमारे देश में हर वर्ष कैंसर से मरने वालों की संख्या में बड़ी तेजी से इजाफा हो रहा है, फिर भी जवां मर्दो को फर्क नहीं पड़ रहा।
जारी है फिर भी धूम्रपान का कहर। कुछ धुआं उड़ा रहे हैं तो कुछ दिन में दस बार गुटका, खर्रा खा रहे हैं। कुछ को चिलम में सुख मिल रहा है तो कुछ को दांतों की नस से दिन में अनेक बार रगड़ाने में सुकून मिल रहा है। कुछ छींकनी के शौकीन हैं तो कुछ जर्दे के। सभी समझदार हैं किंतु खबरदार नहीं। तंबाकू से तड़प तड़प कर मरने वालों की मौतों से बेखबर भी नहीं। फिर भी नशे को आमंत्रित कर रहे हैं।
दलील देते हैं कि वर्षों से लोग इसका सेवन कर रहे हैं, मर थोड़े ही गए। फिर मौत से कैसा डर। यही दुर्भाग्य है। सिगरेट, बीड़ी, सिगार, गुटका, तंबाकू खर्रा आदि में प्रयुक्त होने वाले तंबाकू में तकरीबन 4000 रासायनिक तत्व पाये जाते हैं और इनमें से 230 तो शरीर के लिए अत्यंत ही घातक हैं। ये रासायनिक तत्व कैंसर, हृदय रोगों, स्नायुतंत्र, श्वसन तंत्र से सबंधित कई जानलेवा बीमारियों के कारक हैं। धूम्रपान के कारण शरीर में 14 विभिन्न अंगों के कैंसर होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इनमें धुएं में मौजूद नुक्सानदायक रसायनों के तत्काल संपर्क में आने वाले अंगों मसलन गला, नाक, मुंह फेफड़े वगैरह तो शामिल हैं ही, किडनी व मूत्राशय जैसे सीधे संपर्क में न आने वाले अंग का भी शुमार हैं। तंबाकू का सेवन चाहे वह धूम्रपान के जरिए हो या किसी और तरीके से, सेहत के लिए बेहद हानिकारक है। हम जितने ज्यादा समय तक और जितनी मात्रा में तंबाकू को प्रयोग में लाते हैं, विभिन्न जानलेवा बीमारियों से हमारे पीडि़त होने का खतरा भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मुख कैंसर के मामले में भारत दुनियां में सबसे आगे है। दुनियां में मुख कैंसर के लगभग 20 लाख रोगी हैं जिनमें से 40 फीसदी सिर्फ भारत में हैं। देश में मुख कैंसर के डेढ़ लाख नये मामले हर साल आ रहे हैं। गौरतलब है कि जिस रफ्तार से मुख कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं, उसी रफ्तार से बीड़ी, सिगरेट, गुटका, खर्रा की बिक्री भी बढ़ रही है। स्कूली उम्र के बच्चे भी बड़े चाव से माणिकचंद, विमल, राजश्री, गोआ, पान पराग जैसे गुटका खर्रा फांक रहे हैं। कॉलेज पहुंचते पहुंचते धूम्रपान भी शुरू कर देते हैं। युवतियां भी पीछे नहीं हैं। सार्वजनिक स्थानों पर ‘धूम्रपान निषेध’ नियम लागू हो गया किंतु नियम का सख्ती से पालन नहीं हो रहा है। तंबाकू उद्योग तनिक भी प्रभावित नजर नहीं आ रहा है। यदि इसी रफ्तार से तंबाकू कहर ढाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब 40 से 50 लाख लोग प्रतिवर्ष तंबाकू की वजह से ही मृत्यु को प्राप्त होंगे। खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम 1954 के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार कोई भी राज्य सरकार स्वास्थ्य के लिए खतरनाक किसी भी खाद्य पदार्थ के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध लगा सकती है किंतु किसी भी राज्य ने राजस्व को हानि पहुंचाना उचित नहीं समझा। महाराष्ट्र सरकार ने कभी जरूर प्रतिबंध का निर्णय लिया था, 50 करोड़ सालाना क्षति भी की थी किंतु बड़ी जल्दी ही सरकार को प्रतिबंध हटाने की घोषणा भी करनी पड़ी।स्वास्थ्य मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार तंबाकू से कैंसर, दिल और फेफड़े से संबंधित रोग बढ़ रहे हैं और इन बीमारियों की रोकथाम हेतु 30 हजार करोड़ रूपया सालाना व्यय करना पड़ रहा है। गौरतलब यह भी है कि तंबाकू की लत वाले लोगों पर किये गए अध्ययन से दो बातें उभर कर सामने आयी। तंबाकू का सेवन मानसिक एवं शारीरिक होता है। मानसिक इस प्रकार कि हर समय मुंह में कुछ डाले रखने और चबाने की आदत बन जाती है जो धीरे-धीरे एक मानसिक क्रि या बन जाती है। दूसरे, निकोटिन के लगातार सेवन से शरीर को निरंतर इसकी जरूरत महसूस होने लगती है, अत: तंबाकू को छोडऩे के लिए मानसिक और शारीरिक जरूरतों को पूरा करना होगा। व्यसनी व्यक्ति को स्वयं पहल करनी होगी। स्वेच्छा से शुरू किये गये शौक को स्वेच्छा से ही समाप्त किया जा सकता है। बीड़ी, सिगरेट, गुटका, खर्रा के विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए। कुछ स्टार्स सामने भी आए और उन्होंने जनता से अपील भी की किंतु फिल्मों और टी.वी कार्यक्र मों में वे स्वयं धूम्रपान करते नजर आए। मुख कैंसर से पीडि़तों के चित्र देखकर ही दिल कांपने लगता है। पीडि़तों की पीड़ा देखी नहीं जाती। बावजूद इसके लोगों में भय पैदा नहीं हो रहा है।
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सिगरेट, बीड़ी एवं हुक्के के धुएं में पाए जाने वाले बेन्जो पाइरीन एवं नाइट्रोर्सोनी कोटीन नामक पदार्थ फेफड़े के कैंसर के लिए मुख्यरूप से दोषी हैं, ऐसी जानकारी वरिष्ठ लंग कैंसर विशेषज्ञ डा. के.के. पांडे ने एक मुलाकात में दी थी। डा. पांडे ने धूम्रपान निषेध की अपील भी की थी।
फैशन का कुप्रभाव ही कहना पड़ेगा कि पढ़े लिखे लोग ही तंबाकू के काफी करीब हैं। झुग्गी-झोंपडिय़ों, झाडिय़ों के इर्द गिर्द, रेलवे स्टेशन से जुड़ी स्लम बस्तियों से लेकर विद्यापीठ परिसर तक आपको हर जगह धुआं उड़ाते लोग आसानी से नजर आ जायेंगे। झुंड में चिलम सुलगाने वालों को भी रेस्टोरेेट में हुक्का गुडग़ुड़ाने वाला युवा वर्ग मात दे रहा है। पान की दुकान से पान से ज्यादा तो गुटका, खर्रा बिक रहा है। आजकल तो पार्टियों में भी गुटका, खर्रा की पूरी व्यवस्था की जाती है। क्या लॉन्स, होटल, रेस्टारेंट सार्वजनिक स्थल नहीं है। जन-जागृति पर करोड़ों फूंके जा चुके हैं किंतु जन-जागृति को मिल रहा प्रतिसाद चिंता बढ़ा रहा है। आखिर कब तक सरकार राजस्व की चिंता में राष्ट्र के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करती रहेगी। जिन्हें पसंद नहीं, वे धूम्रपान करने वालों से परेशान हैं। ड्रग एडिक्ट बढ़ रहे हैं। नपुंसकों की संख्या भी बढ़ रही है।
– राजेन्द्र मिश्र ‘राज’आunnamedप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल बुलेटिन की मोबाइलएप को डाउनलोड कीजिये….गूगल के प्लेस्टोर में जाकर
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