भोजन संबंधी भ्रांतियां दूर करना आवश्यक..!

भोजन संबंधी भ्रांतियां दूर करना आवश्यक..!

 ‘बच्चा लगातार खांस रहा है, उसे संतरा मौसंबी मत देना’ या ‘सर्दी-जुकाम है, नींबू व दही मत खाना’ या ‘बढ़ते बच्चे को दूध में बोर्नविटा, कॉम्पलान या हॉर्लिक्स जरुर डालकर दिया करो’ आदि अनेक प्रकार की बातें हमें आए-दिन सुनने को मिलती हैं। ये बातें अगर कम पढ़ा-लिखा वर्ग करे तो कोई बात नहीं परंतु खेद तो तब होता है जब पढ़े-लिखे लोग भी इस प्रकार की बातें करते नजर आते हैं। आज ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो भोजन के प्रति अनेकों भ्रांतियां पाले हुए हैं।
अधिकांश लोगों में भोज्य पदार्थों के मूल्य व पोषण को लेकर ढेरों भ्रांतियां विद्यमान रहती हैं। कई व्यक्ति यही मानकर चलते हैं कि जो भोज्य पदार्थ जितना महंगा होगा, उसका पोषण मूल्य उतना ही अधिक होगा। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर वे काजू, किशमिश, पिस्ता, बादाम आदि नट्स को अधिक प्राथमिकता देते हैं जबकि इसके अलावा कुछ सस्ते नट्स जैसे मूंगफली व नारियल भी पोषण मूल्य की दृष्टि से बादाम व काजू के समान ही रहते हैं और कीमत की दृष्टि से दोनों में बहुत ही ज्यादा अंतर होता है।
हमारे समाज में बहुत पहले से कुछ खाद्य पदार्थों को गर्म तासीर का तथा कुछ को ठंडी तासीर का माना जाता है। उनके अनुसार जो खाद्य पदार्थ गर्म तासीर के होते हैं उन्हें ग्रीष्म ऋतु में नहीं खाना चाहिए। इसी तरह से ठंडी तासीर के खाद्य पदार्थों को शीत ऋतु में नहीं खाना चाहिए क्योंकि उनका ऐसा मानना है कि इस प्रकार खाने से सर्दी-जुकाम-खांसी आदि बीमारियां शरीर को कष्ट पहुंचाती हैं जबकि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
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मांस मछली, अंडे, नट्स घी, तिलहन आदि को गर्म तासीर वाले खाद्य पदार्थों की श्रेणी में रखा जाता है जबकि फल सब्जियों, सलाद, दही, मठा, दूध आदि को ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थों के अंतर्गत रखा गया है। इन खाद्य पदार्थों का सेवन अपने शरीर की क्षमता व पाचन के अनुसार किसी भी ऋतु में किया जा सकता है बशर्ते कि वह शरीर को किसी भी प्रकार से हानि न पहुचाएं।
कुछ लोग जो अपना मोटापा कम करना चाहते हैं, उनमें भी भोजन को लेकर अनेक भ्रांतियां बनी रहती हैं। अच्छा लगने पर भी वे चावल यह सोचकर नहीं खाते कि चावल मोटापा बढ़ाता है जबकि चावल व रोटी से लगभग एक समान कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। रोटी की जगह उतना ही चावल खाने से किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता।
इसी तरह मोटे लोग दिन में दो बार यह सोचकर भोजन लेते हैं कि बार-बार खाने पर वजन बढ़ता है। सुबह का नाश्ता छोड़कर वे सीधे दोपहर का भोजन लेते हैं और उसके बाद सीधे रात को खाते हैं परंतु हाल ही में हुए अनुसंधानों से यह बात स्पष्ट हो गई है कि मोटापा उन लोगों में अधिक होता है जो दिन-भर में चार-पांच हल्के भोजन की अपेक्षा दो बार भारी व अधिक मात्रा मे आहार लेते हैं।
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तेल तथा घी को लेकर भी अनेक भ्रांतियां हैं। लोग अक्सर यह सोचते हैं कि घी, तेल की अपेक्षा अधिक पौष्टिक व लाभदायक होता है जबकि सच यह है कि घी व तेल दोनों से एक समान कैलोरी प्राप्त होती है तथा घी में वसा भी अधिक होती है। 100 ग्राम घी व तेल दोनों ही 900 कैलोरी ऊर्जा प्रदान करते है।
हमारे देश में प्रांत-दर प्रांत इन भ्रांतियों में अंतर दिखाई देता है। हास्यास्पद बात यह है कि एक प्रांत में जो भोजन किसी विशेष अवस्था के लिए अनुपयुक्त बताया गया है, वही भोजन दूसरे प्रांतवासी विशेष रूप से उपयुक्त बताते हुए उपयोग में लाते हैं।
सारांश यह है कि ये सब बातें पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती। बिना वैज्ञानिक आधारों के इन बातों को उचित मानना बुद्धिमानी भी नहीं है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कीमती खाद्य पदार्थों की सूचनाओं तथा विज्ञापनों को पढ़कर उनसे आप अपने घर का बजट न बिगाड़ें। नि: संदेह कुछ सूचनाएं सही भी हो सकती हैं परंतु सभी नहीं। भोजन में फैली भ्रांतियों के लिए आप अपनी तर्क बुद्धि का उचित प्रयोग करना कभी न भूलें और ज्यादा संशय की स्थिति हो तो किसी योग्य मार्गदर्शक की सलाह अवश्य लें।
-उमेश कुमार साहू

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