मच्छर के आगे बेबस देश..बहुत छोटा सा जीव, लेकिन ताकत बेमिसाल

मच्छर के आगे बेबस देश..बहुत छोटा सा जीव, लेकिन ताकत बेमिसाल

dengu-mosquito मच्छर बहुत छोटा सा जीव है लेकिन इसकी ताकत बेमिसाल है क्योंकि इसको खत्म करने में बड़े-बड़े ताकतवर देशों का दम निकल गया है हालांकि ज्यादातर विकसित देश इससे निजात पा चुके हैं। विकासशील और पिछड़े देशों के लिये यह अभी भी बड़ी समस्या बना हुआ है। मच्छर के सामने हम तो भगवान के भरोसे बैठे रहने वाले लोगों में शामिल हैं। मानसून के मौसम में मच्छरों की तादाद बहुत बढ़ जाती है तो सरकार थोड़े बहुत हाथ-पैर मारकर मानसून के जाने का इन्तजार करने लगती है।
वास्तव में मानसून में मच्छरों की तादाद बढऩे पर इनसे पैदा होने वाली बीमारियों का हमला शुरू हो जाता है। डेंगू के मरीजों से अस्पताल भरने लगते हैं। अस्पतालों में एक बिस्तर पर तीन-तीन मरीजों का इलाज करना पड़ता है। निजी अस्पताल भी इस मौसम में खूब चाँदी कूटते है क्योंकि थोड़ी सी तकलीफ होने पर ही वे डेंगू जैसी बीमारी का भय दिखाकर मरीज के चिकित्सा परीक्षणों के माध्यम से ही करोड़ों रूपये की कमाई कर लेते हैं। मच्छरों से बचाने के लिये बनाये गये प्रोडक्ट बाजार में हर तरफ दिखने लगते हैं क्योंकि आम आदमी के पास मच्छर से बचने के लिये इनके सिवाय कोई रास्ता ही नहीं बचता।
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मच्छर इसलिये बहस के केन्द्र में आ गया है क्योंकि पिछले सोमवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने श्रीलंका को ‘मलेरिया मुक्त देश’ घोषित कर दिया है और यही हमारे लिये सोचने का सबब बन गया है क्योंकि श्रीलंका जैसा गरीब और साधनहीन देश जब मलेरिया मुक्त हो सकता है तो हम अब तक ऐसा क्यों नहीं कर पाये हैं। वास्तव में श्रीलंका सरकार ने एक सुनियोजित तरीके से मलेरिया उन्मूलन के लिए कार्यक्र म चलाया और नये-नये तरीकों से एक ठोस अभियान चलाकर अपने लक्ष्य को हासिल किया। मलेरिया की जांच से लेकर इसके उपचार तक तीव्र गति से कार्यक्र म चलाया, मच्छर पनपने की जगहों की पहचान करके वहां साफ-सफाई का इन्तजाम किया गया। मच्छर के खात्मे के साथ-साथ परजीवी नियंत्रण पर जोर दिया गया जिससे वे अपने लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब रहे।
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यहाँ यह भी ध्यान रखना होगा कि मलेरिया मुक्त होने का यह मतलब नहीं है कि श्रीलंका मच्छर-मुक्त भी हो गया है। वो दिन अभी श्रीलंका के लिये बहुत दूर है लेकिन उसने अपने देश से मलेरिया का खात्मा कर दिया है। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में मलेरिया को खत्म करने में कोई कामयाबी नहीं मिली है। हमने मलेरिया पर काफी हद तक काबू पाया है लेकिन अभी भी हमारे देश में मलेरिया से मरने वालों की संख्या हजारों में है। ऐसे बहुत देश हैं जो मलेरिया से मुक्ति पाने के लिये हाथ-पैर मार रहे हैं जिसमें वो कामयाबी के काफी नजदीक है लेकिन हम अभी इस कामयाबी से बहुत दूर दिखायी दे रहे हैं।
मलेरिया से मुक्ति पाने को मैं ज्यादा महत्त्व नहीं देती। मेरा मानना है कि मलेरिया से मुक्ति पाने की अपेक्षा मच्छर से मुक्ति पाने की कोशिश करनी ज्यादा जरूरी है क्योंकि मलेरिया से हमने मुक्ति पा भी ली तो अन्य मच्छरजनित बीमारियाँ हमें छोडऩे वाली नहीं है। चीन इस दिशा में अग्रसर है। वो न केवल मलेरिया बल्कि मच्छरों से भी मुक्ति पाने के लिये संघर्ष कर रहा है। वो ऐसे मच्छर प्रयोगशालाओं मे पैदा कर रहा है जो मच्छरों को मारते हैं। चीन की एक आदत है वो जिस चीज के लिये जिद्द कर लेता है, उसे पाकर ही छोड़ता है और वो अपने देश को मच्छरमुक्त करने में लग गया है। हमने अक्सर देखा होगा कि हमारे देश में सरकारें शहर के कुछ इलाकों में मच्छरों को मारने के लिये अभियान चलाती है और गाँवों में इस अभियान की जगह लोगों को मच्छरदानी और दवाइयाँ बाँटकर काम चलाती है। अब सवाल उठता है कि क्या मच्छर सोते हुए आदमी को ही काटते हैं, वो जागते हुए आदमी पर हमला नहीं करते हैं। हमें सच्चाई पता है, इसलिये मुश्किल और लम्बा रास्ता चुनना होगा और वो है मच्छर के खात्मे का जो बेहद मुश्किल है लेकिन अगर सब देश मिलकर इसका खात्मा करना चाहे तो ऐसे कई वैज्ञानिक और प्राकृतिक तरीके है जिनसे मच्छरों का पूरी तरह नहीं तो काफी हद तक खात्मा किया जा सकता है। इसमें चीन द्वारा दिखाया गया रास्ता हमारे काम आ सकता है।
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मच्छरों द्वारा पैदा होने वाली बीमारियों से बचने के लिये हर वर्ष हमारे देश में सरकारों द्वारा 40000-50000 करोड़ का भारी-भरकम बजट खर्च किया जाता है लेकिन समस्या खत्म नहीं हो रही है और यह खर्च हर साल बढ़ता जा रहा है। वास्तव में मच्छरों से पैदा होने वाली बीमारियों से लडऩे में खर्च होने वाली राशि का 90 प्रतिशत हिस्सा तो प्रशासनिक कार्यों में ही खर्च हो जाता है। इसमें किसी को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिये क्योंकि यह समस्या हर सरकारी कार्यक्र म के साथ है। सरकार अगर गरीब तक कोई पैसा पहुँचाना चाहती है तो उसे 1 रूपया पहुँचाने के लिये 10 रूपये खर्च करने पड़ते है हालांकि अब हालात बदल रहे हैं लेकिन कई कार्यक्र मों में हालात बदलने वाले नहीं है।
जितना पैसा सरकार मच्छर से सम्बन्धित कार्यक्र मों पर खर्च करती है, उससे कहीं ज्यादा पैसा जनता मच्छरों से बचाव के लिये अपने स्तर पर खर्च करती है। अगर हम सरकार द्वारा खर्च की जाने वाली राशि और लोगों द्वारा खर्च की जाने वाली राशि को जोड़ दें तो यह राशि एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर सकती है। हमारे देश में किसी भी आंकड़े पर विश्वास करना मुश्किल होता है क्योंकि गाँवों में मरने वाले गरीब किस बीमारी से मर रहे हैं यह किसी को पता नहीं होता। कितने ही इलाके ऐसे है जहाँ सरकार कभी नहीं पहुँचती और कितने लोग मरे,कैसे मरे और क्यों मरे ये हम जान ही नहीं पाते हैं।
अगर सरकार इस मामले में सफलता चाहती है तो उसे जनता को साथ लेना होगा। यह कार्यक्र म जनता के सहयोग से ही सफल हो सकता है। मेरा मानना है कि जनता को भी सरकार को हर प्रकार से सहयोग देना होगा, तभी हमारा देश मच्छर और मच्छरजनित बीमारियों से छुटकारा पा सकता है।
– सीमा पासी आप ये ख़बरें अपने मोबाइल पर पढना चाहते है तो दैनिक रॉयलunnamed
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