मंगलसूत्र के बिना कितना जायज है कामसूत्र..!

मंगलसूत्र के बिना कितना जायज है कामसूत्र..!

 काम अर्थात् सेक्स जीवन की अनेक आवश्यकताओं में से एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। हमारी भारतीय मान्यता रही है कि सेक्स एक गोपनीय वस्तु है, जिसका प्रयोग विवाह-संस्कार के बाद ही अपने जीवन साथी के साथ किया जाना चाहिए।
आधुनिक समाज ने सेक्स को मात्र एक मनोरंजन की वस्तु मान लिया है और अन्य मनोरंजन की सामग्रियों के समान ही सेक्स का भी उपभोग प्रारंभ हो गया। आधुनिका कहीं जाने वाली बालाओं से एक परिचर्चा की गई। सेक्स के संबंध में उन बालाओं के विचार यहां प्रस्तुत हैं।
मेडिकल परीक्षा की तैयारी कर रही सीमा मेहरा से जब सेक्स के संबंध में पूछा गया तो उसने कहा – सेक्स की आपूर्ति शरीर के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना कि भोजन। अठारह वर्ष की अवस्था के बाद लड़की का शरीर भी सेक्स की आपूर्ति चाहता है। आज का समय एक विस्तृत सोच रखने वालों का समय है। अगर मन के अनुरूप शरीर की इस इच्छा की पूर्ति भी अगर कर ली जाये तो इसमें बुराई क्या है। मेरे अनुसार सेक्स संबंध को बनाने में ‘मंगलसूत्र’ की बाध्यता उचित नहीं है।
22 वर्षीया अनु कुमारी बी. ए. तृतीय वर्ष की छात्र है। जब उससे विवाह पूर्व सेक्स संबंध बनाये जाने के विषय में पूछा गया तो उसका कहना था-‘जब प्यास लगे, पानी पी लेना चाहिए। हां, यह देखना उचित है कि वह पानी नल का है या नाले का? प्यासा रहकर समय बिताते रहना क्या बुद्धिमानी है? शादी के बाद लड़की पति की इच्छाओं के अनुकूल कार्य करने पर विवश हो जाया करती है किन्तु शादी से पहले वह जिससे सेक्स संबंध बनाती है, उसे अपने इशारों पर नाचने पर मजबूर करती रहती है। एक खूंटे में बंधी रहने वाली भैंस की पूरी दुनिया खूंटे तक ही सीमित रहती है जबकि स्वतंत्र रहने वाली शेरनी सम्पूर्ण विचरण करती रहती है। इसलिए ‘मंगलसूत्र’ की जंजीर में बंधकर ‘कामसूत्र’ को एक के लिए ही बचाकर रखना मैं उचित नहीं समझती।
परीक्षा में सफलता के लिए शुरू से अध्ययन जरूरी..!

सुष्मिता दास जो फैशन डिजाइन का कोर्स कर रही है, से सेक्स के संबंध में जब पूछा गया तो वह जमाने से भी दो कदम आगे बढ़ते हुए बोली-पति के खूंटे में बंधकर रहने वाली नारी ‘सेक्स’ को क्या जान सकती है? जिस प्रकार फैशन के अनुसार नये-नये डिजाइनों के कपड़ों को पहनकर लोग अपनी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार सेक्स का अनुभव विवाह पूर्व करना कतई बुरा नहीं है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या आप के जीवन में भी ऐसा ही है तो उनका जवाब था-मेरी उम्र अठाइस वर्ष की है। जब मैं अठारह वर्ष की थी, उसी समय एक अड़तीस वर्ष के बुजुर्ग ने मुझे अपने कामपाश में जकड़ा। उसके बाद मुझे ज्ञान हुआ कि एक लड़की को इससे वंचित रखकर उससे बहुत बड़ा सुख छीन लिया जाता है। मैंने उस समय से कितने पुरूषों से सेक्स संबंध बनाया है, इसका हिसाब मुझे भी नहीं है। मैं ‘मंगलसूत्र’ को महत्त्व नहीं देती क्योंकि वह लड़कियों के लिए कठोरतम सजा है।
कभी कभी झूठ बोलना चाहिए..ऐसा झूठ जो रिश्तों को पास ले आये..!

आज हम पढ़-लिखकर कितने भी आधुनिक क्यों न बन जायें किन्तु सेक्स के प्रति उपरोक्तानुसार विचार रखना हमें पिछड़ा होने की ही संज्ञा प्रदान करता है। कमला मेहरा, अनु कुमारी तथा सुष्मिता दास के समान विचारों को रखने वाली लड़कियों की आज के समय में कोई कमी नहीं है।
सेक्स को एक मनोरंजन समझना हितकारी है या अहितकारी, इसका फैसला भविष्य ही करेगा। ‘जवानी’ लुटाने का नाम नहीं बल्कि उसे संभालकर रखने का नाम है। किसी भी पुरूष के सामने दो पल के शारीरिक सुख के लिए अपने कपड़ों को खोल देना ही अगर अत्याधुनिका बनाता है तो सभी ऐसा क्यों नहीं करते?
औरतों को जिस प्रकार तन की सुन्दरता के लिए स्वर्णाभूषणों की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार मन की शुद्धता के लिए ‘शील’ रूपी आभूषण की जरूरत पड़ती है। क्षणिक तन के सुख के लिए मन के चैन को लुटा देना क्या बुद्धिमानी है?
‘मंगलसूत्र’ महिला के गले में झूलकर एक पवित्रता को बताने का कार्य करता है। पथ पर चलकर ही राहगीर अपने गन्तव्य तक पहुंच सकता है। अनेक पथों पर चलने की विचारधारा वाला राहगीर ‘मृगतृष्णा’ की तरह ही भटककर दम तोड़ देता है।
-पूनम दिनकर

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