भ्रष्टाचार बनाम शिष्टाचार

भ्रष्टाचार बनाम शिष्टाचार

भ्रष्टाचार से आज हर कोई आजिज आ चुका है जिसका सीधा आरोप सरकार पर लगाया जाता है चाहे वो किसी की सरकार हो। यह एक ऐसा रोग कह सकते है जिसका इलाज इतनी आसानी से नहीं हो सकता। भाजपा की सरकार से लोगों को काफी उम्मीद है और कुछ मामलों में काम शुरू भी हो चुका है लेकिन पूरा सुधारने के लिए समय,सहयोग चाहिए जिसके लिए विपक्ष तैयार नहीं है। एक बात और, जब तक हम इसमें सहयोग नहीं करेगें, तैयार नहीं होगे, तब तक तो कत्तई नहीं। शुरूआत हमें अपने आप से करनी होगी।
भ्रष्टाचार आज समाज में शिष्टाचार बन गया है। भ्रष्टाचार के बिना आजकल कोई कार्य होना कठिन होने गया है। भ्रष्टाचार सरकार व समाज में ऊपर से नीचे तक पहुँच गया है। जो भ्रष्टाचार से दूर हैं वे समाजिक परिदृश्य से गायब हैं और उन्हें हीन भाव से देखा जाने लगा है। कहावत है कि जैसा राजा होता है वैसे ही उसकी प्रजा होती है राजा के आचरण का असर सीधे प्रजा पर पड़ता है। इसी तरह घर का मुखिया अगर शराब पीता है उसके परिवार के लोग भी शराब नहीं तो भांग, गांजा, बीड़ी, सिगरेट जरूर पियेगें।
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हमारे देश में भ्रष्टाचार की शुरूआत सरकार और सरकारी कारकुनों से होती है। सरकार अगर विश्व बैंक से विकास के नाम पर कर्ज लेकर मौज मस्ती करती है तो जनता भी बैंक से कर्ज लेकर भविष्य की चिंता किये बगैर गुलछर्रे उड़ाती है।
राजनीति में घुसना हो तो बिना पैसा खर्च किये घुस पाना मुश्किल है। बिना भ्रष्टाचार का सहारा लिये बगैर कोई पद पाना आज के दौर में असंभव है। भ्रष्टाचार का सहारा लिये बगैर चुनाव जीत पाना कठिन है। सरकार बनाने के लिये विधायकों सांसदों की पूर्ति बिना भ्रष्टाचार के संभव नहीं रह गयी है। विधायक सांसद मंत्री बन जाने के बाद बिना भ्रष्टाचार का सहारा लिये अगला चुनाव लड़ पाना आसान नहीं है। सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार की भूमिका अहम है और बिना भ्रष्टाचार का सहारा लिये नौकरी पाना आसान नहीं रह गया है जो पैसा खर्च करके नौकरी पाता है वह उसकी भरपाई नौकरी से करके भ्रष्टाचार को नीचे तक पहुँचा देता है।
थाना, तहसील, ब्लाक, बैंक, अदालत अस्पताल ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ पर भ्रष्टाचार का बोलबाला न हो और बिना पैसा खर्च किये काम हो जाता हो। बिना पैसा खर्च किये कार्य में हजार खामियां पैदा हो जाती हैं और वहीं पर जब भ्रष्टाचार का सहारा ले लिया जाता है तो सारी खामियां स्वत: समाप्त हो जाती हैं।
जो कार्य छ: महीने में बिना पैसा दिये नहीं हो पाता है, वह छ: घंटे में हो जाता है। उद्योगपति थोक विक्रेता को दो रूपये का सामान चार का देता है तो थोक विक्रेता उसे फुटकर विक्रेताओं को आठ का देता है और भ्रष्टाचार की बेल अपने में सबको समेत लेती है।
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डीजल पेट्रोल किरोसिन डिपो से कम मिलता है और वहाँ से पेट्रोल पम्प तक कम ही होता रहता है। इस भ्रष्टाचार का सारा खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है। अब तक सेना व न्यायपालिका भ्रष्टाचार मुक्त मानी जाती थी लेकिन अब वह भी भ्रष्टाचार की चपेट में आ गये हैं। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सत्ता संभालने के बाद से ही देश को भ्रष्टाचार से मुक्त बनानेे की मुहिम चलाई जा रही है लेकिन मुहिम का असर भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों पर कम ही पड़ रहा है। नोटबंदी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिनके लिये योजना लागू की गयी थी वे कहीं सिर पीटते नहीं दिखे लेकिन आम जनता लाइन में परेशान जरूर दिखी।
भ्रष्टाचार को समाप्त करना कैंसर को समाप्त करने जैसा है क्योंकि यह रग रग में व्याप्त हो गया है। सरकार अपने मशीनरी में ब्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने का सफल प्रयास समय की मांग है। अभी तक भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा कसने में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार सफल नहीं हो पाई है। जनता भ्रष्टाचार से मुक्त होने की सपना देख रही है।
– विनय कुमार मिश्र

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