महंगाई के समय में फिजूलखर्ची, न बाबा न

महंगाई के समय में फिजूलखर्ची, न बाबा न

shoppingशिवि का पति ऑफिस में जूनियर पोस्ट पर ही है। वो स्वयं नौकरी नहीं करती, इसलिए उनकी इनकम इतनी ही है जिसमें घर खर्च ही बस आराम से चल पाता है, यानी कि फिजलूखर्ची के लिए कोई गुंजाइश नहीं लेकिन शिवि है कि उसे शॉपिंग का मेनिया है। रोज होटलों में खाने का शौक, सिनेमाहाल में बैठ कर पिक्चर देखे बिना उसे जिंदगी में अधूरापन लगता है।
रोहित की बीवी समझदार है लेकिन रोहित में इतनी समझ नहीं है। वो बचत का महत्त्व समझता ही नहीं। जितना पैसा हाथ में हो, उसे उड़ाना ही है। उसने घर में इतने शोपीस ला रखे हैं कि उन्हें सजाने के लिए जगह कम पडऩे लगी है। जब भी बाहर टूर पर जाता है, बीवी के लिये एक दो नहीं, दर्जनों डे्रसेज़ ले आता है जिन्हें पहनने में पायल यानी रोहित की पत्नी को शर्म आती है। पायल को बदन उघाडू डे्रस से सख्त परहेज है।
कहावत है अगर आप पैसे की कद्र नहीं करेंगे तो वो आपकी कद्र नहीं करेगा। मां बाप में से एक भी अगर फिजूलखर्च है तो संतान पर उसका असर पड़ सकता है। दोनों के संयमी होने पर ही वे अपनी संतान को इस रोग से बचा सकते हैं।
दरअसल फिजूलखर्ची भी एक मानसिक रोग ही है जो क्योर किया जा सकता है। इसके लिये भी डिएडिक्शन सेंटर खोले जाने चाहिए। फिजूलखर्ची की लत घरों को बर्बाद कर देती है। बचत करना निहायत जरूरी है। आड़े वक्त में पैसा ही काम आता है। बीमारी मुसीबतें कह कर नहीं आती। तभी पैसे की कद्र पता चलती है।
आज बाजार तरह-तरह की लुभावनी चीजों से भरा पड़ा है। ऐसे में मन पर काबू रखना आना चाहिए। यह प्रैक्टिस से आ सकता है। कुछ मनपसंद लुभावनी चीजों को देखकर मन ललचाना स्वाभाविक बात है मगर इच्छाशक्ति दृढ़ हो तो इस पर विजय पाना मुश्किल नहीं। जिसे अपने पर संयम है वो जीवन में कई मुसीबत और परेशानियों से बच सकता है।
अभिभावक ध्यान रखें:- बच्चों के किसी खास महंगी चीज के लिये जिद करने पर न उन्हें टालें, न डांटें बल्कि उन्हें विश्वास में लेकर अपनी आर्थिक स्थिति से अवगत करायें। यह न सोचें कि वे छोटे हैं तो क्या समझेंगे। उनकी समझ को अंडरएस्टीमेट न करें।
अपने बच्चों को बहुत अमीर बच्चों से दोस्ती करने से रोकें। दोस्ती बराबरी वालों की ही अच्छी है, यह बात वे शुरू से जान लें तो अच्छा है। अमीर बच्चे फिजूलखर्ची अफोर्ड कर सकते हैं मगर आपका बच्चा नहीं। ऐसे में उसमें कॉम्पलेक्स घर कर सकता है। दोस्त की बराबरी करने के फेर में वो पैसे के लिये गलत राह अपना सकता है।
आपको स्वयं बच्चे को आगे रोल मॉडल बनके दिखाना है। आप स्वयं हाथ रोक कर खर्चेंगे, दिखावे के फेर में न पड़कर अपनी चादर देखकर पैर फैलायेंगे तभी बच्चा भी आपसे यह गुण सीखेगा।
ब्रांडेड चीजों के नाम से आजकल खूब लूट मचाई जाती है। इनसे बचकर रहें और बच्चों को भी असलियत से अवगत करायें कि ये सब अमीरों के चोचले हैं जिनके पास पैसा फेंकने को और लुटाने को है। अब ऐसा भी नहीं है कि हर ब्रांडेड चीज नो नो ही है। सस्ती के फेर में भी धोखा खाया जाता है, जैसे कहावत है महंगा रोये एक बार, सस्ता रोये बार-बार। अपने विवेक को काम में लाते हुए पहले कुछ जानकारी हासिल कर के ही किसी खास वस्तु खरीदारी करें तो आपके हक में अच्छा होगा।
अपनी आय और बच्चे की उम्र देखते हुए ही उसे पॉकेट मनी दें। यह सोच कि बच्चे को आप सब कुछ तो ले देते हैं, उसे पैसे की क्या जरूरत, उचित नहीं है। बच्चे की अपनी छोटी मोटी जरूरतें होती हैं। दोस्तों को खर्चते देख उसका मन भी कुछ लेने का हो सकता है। लिमिट में खर्चें तो कोई बुराई नहीं। बस आपको समय-समय पर जानते रहना चाहिए कि बच्चा पैसा कहां कैसे खर्च रहा है।
बच्चे को बचपन से ही बचत का महत्त्व जरूर समझा कर चलें। संभव हो तो बैंक में उसका अकाउंट खुलवा दें ताकि उसे बचत के लिए इनसेंटिव मिले।
– उषा जैन ‘शीरीं’royal-3-1-1-300x254

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