महापुरुषों का काम ही नहीं, नाम भी बोलता है…!

महापुरुषों का काम ही नहीं, नाम भी बोलता है…!

महापुरुषों का काम ही नहीं, नाम भी बोलता है। महापुरुष अपने जीवन काल में तो बड़ा काम करते ही हैं। जीवनोपरांत उनके विचार समाज की दशा और दिशा तय करते हैं। महापुरुष कभी मरते नहीं, वे अपने अशरीरी विचारों की बदौलत सदैव हमारे बीच रहते हैं। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की 126वीं जयंती पर यह बात प्रमुखता से देखने को मिली। देश भर में अंबेडकर जयंती मनाई गई। दलितों के इस मसीहा को श्रद्धासुमन अर्पित करने में सभी राजनीतिक दलों ने उल्लेखनीय और अग्रणी भूमिका निभाई। बसपा प्रमुख मायावती ने भाजपा, सपा और कांग्रेस पर तंज भी कसा कि कुछ पार्टियां इन दिनों बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाने लगी हैं लेकिन वे उनके आदर्शों और सिद्धांतों से अभी भी बहुत दूर हैं। एक दिन वे अंबेडकर जयंती मनाते हैं और शेष 364 दिन उनके अनुयाइयों का जातिवादी मानसिकता के तहत शोषण, उत्पीड़न करते हैं। दलित समाज को ऐसे दलों के झांसे में नहीं आना है। मायावती इस तरह की नसीहत पहले भी देती रही हैं। और इस बार तो भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर अंबेडकर जयंती मनाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछली बार डॉ. भीमराव अंबेडकर की जन्मस्थली महू में जाकर उन्हें अपने श्रद्धासुमन भेंट किए थे और इस बार उन्होंने अंबेडकर की दीक्षाभूमि नागपुर में अंबेडकर जयंती मनाई है। इससे पूर्व उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं का आशीर्वाद भी लिया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी व्यापक पैमाने पर अंबेडकर जयंती मनाई। भीम एप्प को आधार और अंगूठे से जोड़कर, आम जनता के लिए उसे लाभप्रद बनाकर प्रधानमंत्री ने भुगतान की दिक्कतें तो दूर की ही हैं, अपने अंबेडकर प्रेम का इजहार कर दलितों का दिल जीतने की भी कोशिश की है।
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हालांकि दलितों का दिल जीतने की दिशा में उन्होंने बहुत पहले ही काम शुरू कर दिया था। वाराणसी के रैदास मंदिर में उन्होंने मत्था ही नहीं टेका, लंगर भी चखा था। उस समय भी मायावती ने इसे नौटंकी करार दिया था लेकिन दलित समाज ने इसे गंभीरता से लिया था। मायावती ने कभी खुद दलितों से जुड़ने की कोशिश नहीं की। वह तो दलित ही थे जो मायावती से जुड़े रहे लेकिन काठ की हांडी दोबारा आंच पर नहीं चढ़ती। दलितों का एक बड़ा वर्ग मायावती से नाराज था और 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका असर दिखा भी। मायावती अभी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि दलितों और मुसलमानों को अपने से जोड़े रखने में वे सर्वथा विफल रही। उनका दलित-मुस्लिम गठजोड़ कारगर नहीं हो सका। अब वे इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीन पर अपनी हार का ठीकरा फोड़ रही हैं और इस मुद्दे पर भाजपा विरोधी किसी भी राजनीतिक दल से हाथ मिलाने को तैयार हैं। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि मायावती की राजनीति दलितों से ही शुरू होती है और दलितों से ही समाप्त होती है। वे खुद तो दलितों के पास जाती नहीं और जो दलितों के पास जाता है। उनकी पीड़ा को बांटने की कोशिश करता है, उसका विरोध करती हैं। बसपा के लिए अंबेडकर राजनीतिक एजेंट से अधिक कभी नहीं रहे। केवल उनके नाम पर पार्क बनवा देने भर से बात नहीं बनती। दलितों के उत्थान की व्यापक रणनीति बनाने की रणनीति भी बननी चाहिए थी। मायावती ने अगर दलित-दलित में भेद नहीं किया होता तो आज उनकी पार्टी की इतनी दुर्गति न हुई होती।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंबेडकर जयंती पर एक बड़ा निर्णय लिया है। उनका मानना है कि महापुरुषों के जन्मदिन पर स्कूलों में अवकाश नहीं होना चाहिए बल्कि उनके बारे में छात्रों को शिक्षित करना चाहिए। महापुरुष कोई भी रहा हो। सबने समाज की बेहतरी की कामना की है। उसे शिक्षित और प्रेरित करने की कोशिश की है। उन महापुरुषों के जन्म दिन पर स्कूली बच्चों को शिक्षा से दूर रखना आखिर कहां तक न्यायसंगत है? योगी आदित्यनाथ ने यह भी विश्वास दिलाया है कि उनकी सरकार में कोई भेदभाव और अन्याय नहीं होगा। सरकार राज्य की 22 करोड़ आबादी की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। किसी को भी कानून तोड़ने की इजाजत नहीं होगी। उनका मानना है कि अंबेडकर देश की कीमत पर राजनीति करने के खिलाफ थे लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अंबेडकर के नाम पर राजनीति की जानी चाहिए।
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कांग्रेस ने संविधान निर्माता एवं दलितों के आदर्श डा. भीमराव अम्बेडकर की 126वीं जयंती पर एक वेबसाइट ‘‘क्वेस्ट फार इक्विटी’’ शुरू की है। यह वेबसाइट कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ द्वारा शुरू की गई है। कांग्रेस को उम्मीद है कि इससे समसामयिक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक मुद्दों के अलोचनात्मक विश्लेषण को प्रोत्साहन मिलेगा।
समाजवादी पार्टी ने भी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला और उनके आदर्शों और सिद्धांतों पर चलने का संकल्प लिया। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश के हर घर में अंधेरा हटाने के लिए पावर फॉर ऑल योजना के तहत बिजली आपूर्ति के लिए केंद्र और राज्य सरकार के बीच सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए। रही बात अंबेडकर जयंती मनाने की तो इसके पीछे दलितों के बीच अपना वजूद बनाए रखना ही राजनीतिक दलों का मूल अभीष्ठ है। भाजपा ने जिस तरह देश भर में अंबेडकर जयंती मनाई है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह अंबेडकर जयंती को विविधतापूर्ण ढंग से मनाते हैं, उससे वह दलितों का ध्यान ज्यादातर अपनी ओर आकृष्ट कर पाते हैं। ऐसे में मायावती और अन्य राजनतिक दल अगर इस ओर अंगुली उठाते हैं तो ऐसा स्वाभाविक भी है लेकिन जिन लोगों ने आज तक दलितों की राजनीति की है, उन्होंने भीमराव अंबेडकर को, संत रैदास को, ज्योति बाबा फूले आदि दलित चिंतकों को कितना समझा है। अंबेडकर जयंती पर सभी दलित छात्रों को छात्रवृत्ति देने की घोषणा हो या दलितों के उद्धार की बात, भाजपा जिस प्रमुखता से आगे बढ़ रही है, उससे मायावती की तिलमिलाहट स्वाभाविक है।  भारतीय संविधान में हम भारत के लोग कहा गया है लेकिन जब तक यह देश जाति-धर्म, दलित और सवर्ण के भेदभाव में उलझा रहेगा, तब तक अंबेडकर जयंती मनाने का कोई औचित्य नहीं है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान को आत्मार्पित करने की बात कही थी। अगर इस देश ने संविधान को अपनी आत्मा को अर्पित कर दिया होता तो भेदभाव, दुराव, भ्रष्टाचार का देश में नामोनिशान भी नहीं बचता। अब भी समय है। सभी दलों ने अंबेडकर की जयंती मनानी शुरू की है। बेहतर तो यह होता कि वे उनके विचारों को तह में जाते। पीछे क्या हुआ, यह उतना अहम नहीं है जितना यह कि अब हम क्या करना चाहते हैं। किसी महापुरुष की प्रतिमा लगाना, उसकी जयंती मना लेना ही काफी नहीं है। विचारणीय तो यह है कि उनके आदर्शों और सिद्धांतों पर चलने के प्रति हम गंभीर हैं भी या नहीं और कदाचित हां तो कितने गंभीर हैं। कबीरदास ने लिखा था कि ‘ राम कहै दुनिया गति पावै, खांड़ कहै मुख मीठा।’ मुख तो तभी मीठा होता है जब खांड़ खाई जाए। बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि तो यह होगी जब संविधान इस देश के हर घर में रामायण और गीता की तरह आदृत हो। उसका अध्ययन तो हो ही, उस पर अमल भी हो। विचार तभी सार्थक होते हैं, जब उन पर अमल हो। सभी राजनीतिक दलों को इस बावत सोचना होगा और देश तथा प्रदेश को आगे बढ़ाने में अपना सर्वश्रेष्ठ देना होगा। यह सच है कि राजनीतिक दल बिना अपने फायदे के कुछ नहीं करते लेकिन उन्हें आम जन के फायदों का भी ध्यान रखना चाहिए। मौजूदा समय जातिवादी नहीं, मानवतावादी होने की मांग कर रहा है।
-सियाराम पांडेय ‘शांत’

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