मतदाताओं का उत्साह अच्छे संकेत : सुधांशु द्विवेदी

मतदाताओं का उत्साह अच्छे संकेत : सुधांशु द्विवेदी

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण की 73 सीटों पर हुए 64 प्रतिशत मतदान से स्पष्ट हो गया है कि राज्य के मतदाता विधानसभा चुनाव को लेकर खासे उत्साहित हैं तथा लोकतंत्र के महायज्ञ रूपी चुनाव में अपने वोटों की आहुति देने को वह परम कर्तव्य समझते हैं। राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये तमाम तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं तथा चुनावी वादों एवं दावों की झड़ी लगाना उनकी फितरत का हिस्सा रहती है। इस बीच विचारणीय विषय यह रहता है कि मतदाताओं द्वारा चुनाव में अपनी प्रत्यक्ष भागीदारी अर्थात मतदान के प्रति उम्मीद के अनुरूप उत्साह दिखाया जायेगा या नहीं। इस दौरान चुनाव आयोग द्वारा भी इस सिलसिले में खासी सक्रियता दिखाई जाती है तथा जागरूकता अभियान व अपील आदि के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है कि मतदाता अपने मताधिकार का अधिकाधिक उपयोग करें। यूपी के विधानसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग का यह प्रयास पूरी तरह सफल रहा है। वहीं इसका श्रेय काफी हद तक राजनीतिक दलों, राजनेताओं और लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ मीडिया जगत को भी जाता है, जिन्होंने अपने-अपने स्तर पर मतदाताओं को मतदान करने के लिये जागरूक करने एवं उनकी राजनीतिक रूचि बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाई।
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हालांकि इस चुनाव में राजनीतिक दलों का विडंबनापूर्ण पक्ष भी उभरकर सामने आया है,जिन्होंने जातीय, सांप्रदायिक और आर्थिक ताकत को आधार बनाकर टिकट वितरण किया है तथा उनका चुनाव अभियान शुचिता से परिपूर्ण नहीं है। राजनीतिक दलों व राजनेताओं की यह विशेष जिम्मेदारी बनती है कि वह चुनावी फायदे के लिए श्रेष्ठ राजनीतिक मूल्यों एवं उसूलों को नजरअंदाज न करें तथा चुनावी जीत व हार का निर्णय मतदाताओं की इच्छा व आशीर्वाद पर छोड़ दें। अलग बात है कि राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिये साम, दाम, दंड, भेद सभी तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो चिंताजनक है। यूपी विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण का मतदान संपन्न होने के बाद से वह सत्ता में अपनी ताजपोशी सुनिश्चित होने का दावा भी करने लगे हैं। यहां सवाल यह उठता है कि सत्ता प्राप्ति के लिए उतावले राजनीतिक दल एवं उनके नेता चुनाव जीतने के बाद क्या सही मायने में जनमानस की उम्मीदों पर खरा उतर पाएंगे। यूपी का तीव्र संतुलित विकास एवं जनकल्याण इस चुनाव में बड़ा मुद्दा है तो इसका कारण यह है कि विभिन्न कालखंडों में राज्यवासियों के हितों की घोर उपेक्षा हुई है तथा कतिपय राजनीतिक दल एवं उनके नेताओं ने सत्ता को स्वार्थपूर्ति का आधार बना लिया तथा जनकल्याण सम्बंधी उनके दावे अधिकांशतया कागजों तक ही सीमित रहे।
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अगर लोककल्याण व विकास के कुछ काम हुए भी तो उन पर जात, पांत व क्षेत्रवाद ही हावी रहा। यही कारण है कि अब चुनाव जीतने के लिए उन्हें इतनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। हालांकि छल कपट व उपेक्षा का शिकार होने के बावजूद राज्य के मतदाताओं द्वारा मतदान के प्रति उत्साह दिखाया जा रहा है तो यह संतोषप्रद एवं खुशी का विषय है। अब राजनीतिक दलों व उनके नेताओं की यह महती जिम्मेदारी बनती है कि चुनाव जीतने के बाद वह अपनी पुरानी गलतियों को न दोहराएं तथा पराजय की स्थिति में अवसादग्रस्त भी न हों। क्यों कि प्राय: देखने को मिला करता है कि चुनाव सम्पन्न होने के बाद कई बार चुनावी हिंसा का दौर भी शुरू हो जाया करता है। जो राजनेता चुनाव जीत गये, वह जीत के अहंकार से ग्रस्त होकर राजनीतिक विरोधियों पर अत्याचार शुरू कर देते हैं तो जिन्हें चुनाव में पराजय मिलती है वह द्वेषवश आम लोगों को ही डराने, धमकाने या उन्हें हिंसा का शिकार बनाने लगते हैं। यह परिस्थितियां विडंबनापूर्ण हैं तथा लोकतंत्र में ऐसे हालात के लिए जरा सी भी जगह नहीं है। वैसे भी यूपी व अन्य सम्बंधित राज्यों के विधानसभा चुनाव में अभी जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वह कम दोषपूर्ण नहीं हैं। कतिपय राजनीतिक दलों एवं नेताओं द्वारा उच्च कोटि के राजनीतिक संस्कारों एवं मूल्यों का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है तथा आरोप-प्रत्यारोप का दौर संचालित करते समय सभी मूल्यों एवं मर्यादाओं को तिलांजलि देने में जरा भी संकोच नहीं किया जा रहा है।

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